पेट तो नहीं भरा, मन ज़रूर खुशी से भर गया
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|   Jun 16, 2017
पेट तो नहीं भरा, मन ज़रूर खुशी से भर गया

माँ, माँ कि तीन चीखे‍ं सुनकर, घबराई हुई सी मैं भागते हुये कमरे में आई, लगा जैसे बच्चों‍ को कुछ हो गया है । जैसे ही कमरे में आई, तो दोनो‍ बेटियों ने एक सुर में कहा, आप हमें खाना खिलाओ। करीब एक घंटे पहले जो खाना मैं उन्हे देकर गई थी, उसे उसी तरह प्लेट में देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया। इस काम के लिए इतना शोर मचाया इन्होंने, सोचकर बहुत गुस्सा आया, और दोनों को समझाया कि अब कुछ हि दिन में स्कूल खुलने वाले हैं, वहाँ कौन खिलाएगा, अपने हाथों से हि खाना पड़ेगा ना। दोनो ने बड़े प्यार से कहा, तब तक तो आप खिला दो।

बच्चे अगर पेट भर के खाना खा लेते हैं, तो माँ को अलग ही सुख मिलता है, जिसका एहसास हमें माँ बनने के बाद हि होता है। दुनिया में शायद हि कोई माँ ऐसी होगी, जिसने इस पल को ना जिया हो। एक एक निवाला, एक नए किस्से के साथ खिलाना, बच्चों‍ का हर थोड़ी देर में ना खाने का नाटक करना, और हमारा मनुहार करना। कभी दादा - दादी का, तो कभी नाना –नानी का, दीदी, भैया, पापा, मामा, मामी,बुआ  ऐसे ना जाने कितने हि रिश्तों कि पहचान, बच्चों‍ को उन छोटे छोटे निवालों से करवाई है हमने।

याद है जब माँ हमारे पीछे पीछे दौड़ती थी खाने के लिए, सारे दिन क्या खाना है, क्या नहीं पूछ्ते रहती थी, कितना चिड़ते थे ना हम। कभी- कभी झिड़क भी देते थे, ये बोल के कि बना लो जो बनाना है, और फिर बेचारी जो बनाती, उसमें भी नखरे होते। उस समय हम अपनी हि दुनिया में मगन रहते थे, ये माँ का खाने के पीछे पड़े रहना, कभी दूध पी लो चिल्लाना, कभी ये कहना कि जल्दि खाना सीखो, इस तरह खाना रखकर अन्न का अपमान मत किया करो। ये सब हमारे प्रगतिपथ की सबसे बड़ी बाधा लगती थी। लगता था, मानो हम देश के किसी दुश्मन को खत्म करने ही वाले थे, और अचानक देखा तो बंदूक में गोली नहीं। और गुस्से में बड़बड़ाते थे, भला इस तरह भी अन्न का अपमान होता है क्या? माँ तो बस पीछे ही पड़ी रहतीं हैं, इन्हें लगता है कि जल्दि से हम खाना खत्म करें और ये फुरसत हो जायें। कुछ ऐसा हि सोचते थे ना हम !!!

आज जब खुद माँ बने तो समझ आया, कि क्यों माँ ये सब कहती थी और करती थी। खाने कि थाली अगर सामने रखी हो, और आप उसे देर तक ना खाएं तो उसमें से भी स्वाद चला जाता है । कहते हैं कि आप जीवन में जिस भी चीज़ कि कदर करते हो, वो हमेशा आपके पास रहती है, और जिस चीज़ कि बेकद्री करो, फिर जीवन में वो चीज़ बहुत तरसाती है। शायद इसीलिए हर लड़की शादी के बाद अपनी माँ और उसके हाथ के स्वाद के लिए तरस जाती है। और सिर्फ लड़की ही क्यों, लड़के जो बाहर जाते हैं, पढने या नौकरी करने, वो भी तो अपनी माँ के हाथों का स्वाद हर जगह ढूढते हैं। जो खुशनसीब होते हैं, उन्हें ये सुख मिल ही जाता है।

ना जाने ऐसी कितनी हि बातें सोचते सोचते मैंने दोनों को खाना खिलाना शुरु किया, मैं वो माँ तो नहीं हूं, जो ये कहे कि बच्चों को खाता देख मेरा भी पेट भर गया। पर हाँ, मन ज़रूर खुशी से भरा भरा सा लगा ।    

 

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