मैं तो माँ बन गई!!.. पर आप पापा कब बनोगे?..(true for some one)
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|   Jul 22, 2017
मैं तो माँ बन गई!!.. पर आप पापा कब बनोगे?..(true for some one)

शनिवार की रात थी और ऋषभ को ऑफीस से आए लगभग 4 घंटे बीत चुके थे। इन चार घंटों मे उसने और स्नेहा (उसकी पत्नी) ने एक कप चाय साथ मे पी थी और ऋषभ ने लगभग 2 घंटे tv देखने मे बिताये थे। एक घंटा ऑफीस के कुछ फोन कॉल्स करने में बीता था, और बचे हुए एक घंटे में saturday नाइट थी तो उसने सोशियल मीडीया चेक किया था। अबतक उसके दोस्तो के तक़रीबन तीन फोन आ चुके थे कि वो कुछ लेट नाइट पार्टी प्लान कर रहे है तो चाहते थे कि ऋषभ भी उसका हिस्सा बने। डिनर का वक्त हो चला था और स्नेहा और ऋषभ का चार महीने का बेटा, अरनब अब जाग गया था। स्नेहा कुछ दिनो से बहुत कोशिश कर रही थी कि अरनब की रूटीन कुछ ऐसे सेट करे कि वो उसे कम से कम डिनर शांति से करने दें पर ऐसा होता नही था। उसकी माँ ही बताती थी कि बच्चे अक्सर तभी जागते है या सुसु इत्यादि कर देते है जब उनकी माँ खाना खाने बैठती है। पता नही कैसे जान लेते है बच्चे ये सब?...और दिन का खाना तो स्नेहा का वैसे भी कुछ हल्का ही हो पाता था, अरनब की वजह से रात में भी वो ठीक से नही खा पाती थी।

डिनर तो स्नेहा तय्यार कर चुकी थी पर अब अरनब की naapy बदलकर उसे फीड करा रही थी। जब वो ऋषभ से ये एक्सपेक्ट कर रही थी कि अरनब को सम्भालने में ना सही डिनर सर्व करने में वो उसकी मदद कर दें तो ऋषभ ने उसे अपने दोस्तो के साथ की लेट नाइट पार्टी के बारे में बताया, और वैसे तो उनके हाव - भाव permission माँगने वाले थे पर स्नेहा जानती थी कि ऋषभ का बहुत मन था पार्टी में जाने का और वो उसके ना कहने पर भी चले ही जाएँगे।

ऋषभ जा चुका था और स्नेहा के सामने यूँ तो tv चल रहा था पर उसकी तस्वीरें उसके आँसुओं की वजह से धुँदलि पड़ गई थी और अरनब को गोद में लिये अब वो रो रही थी। डिनर तो उसने आधा -अधूरा सा हि किया था पर दिल तो अब ऋषभ की वजह से दुखी रहता था। क्या अरनब सिर्फ़ उसका बेटा था, ऋषभ का नही और क्या उसकी देखबाल की कोई जिम्मेदारी नही थी ऋषभ की? एक बार भी नही सोचा आज उन्होने अपने दोस्तो के साथ एन्जॉय करने जाने से पहले कि कितना इन्तेज़ार किया होगा उसने उनका, कि इस वीकेंड वो उसके साथ रहेंगे और उनके साथ वो सब बातें वो share करेगी जो वो इतने समय से उन्हे बताना चाह रही थी। कल सनडे था, औऱ उनकी छुट्टी थी, तो वो कुछ देर के लिये ही सही अगर अरनब को सम्भाल लेते तो वो सो सकती थी, नही तो ऐसा कुछ कर सकती थी जिससे वो भी relaxed महसूस कर सके। क्यों नही लगा उन्हे एक भी बार कि वो भी पिछले एक महीने से घर में ही कैद थी और सिर्फ़ कुछ समान लेने ही बाहर गई थी। उसका भी मन करता था कि वो खुली हवा में जाकर कुछ समय बिताये और हल्का महसूस कर सके। उसे भी आराम और थोड़े ऐसे वक्त की सख्त ज़रूरत थी जब कोई काम या जिम्मेदारी ना हो उसपर और वो अपने लिये कुछ कर सके। शायद बाल तक ठीक से नही बनाये थे उसने हफ्तों से औऱ आपनी डेलिवरी के बाद की मेडिसिन भी मिस खाना भूल जाती थी पर किसे परवाह थी उसकी?...

