क्यों किसी की सौ अच्छाईयों पर एक गलती भारी पड़ जाती है ?...
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|   Jun 16, 2017
क्यों किसी की सौ अच्छाईयों पर एक गलती भारी पड़ जाती है ?...

अनीता की आँखो से आँसू रुकने का नाम नही ले रहे थे..आज जो उसके साथ हुआ था उसकी उसने कभी कल्पना भी नही की थी। कभी एक अपराधी की तरह महसूस कर रही थी और कभी गुस्सा आ रहा था। जिस घर और उसके लोगो को उसने अपना माना था आज उनकी आँखो मे अपने लिये परायापन नज़र आ रहा था।

उसकी शादी को तक़रीबन आठ महीने बीत चुके थे और जिस दिन से उसने इस घर मे क़दम रखा था किसी को शिकायत का एक भी मौका नही दिया था। माँ की वो सीख कि बेटा अब वो भी तुम्हारा ही घर है और सुरेश (उसके पति) के माता पिता तुम्हारे माँ-पापा, उसने इसे ही सच मान लिया था...

किस कदर खुद को इस घर और इसके लोगो के मुताबिक ढाल लिया था उसने, उसे खुद यकीन नही होता था...सासूमा जल्दी उठती थी तो वो भी जल्दी उठती...जल्दी से तय्यार होकर पूजा करके काम पर लग जाती। कुछ समय मे ही इस घर के तौर तरीकों...सबकी पसंद -नापसंद से वाकिफ हो गई थी।...पापाजी की सुबह की अखबार और चाय उनके उठते ही उन्हे मिल जाती....माँ के कहे एक -एक काम को वो पूरे मन से करती....सुरेश की ऑफीस की तय्यारी और अपने देवर के कॉलेज जाने तक उसे उसकी पसंद का नाश्ता करवाने में आज तक एक गलती नही हुई थी उससे...

पर आज उसकी सिर्फ एक भूल या मजबूरी में हुई गलती उसकी सब अच्छाइयो पर भारी पड़ गई थी। हुआ ये था कि आज उन सब को सुरेश की भुआजी के यहाँ उनके बेटे की सगाई में जाना था। घर के सभी काम ख़त्म हुए हि थे कि उसके पापा का फोन आया और उन्होने घबराए हुए लेह्जे में बताया कि उसकी माँ आँगन में फिसल गई थी...शायद उनकी हड्डी टूट गई थी और उन्हे डॉक्टर पर लेकर आये थे। वो अकेले पड़ गए थे क्योंकि उसका छोटा भाई भी काम से बाहर गया था और चाहते थे कि अनीता उनकी मदद करे।

ये ख़बर सुनकर वो भी घबरा गई थी और सासूमा और ससुरजी ने भी उसे वहाँ जाने को कहा था। बस शाम तक लौट आएगी, भुआजी के यहाँ जाने के लिये, ऐसा कहकर वो चली गई थी। माँ को वाकई में काफी चोट आई थी और डॉक्टर के यहाँ काफी समय लग गया...घर गए तो उन्हे दवाई देने, घर के कुछ ज़रूरी काम करने और रात का खाना बनाने में समय कहा बीत गया उसे पता ही नही चला।

जल्दीबाजी में घर आई तो सब लोग तय्यार होकर भुआजी के यहा जा चुके थे। सुरेश घर पर ही थे और गुस्से में उसका इन्तेज़ार कर रहे थे। उसके आते ही बरस पड़े थे...एक बार भी माँ का हाल, या दिन भर उसपर क्या बीती थी जानने की कोशिश नही की थी...

सासूमा ने भी वापस आकर उसे खरी खोटी सुना दी थी और ससुरजी ने उस सब में मूक सहमति जता दी थी। उसका देवर जो उम्र में उससे काफी छोटा था और जिसके प्रोजेक्ट बनाने के लिये वो कई बार रात भर जागी थी ने भी उसे careless करार दे दिया था।...ये वही careless भाभी थी जिसने कितनी बार उसे उसके भूलें हुए सामान को लेकर जाने की याद दिलायी थी...

