माँ जैसी सास...
39172
60
307
|   Mar 14, 2017
माँ जैसी सास...

  1. जब एक नई बहू घर आती है तो हर सास की बहुत सी उमीदें होतीं है। बहू स्वादिष्ट भोजन  पकाएं ,सुबह जल्दी जाग जाये ,घर मे सबका सम्मान व सबसे प्यार से बात करे ।पर कहीँ ना कहीँ बहू को सास की यही अपेक्षाएं बहुत बडी लगने लगती हैं । क्योंकि माँ नहीँ वो सास होती है । माँ भी यही सिखाती  आई है लेकिन जब ये सारी बातें  सास बोलती है तो क्यों नई लगती है ?
सास जब बहू से अपेक्षा रखती हे तो उस अपेक्षा में अपनापन होता है ,एक अधिकार की भावना होती है  , हाँ शायद बेटे को खो देने का थोड़ा सा डर होता है लेकिन बहु को बेटी सा प्यार देने की बहुत सी चाहत होती है। आखिर क्यों ये चाहत एक बेटी समझ पाती है पर एक बहु नहीँ समझ पाती है ? माँ की डाँट में अपनापन और सास की बात में ताना क्यों ढूंढ़ती है ?माँ जब मर्यादा में रहने को कहे  तो परवरिश और सास की मर्यादा की  बातें जंजीर क्यों लगती हैं ?माँ जब बार बार घर  जल्दी आने को कहे तो उसकी चिंता पर सास की बातें नाटक क्यों लगती हैं ? क्यों नहीँ बेटी मायके से ससुराल  की बजाय अपने पहले घर से दूसरे घर जाती है ? क्यों नहीँ वो इस नई माँ को भी अपनी माँ स्वीकारती है ? माना की बहु की बहुत सी उमीदें सास और ससुराल से होती हैं पर क्या प्यार और सम्मान  देने की पहल बहु नहीँ कर सकती है ? क्यों वह सास की डाँट में प्यार और मर्यादा में रहने की हिदायद को अपनापन नहीँ समझ सकती है ?इस उम्र में जब सास को भावनात्मक सहारे की ज़रूरत  ठीक वैसे होती है जैसे माँ  को तो क्यों एक बहु अपनी भावनात्मक जिम्मेदारियों से  मुँह फेर लेती है ?

आओ एक क़दम हम चलते है और एक क़दम वो चलते हैं सास और बहु के रिश्ते की एक नई परिभाषा  बुनते हैं ।उन्हे प्यार देते हैं उन्हे सम्मान देते हैं ।थोड़ी उनकी सुनते हैं थोड़ी अपनी कहते हैं । इसी जिंदगी में माँ की एक नई छवि ढूँढते हैं । 

मेरी प्यारी सी सासू माँ के लिये । 

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day