स्नेहा अक्सर ये सोचती थी कि कितना कुछ बदल जाता है एक लड़की की जिंदगी में जब वो पत्नी बनती है औैर अपने ससुराल आ जाती है।लड़के तो ज्यादातर अपने घर और लोगों के बीच ही रहते है और पति बनकर उनका जीवन कुछ ही बदलता है ,पर एक लड़की का तो बचपन और उससे जुड़ी हज़ारों चीज़े कही इतनी पीछे छूट जाती है कि कभी मायके जाए तो वहाँ पर माँ पापा से मिले लाड़ में उसका एहसास हो पाता है। वो बेपरवाही, वो सब कुछ सही से ना भी करने की आज़ादी , वो खुलकर हँसना और ढेरों नखरे करके अपनी बात मनवाना सब ख़त्म सा हो जाता है।

नए रिश्ते, जिम्मेदारियां और रीति रिवाजों के बोझ तले दबकर वो पत्नी और बहु बनकर खुद को अपने पति और परिवार की इच्छाओं और अपेक्षाओं के रंग में कुछ ऐसा ढाल लेती है कि अपना खुद का बहुत कुछ ख़त्म हो जाता है। स्नेहा को हमेशा से लगता था कि माँ बनना किसी भी स्त्री के जीवन में एक खास अनुभव होता है पर उसे ये एहसास तो माँ बनकर ही हुआ था कि जितने बदलाव माँ बनने के बाद एक स्त्री के शरीर और जीवन में आते है उतने तो पत्नी बनकर भी नही आते।

उसकी और ऋषभ की arranged marriage थी और ऋषभ की जॉब के चलते वो शुरू से ही अकेले रहे थे। ऋषभ के माँ पापा नए ख्यालों के समझदार लोग थे और स्नेहा उन्हे बहुत आदर देती थी। वो भी स्नेहा को बहु से ज़्यादा बेटी मानते थे और शादी के तीन सालों में स्नेहा को उनसे कोई शिकायत नही थी। वो जब भी स्नेहा और ऋषभ के पास रहने आते तो स्नेहा को बहुत अच्छा लगता था। हाल ही में ऋषभ के पापा की तबियत कुछ खराब रहने लगी थी और क्योंकि स्नेहा का मायका और ससुराल एक ही शहर में था तो उसकी डेलिवरी तो उसके माँ के ही घर में हुई थी पर सासुमा ने भी पूरी तरह उसका और उसके मायके वालो का सहयोग किया था।

अरनब को तीन महीने का करके ही वो वापस आई थी और उसका सारा उत्साह ये देखकर जाता रहा था कि वो तो माँ बन चुकी थी पर ऋषभ अब तक पिता नहीँ बन पा रहे थे। ऐसा नही था कि ऋषभ, अरनब की पैदाइश से खुश नही थे या उसे और अरनब को प्यार नही करते थे पर वो ये नही समझ पा रहे थे कि एक बच्चे को बड़ा करने में माँ के साथ - साथ पिता की जिम्मेदारी और सहयोग भी बहुत महत्वपूर्ण है।

स्नेहा ने तो पिछले कुछ महीनों में ढेरों बदलाव महसूस किये थे और खुद को उनमे ढालना सीख भी रही थी पर ऋषभ अब भी अपनी वही जिंदगी जी रहे थे और जीना चाहते भी थे जो वो पिता बनने से पहले जीते थे। 

ऐसा नही था कि स्नेहा उन्हे समझती नही थी। वो भली भाँति जानती थी कि ऋषभ पूरा हफ्ता मेहनत करते थे। किसी भी व्यक्ति की लाइफ में आज उसके काम को लेकर काफी स्ट्रेस रहता है और स्नेहा इस बात को बहुत अच्छी तरह समझती थी। वो जानती थी कि दिनभर ऑफीस का काम करके ऋषभ भी शारीरिक ही नही मानसिक रूप से भी थक जाते थे और उनके लिये आराम करना और relax करना ज़रूरी था। वो सिर्फ़ इतना चाहती थी कि ऋषभ भी ये समझें कि उसकी जिम्मेदारी अब सिर्फ़ घर चलाने तक ही सीमित नही थी और अरनब की देखभाल करने और उसे सम्भालने में वो बहुत थक जाती थी। खाना और सोना ही नही वो अपने उस पैजामा और टी शर्ट में रहते - रहते ये तक भूल चुकी थी कि वो पहले दिखती कैसी थी। वो दिन में तो घर और अरनब को सम्भाल लेती थी पर चाहती थी कि रात में और वीकेंड पर ऋषभ  भी उसके कुछ काम जैसे उसकी naapy और कपड़े चेंज करना, उसे नहलाना और उसे सुलाने में उसकी मदद करे। वो समझती थी कि ऋषभ के लिये ये सब नया था और उन्हे बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत थी पर उनका कोशिश ही ना करना गलत था औऱ उसे बेहद परेशान औऱ दुखी कर रहा था।