हाँ हुई थी गलती उससे, और वो जानती थी की उसके समय पर ना आने से सबको बुरा लगा होगा पर क्यों उसके अब तक के सब अच्छे काम और अच्छाई पर ये एक बात भारी पड़ गई थी...उसे इतना कुछ कहने और उसे एक अपराधी महसूस करवाने से पहले किसी ने एक बार क्यों नहीँ सोचा कि उसने ये जानबूझकर नहीँ किया था...क्या शादी होने के बाद वो अपने मुसीबत में फँसे माता पिता की थोड़ी मदद भी नही कर सकती थी....क्या उसका कोई फर्ज नही था उनके प्रति और क्या इन सब का भी रिश्ता सिर्फ उससे था ...जिस घर और उसके लोगो की सेवा वो करते थकती नही थी वो इतने सम्वेदँहीन थे ये उसे आज पता चला था।

उनके लिये जब तक वो एक पर्फेक्ट बहू थी और सब काम ठीक से उनके मुताबिक कर रही थी , तब तक सब अच्छा था पर उसकी एक भी भूल उन्हे बर्दाश्त नही थी। ये वही सासूमा थी जो वैसे तो उसे बेटी कहती थी पर शायद उसकी जगह आज उनकी बेटी होती तो उनका रवैया अलग होता....और पापाजी को तो शायद याद भी नही था कि जब पिछले महीने वो बहुत बीमार थे तो कैसे रात दिन उसने उनकी सेवा की थी....पर सबसे ज़्यादा दुख उसे सुरेश के व्यवहार को देखकर हुआ था....कम से कम वो उसे समझ सकते थे और उसका साथ दे सकते थे।...पर शायद बहुत कम समय हुआ था उन्हे साथ में और उनके लिये प्यार का दम भरना आसान था, और निभाना मुश्किल..

नहीँ था ये उसका घर, और इसके लोग भी पराये ही थे क्योंकि अपने ऐसा बर्ताव अपनो के साथ नहीँ करते। वो बेटी नही इस घर की बहु ही थी जिसे अपने सभी पुराने रिश्ते नातों को भूलकर इस घर का होकर रहना था...गलती उसकी ही थी कि उसने खुद कि इतना बदल लिया था और उसकी अच्छाई को लोग उसकी कमजोरी समझ बैठे थे ...उसने सोच लिया था कि अब से वो भी उन्हे अपने अस्तित्व का अहसास दिलाएगी और सब कुछ सिर्फ़ अपना काम समझ कर करेगी और उतना ही प्यार और सम्मान देगी सबको जितना उसे मिलेगा। 

ये कहानी सिर्फ़ अनीता की ही नही हम में से बहुत सी ऐसी लड़कियों की है जो खुद को भूलकर और बदलकर अपने ससुराल के रंग में ढल जाती है। अपने फ़र्ज निभाना और घर के तौर तरीकों को अपनाना बुरा नही है पर किसी से ये उम्मीद करना कि वो अपने जन्म से बँधे हर रिश्ते को भुलाकर सिर्फ़ अपने ससुराल के बारे में सोचे क्या सही है...क्या शादी के बाद एक लड़की का अपने मायके और माता पिता से सम्बंध टूट जाता है या मुसीबत में भी उनकी मदद करना गलत है?....

क्यों हमारे समाज में एक बहु के दस अच्छे कामों की तारीफ भले ही ना हो पर उसकी एक छोटी गलती भी बहुत बड़ा मुद्दा बन जाती है और कोई भी उसे चार बाते कहने से पहले उसकी सब अच्छाइयां भूल जाता है। क्या साल के 365 दिन कोई सब कुछ ठीक ही करे ये उम्मीद कुछ ज़्यादा नहीँ है ... मेरे खुद के साथ कई बार ऐसा हुआ है कि बहुत कुछ सही करके भी अगर मैने पानी  कुछ कम गरम रख दिया या खाने में गड़बड़ हो गई या presswaale से किसी का एक शर्ट खो गया तो इसके लिये मुझे लापरवाही का ताना दिया गया ... ..एक  मिनिट नही लगता किसी को बहु की परवरिश और संस्कारो पर उँगली उठाने में । सब भूल जाते है उसके दिये हुए प्यार और सम्मान को और घर के प्रति उसकी निष्ठा को... क्या अपनी स्वयम की बेटी के साथ भी वो ऐसा करेंगे ?....

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