प्यारा सा बंधन
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|   Jul 14, 2017
प्यारा सा बंधन

फ़ोन काफी देर से बज रहा था पर मैं बेमन से अपना सामान पैक करने में लगी हुई हुई थी।

आखिरकार मैंने फ़ोन पिक कर ही लिया।

"हेल्लो,कब से फ़ोन कर रहा हु, पिक क्यों नहीं कर रही"उधर से मेरे भाई की आवाज आई।

"कुछ नहीं वो सामान पैक कर रही थी" मैंने जवाब दिया।

उसने मेरी आवाज से ही पहचान लिया की मैं कुछ उलझन में हु और उसे पता भी था की मेरी उलझन क्या है।

"अच्छा सुन, तेरे वहाँ शिफ्ट करने के दो दिन बाद मैं आऊंगा वहाँ"

उसका इतना ही कहना था कि मेरे चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी।

मैं कभी घर से दूर नहीं रही। हमेशा अपनों के आस पास,अपनों में घिरी हुई रही। शादी के बाद ससुराल में भी अपनापन मिला जिसने घर से दूर होने के दर्द को कुछ कम किया। पर अब हस्बैंड की जॉब के चलते हमे मंगलौर शिफ्ट होना पड रहा था। अंजान शहर में अकेले रहने भर का ख्याल मुझे परेशान कर रहा था। शायद इसी बात को मेरा भाई भी जानता था। वो 4 साल से बंगलौर में जॉब कर रहा था,बस यही एक बात थी जो मुझे थोड़ी सी तसल्ली दे रही थी।

हमने शिफ्ट कर लिया,और आने के वादे अनुसार वो हमसे मिलने आया। तब से वो हर फ्राइडे ऑफिस से जल्दी आ कर रात भर सफर करके सुबह मंगलोर पहुँचता, फिर रविवार की रात भर सफर करके सोमवार की सुबह पहुच कर ऑफिस जाता। इन दो दिनों में मेरा बेटा,जो तब 1.5 साल का था उसको दो मिनट के लिए भी नहीं छोड़ता था। वो थकान होने के बावजूद भी उसके साथ खेलता,उसे घूमता। वो जितना अच्छा भाई है,उससे ज्यादा अच्छा मामा है। वो हम दोनों बहनों से छोटा है,हमेशा हमने उसको वैसे ही ट्रीट किया। उसको हमेशा ये शिकायत रहती थी की पापा मुझको और मम्मी मेरी छोटी बहन को प्यार करते है,और उससे कोई प्यार नहीं करता।उसे क्या पता था, वो हम सब की जान है। मेरी और बहन की शादी के टाइम पुरे दिन भाग दौड़ करता रहा,हर इंतेजाम हमारे हिसाब से किया। हर रस्मो के बीच में छुप छुप कर रोया।बचपन में लड़ाई के समय वो ही कहता था कि अच्छा है ससुराल चली जायेगी तो शान्ति मिलेगी,और जब सच में जाने का समय आया तो वो हाथ पकड़ कर रोक लेना चाहता था।आज भी जब भी फ़ोन करता है,तो ये कहना नहीं भूलता की कोई दिक्कत हो तो बता दियो।

मेरे पेरेंट्स ने जितने भी गिफ्ट,खिलौने मुझे दिए उन सब में से सबसे अनमोल गिफ्ट्स है मेरे भाई,बहन। बचपन की लड़ाईया हो,या आज की जिंदगी की मुश्किलें,सब हमने एक साथ ही किया है। लुका छुपी खेलते खेलते कब समय बीत गया पता ही नहीं चला। और जिंदगी के इस सफर में हम एक नाव सा बन कर बहते चले गए। किसी को एक लहर जिंदगी के समुन्दर में उत्तर की तरफ ले गयी,तो किसी को दक्षिण की तरफ। हम बहते चले गए,क्योंकि इसी का नाम जिंदगी है। पर इस बहाव में भी,हम एक दूसरे से जुड़े हुए थे। जैसे ही किसी की जिंदगी में कोई तूफ़ान या परेशानी आयी तो दूसरा,धाराओं के विपरीत बह कर भी,सहारा देने आया। यही तो है भाई-बहन का प्यार। सिर्फ भाई -बहन नहीं,बहन-बहन का भी। siblings एक वरदान की तरह होते है।

बचपन में रुलाते है,हँसते है,डाँट पढ़वाते है,तो कभी डांट से बचाते है। रिमोट पर चैनल बदलने से लेकर,कौन से कॉलेज में एडमिशन लेने तक ऐसा कोई टॉपिक नहीं है,जिस पर हम न लाडे हो। हर राखी पर उसे मेरी राखी न पसंद आना, और मेरा उसके गिफ्ट पर मूहँ फुलाना आज तक जारी है।  ये बंधन ही हमे एक बेहतर इंसान बनाते है। ये सिर्फ एक रिश्ता ही नहीं है,बल्कि हमारे अस्त्तिव के एक हिस्सा है,जिसके बिना शायद जिंदगी की कल्पना करनी मुश्किल है। जैसे जैसे हम जिंदगी के सफर में मक़ाम दर मक़ाम आगे बढ़ते जाते है,अपनी नयी जिम्मेदारियों में उलझते जाते है,वैसे वैसे कभी क़भी कुछ रिश्तो पर धुल जी जम जाती है,जिसको झाड़ना हम भूल जाते है। ये रिश्ते ही है जो हमे जिन्दा रहने का एहसास करा ते है। हर रिश्ता अनमोल है,हर रिश्ता ज़रूरी है। 

तो जाइए, जिन रिश्तों पर धूल जम गई है,उन्हें झाड़ दीजिये।

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