अरनब अभी बहुत छोटा था और जैसा कि अक्सर इस उम्र के बच्चे करते है वो कई बार रात भर जागता था और अपनी माँ को भी जगाता था। दिन के समय अगर सोता था तो ढेरों काम होते थे स्नेहा के पास करने को और हर थोड़ी देर में उसे फीड करवाना और उसके कपड़े चेंज करवाने में कई बार तो वो रो पड़ती थी। जबतक माँ के घर में थी तबतक फ़िर भी उसे बहुत सपोर्ट था पर पिछले एक महीने में ना उसने ठीक से नींद ली थी और ना ही ठीक से खाना खाया था।

कई बार जब अरनब पूरा-पूरा दिन रोता और ज़्यादा तंग करता था तो रात तक स्नेहा की हालत ये हो जाती थी कि उसे खुद चक्कर आने लगते थे पर फ़िर भी जब वो ये देखती कि ऋषभ तो अरनब को ठीक से गोद में लेने से भी कतरा रहे है और उसे सम्भालने में मदद करने की जगह tv देख रहे है या फोन पर व्यस्त है तो ���सका मन करता कि वो भी सबकुछ छोड़ क��� कही चली जाए और तभी वापस आए जब ऋषभ ये समझ जाए कि माँ के साथ- साथ एक पिता की भी आवश्यकता होती है एक बच्चे को।

अब बहुत हो चुका था और स्नेहा ने मन ही मन ये निश्चय कर लिया था कि अब उसे ऋषभ को उनकी जिम्मेदारी का एहसास करवाना होगा और इसके लिये वो उनसे बात ज़रूर करेगी।

ये कहानी सिर्फ़ स्नेहा की ही नही है ऐसे बहुत से couples है जिनमे इस बात को लेकर एक शिकायत रहती है कि जब वो माता -  पिता बनते है तो पत्नी तो माँ बनकर खुद को बच्चे के प्रति समर्पित कर लेती है और उस नए रोल में ढल जाती है पर पति तब भी वही जीवन जीते रहते है जो वो पिता बनने से पहले जी रहे थे।

एक स्त्री के लिये तो माँ बनने का एहसास कभी - कभी तबसे ही शुरू हो जाता है जब उसे ये पता चलता है कि एक नन्ही सी जान उसके अंदर साँस ले रही है। वक्त लगता है अपने शरीर और मन में हो रहे बदलावों को महसूस करने और समझने में पर नौ महिनों में एक अटूट सा रिश्ता जुड़ जाता है उससे । उसे जन्म देने की पीड़ा सहने के बाद जब वो उसे गोद में लेती है तो कहीँ ना कहीँ खुद से और उससे एक वादा सा कर लेती है कि अब वो उसकी जिम्मेदारी है और वो उसका पूरा ध्यान रखेगी। कहने से ज़्यादा इस बात को निभाना बहुत मुश्किल होता है पर खुद को भूलकर भी और कई मुश्किलो का सामना करके भी एक माँ इस वादे को आजीवन निभाती है।

एक पिता का रिश्ता शायद अपने बच्चे से वैसा नही होता जैसा एक माँ का होता है पर उनका दायित्व कहीँ से भी कम महत्वपूर्ण या कम जिम्मेदारी वाला नही है। बहुत ज़रूरत होती है एक नई माँ को अपने पति की और एक बच्चे को अपने पिता की। एक पत्नी जब माँ बनती है तो शायद वो उसके जीवन का सबसे कठिन दौर होता है। उसका शरीर प्रेग्नेन्सी और बच्चे के जन्म के दौरान हुई तकलीफों और बदलावों से उभर रहा होता है और मन इस बात को समझने और मानने की कोशिश कर रहा होता है कि अब वो माँ बन चुकी है और उसका जीवन बदल गया है। उसकी बाकी जिम्मेदारियों के साथ - साथ आती है एक नवजात शिशु की जिम्मेदारी जो अगर कोई एक हफ्ता भी निभाकर देखे तो समझ जाएगा कि कितनी मुश्किल होती है।

बच्चे जब बड़े होते है तब भी उनसे जुड़ी बहुत सी ऐसी बातें और चीज़े होती है जिनमे एक पिता का दृष्टिकोण, अनुभव और उनका साथ बच्चो की सही परवरिश में सहायक बनता है।बच्चो के जन्म से ही एक पिता का भी उनसे जुड़ना उतना ही ज़रूरी है जितना कि एक माँ का। ये मुश्किल है किसी भी व्यक्ति के लिये कि वो अचानक ही अपने जीवन को बदल ले और पिता बनते ही सबकुछ समझ औऱ सीख लें औऱ खासकर एक नवजात शिशु की देखबाल को लेकर किसी भी पुरुष में एक डर या संकोच हो सकता है,पर अगर कोई इससे जीतने की कोशिश ही करने से दूर भागना चाहे तो ये गलत है।

