काकी माँ (एक सच्ची कहानी )
29198
39
3
|   Jul 31, 2017
काकी माँ (एक सच्ची कहानी )

आज नरेन चाचा को पसीने पोछते हुए सब्जियों का भारी थैला ले जाते हुए देखकर काकी माँ की याद गयी ! शायद वो इतनी प्रोडक्टिव नहीं होंगी घर के लिए,तभी उन्हें घर में सोने , टॉयलेट और नहाने जाने तक की ही अनुमति थी | अपने बेटे तरुण को जब वह बड़ा कर रहीं होंगीं तो शायद सोचा न होगा कि एक दिन वो उनका अपने घर में ही मिनटों का हिसाब रखेगा | काका रेलवे के रिटायर्ड क्लर्क थे और काकी माँ ने बड़ी ठसक की जिंदगी गुजारी थी | मज़ाल थी कि उनकी तांत की साडी में कलफ न पड़े |

सारे दिन एक समान नहीं होतें | तरुण की शादी हुई और काकुली ने पहले दिन से ही घर की कमान हाथों में ले ली | तरुण था कि उसके लम्बे बालों और गोरे चेहरे में लट्टू होकर रह गया | छोटी छोटी बातों को इतनी बड़ी बना देना पता नहीं ये फन कहाँ से सीख कर आयी थी काकुली !

उसका काला जादू कुछ ऐसा चला कि काका ४ साल घर के रोज़ रोज़ के कलह से तंग आकर एक मध्यरात्रि ऐसे निकले कि कभी घर लौट कर नहीं आये | कहते है कि कुछ जुगाड़ के लिए गए और एक्सीडेंट का शिकार हो गए | रिटारयमेंट के बाद मिली जमा राशि जब उन्होंने अपने पुत्र -रत्न को थमाई थी ,उन्हें रत्ती भर अहसास नहीं हुआ होगा कि जिसे वो अपने बुढ़ापे की लाठी समझ रहे थे ,वो उनके पैरों के नीचे से एक दिन जमीन ही खींच लेगा| एक्सीडेंट में हुई काका की मौत से उनको पहचानना मुश्किल था | शरीर पर पाए गए बटुए चश्मे और पैनकार्ड से उनकी पहचान कर तरुण ने उनका अंतिम संस्कार कलकत्ते में ही कर दिया |

काकी माँ ने न तो काका की एक्सीडेंट की बात पर विश्वास किया न मरने पर यकीं किया |

अब काकुली को रहा सहा भय भी न रहा | खुल कर काकी माँ पर अत्याचार करती | तरुण जब ऑफिस से आता ,काकी माँ खिलाफ लम्बी -चौड़ी शिकायत की लिस्ट उसे रोज़ तैयार मिलती | रोज़ रोज़ के इन शिकायतों के लिस्ट वो परेशान होने लगा | ऐसे धीरे धीरे 2 वर्ष गुज़र गए | काकुली का बेटा अब 5 साल गया था| माँ के साथ काकी माँ को परेशान करने की तरकीबों में वो भी शामिल हो गया| उसे समझदारी की बातें सीखाता भी तो कौन ? माँ उसे हर दिन इनाम में एक चॉक्लेट दिया करती और साथ में उसे शाबाशी भी मिलती|अब वह माँ का राजा बेटा था | इससे ज्यादा जानने की उसकी अकल भी न थी | और जब काकी माँ के बेटे को काकी माँ की वैल्यू पता नहीं थी तो छोटे से बच्चे से क्या उम्मीद की जा सकती थी ?

धीरे धीरे काकुली ने तरुण को मना ही लिया कि वो अपनी माँ को घर से बाहर निकाल दे | इतने दिनों तक काकी माँ जिस झूठ को अपने हंसी से छुपाते आ रही थी ,आज सबके सामने आ गया था | वरना उनके बिस्तर पर पानी गिरा देना ,चश्मे छुपा देना ,उनके रूम की लाइट ऑफ कर देना जैसी बातों को सहती आ रहीं थी और किसी को इसकी भनक न लगने दी |

"बेटा मुझे मत निकालो ,कहाँ रहूंगी मैं " बोलती रह गयी काकी माँ ने पर बेटे ने एक न सुनी |

बाहर पार्क किये ऑटो में जैसे तैसे रात बिताई और सुबह वापस अपने बेटे से हाथ जोड़कर विनती करने लगी ,बहु की ज़ोरदार आवाज़ ,और पोते का यह कहना दादी गन्दी है,घर में यहाँ वहां सुसु करती है और फिर रविवार की दोपहर - सबने ये आवाज़े सुनी |

सारे महल्लेवालों ने तरुण को समझाया, फिर तरुण ने कुछ शर्तों पर माँ को घर में एंट्री दी | अब काकी माँ घर में केवल रातों को सो सकती थी और सुबह टॉयलेट का इस्तेमाल कर उन्हें घर से निकलना होता था | काकी माँ अब अपना समय कभी इस घर और कभी उस घर में बिताने लगी ,पर मज़ाल है कि अपने दुखड़ा दुसरे को सुनाये | धीरे धीरे वो सड़कों की खाक छानने लग��� | चुप सी हो गयी थी वो |

मुझसे जितना बन पड़ा किया| उनकी फटी साडी में पैबंद देखकर नयी साड़ी लेकर दिया पर उन्होंने लौटा दिया | बेटे के घर रहतीं हूँ ,यह साडी तो पुरानी है सो मुलायम है इसलिए पहने रहती हूँ | चप्पल खरीद के दिया तो कहा नंगे पैर चलो तो आँखों की रौशनी बढ़ती है,इसलिए ऐसे चलती हूँ | चप्पल तो घर पर रखें है | एक रात घर का दरवाज़ा खटखटाकर कम्बल माँगा तो दूसरे दिन लौटा दिया कि मेरा कम्बल गीला हो गया था इसलिए तुमसे लिया ,अब वापस ले लो | उनकी तार तार हुई किस्मत को जो वो अपनी बातों से ढांक रही थी ,मेरी हिम्मत ही न हुई उन्हें आइना दिखाने की ! कि कभी बोलू काकी माँ हमें सब पता है तुम ये साडी,चप्पल और कम्बल रख लो |

हाँ रोज़ मेरे पति उन्हें 10 रूपये दिया करते जिसे वो कभी "ना" नहीं कहती | शायद इडली उनकी कमज़ोरी थी या पोपले हुए मुँह की ज़रूरत !

तीन दिनों के बाद जब मैं Mysore से लौटी तो गाजे बाजे की आवाज़ आयी | दरवाज़ा खोल कर देखा तो पाया कि काकी माँ अब इस दुनियाँ में नहीं रहीं ]और यह गाजे बाजे के साथ उनकी अंतिम रथ यात्रा उनका बेटा करा रहा था | मन में एक तिक्तता सी आयी | प्रणाम करके दरवाज़ा बंद कर लिया | काकी माँ शायद आपको मुक्ति मिल गयी होगी |

सोंच में पड गयी कि जिन्दा आदमी को जब आप एक एक चीज़ को तरसाते हो और उसकी मौत को जश्न की तरह मनाते हो तो इसका क्या फायदा ?

मरे हुए शरीर पर दो कोयले ज्यादा रख दो या दो फूल ज्यादा चढ़ाकर गाजे बाजे बजवा लो ,न तो वह कोयले देखने आता है न फूल ! जरुरत है जिंदगी को जश्न के रूप में मनाने की !

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day