यहाँ कुछ सुझाव है जो इसमे आपकी मदद कर सकते है।

1. प्रेग्नेन्सी और बच्चे के जन्म के बाद एक स्त्री की शारीरिक और मानसिक स्तिथि नाजुक होती है। आपका उनके साथ बैठना, उन्हे समय देकर उनके मन की बात सुनना और समझना उनपर जादू सा असर कर सकता है और वो बहुत हल्का और supported महसूस कर सकती है। 

2. कई बार बच्चे के जन्म के बाद कुछ नई माएं postpartum depression महसूस करती है औऱ खुद भी अपने व्यवहार में आए बदलाव से अनजान औऱ परेशान होती है । उनके जीवन के इतने बड़े बदलाव को adapt करने में उन्हे समय लगता है। अगर उनका जीवनसाथी उनकी स्तिथि, मूड  swings, चिड्चिडापन इत्यादि को समझे औऱ धैर्यपूर्वक उनका साथ दें तो वो इससे जल्द निकल सकती है।

 3. अँग्रेजी में इसे hands on dad बनना कहते है और इसका मतलब है अपने बच्चे के छोटे -छोटे कामों में मदद करना। शुरू में आपको थोड़ी मुश्किल हो सकती है पर अगर आपकी पत्नी जिसने पहले ये सब कभी नही किया था , अब ये कर सकती है तो आप भी कर सकते है। बच्चे की nappy बदलना, उसे burp(डकार )दिलाना , और सोने में आपकी मदद बहुत एक बड़ा रिलीफ दें सकती है आपकी ऑलरेडी थकी हुई पत्नी को औऱ आपको अपने बच्चे की परवरिश के उन पलों को एन्जॉय करने का मौका मिलता है जो अविस्मरणीय होते है।

4. आप बिज़ी है औऱ आपको भी आराम औऱ मनोरंजन चाहिए इसमे कोई शक नही है पर रात का थोड़ा समय औऱ वीकेंड या छुट्टी पर अगर आप घर के कुछ काम में या बच्चे को सम्भालने में मदद करे तो ये आपके पार्ट्नर को थोड़ा आराम औऱ वो खाली समय दें सकता है जिसमे वो खुद पर ध्यान देकर relax हो  सकती है।

5. एक पति का अपनी पत्नी को ये विश्वास दिलाना कि उसकी पोस्ट प्रेग्नेन्सी बॉडी को लेकर उसे ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नही है औऱ ये बहुत नॉर्मल है औऱ समय के साथ वो खुद्पर ध्यान देकर वापस मेनटेन हो सकती है उसे मानसिक रूप पर बहुत तसल्ली दें सकता है। 

6. माँ बनने के साथ एक स्त्री की जिम्मेदारियां बहुत बढ़ जाती है औऱ उनसे ये उम्मीद करना कि वो हर काम पहले की तरह सही औऱ पर्फेक्ट करे ये गलत है । अगर घर पहले जैसा साफ नही है या अब खाना पहले जैसा नही बनता तो  शिकायत करने की जगह अगर आप अड्जस्ट करे औऱ कुछ मदद कर सके तो बहुत अच्छा है।

7. अंततः आपकी पत्नी  इस समय आपसे अपने लिये सपोर्ट एक्सपेक्ट करती है। ये सब उसके लिये भी नया है औऱ वो बहुत कुछ सीख रही है , तो परिवार में सबके सामने उन्हे सपोर्ट करना औऱ उन्हे दूसरी माओ से compare होने से या क्रिटिसिसम से बचाने में आप मदद करे तो बहुत अच्छा होगा। ये दौर आपके रिश्ते को भी मज़बूत बना जाता है।

मैं नही जानती कि मैंने कहाँ तक इस विषय को समझने औऱ समझाने में सही न्याय किया है पर ये कुछ सुझाव है जो नये बने माता - पिता के काम आ सकते है। 

अंततः मैं ये मानती हूँ कि आप अगर अपने परिवार के लिये समर्पित है और बहुत कुछ करते है उन्हे सुखी और खुश रखने के लिये तो जब आपकी पत्नी माँ बने तो आप भी अगर पिता बनने की कम से कम शुरुवात और कोशिश करे तो इसमे ज़रूर सफल होंगे औऱ उस सुख औऱ संतुष्टि का भी अनुभव कर पाएँगे जो अपने बच्चे को अच्छी परवरिश देने पर मिलता है।

 

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