व्रत, पूजा और मैं
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|   Jun 05, 2017
व्रत, पूजा और मैं

उफ़ एक और पूजा ,,, जबसे शादी हुई है कभी ये त्यौहार कभी वो  ,, जैसा की हर भारतीय परिवार में होता है शादी होते ही हम सब को सारे ट्रेडिशन फॉलो करने पड़ते है ,,, कोई हमसे नहीं पूछता आप ये करना चाहते हो या नहीं ,,, क्या आप इन सब मैं विश्वास करते हो , पर ये सब कोई मायने नहीं रखता , और रखे भी क्यों ,, हमारे बडो ने की है तो हमें भी तो ट्रेडिशन फॉलो करना ही है ,      

पर कोई इस दिल से पूछे जिसे भगवान् में विश्वास तो है , जिसके मन में श्रद्धा तो है पर उसे मूर्ति पर कुमकुम चावल चढ़ाने में कोई इंटरेस्ट नहीं आता , क्या सच में एक बड़ी सी पूजा थाल सजाकर उसमे रखे रोली, मोली, दीपक, भोग वगैरह भगवान् की मूर्ति को चढ़ाने से वो सच में खुश हो जायेंगे और सब मनोकामना पूरी कर देंगे, जाने क्यों ये सब मन नहीं मानता ।।  

   अगर इसमें लॉजिक ढूँढू तो पुराने ज़माने में लोगो के पास मनोरंजन के कोई साधन नहीं थे , आदमी खेतो में काम करते और औरते घरो में,  अब आदमी तो खेतो में जाते , शिकार पर जाते , मन हुआ जहा घूम आते तो उनका मन बहल जाता पर बेचारी औरते क्या करे ,,,, दीवाली , होली, रक्षाबंधन और बसंत पचमी यही चार पांच त्यौहार होते जब औरतो को रूटीन लाइफ से छुट्टी मिलती पर नयेपन और मन को बहलाने को  कुछ और भी चाहिए था तो इस बोरियत को दूर करने के लिए त्यौहार बनाये गए ,,

  वट सावित्री पूजा, कभी नागपंचमी या गणगौर,  तिल चौथ, करवा चौथ आदि , तो उस टाइम औरतो को लगता था की कुछ है जो सिर्फ उनका है और उनके लिए है वो इसे बड़े मन से,  श्रद्धा से करती ,,,,, और ये उनकी जिंदगी में एक नयी उमंग और उत्साह लेकर आता , और ये बहुत प्यारी सोच थी ,, 

पर आज की तेज भागती दौड़ती लाइफ जहा हम पढाई भी करते है,  जॉब भी करते है,  या कभी आपकी तबियत ख़राब हो और सबसे बड़ी बात आप करना ही नहीं चाहती हो फिर भी आपको करना पड़े तो क्या ये सही है ,,, मैंने देखा है कई लेडीज फीवर है या कोई और प्रॉब्लम ,,, जैसे तैसे पूजा करेगी ही ,,,कयी लेडीज करवा चौथ का व्रत सिर्फ इसलिए रखती है क्युकी बड़े कहते है ,,, क्या भगवान् इससे खुश होंगे ,,, कोई जॉब करती है सुबह चाहे कुछ भी हो जाये पूजा करके जाओ चाहे ऑफिस मैं डाट पड़े, लेट हो जाये ,,, या सब काम करते करते उस बेचारी का थकान से बुरा हाल हो जाये पूजा तो करनी ही है ,,, क्या इस सब से ख़ुशी मिलती है ,,, मुझे लगता है या तो ये उनकी आदत मैं आ गया है या सिर्फ फॉर्मेलिटी बनकर रह गया है ,,, पर जो चीज़ हमारी लाइफ में खुशी, उत्साह और उमंग लाने के लिए बनी थी उसे बोझ क्यों बनाना , अगर करना ही हे तो ख़ुशी से करे, मन से करे वरना नहीं ,,,,  इसे कंपल्सरी क्यों करना ,,,

आज मनोरंजन के लिए टीवी है, मोबाइल है, मैगजीन्स है, लोग आउटिंग पर, पिकनिक पर, वैकेशंस  पर जाते है तो कही न कही इन सब की वैल्यू कम हुयी है,,, आप मुझे बताइये अगर मेरे मन में इन सब चीजो के लिए कोई श्रद्धा नहीं आती, न तो मुझे आरती में इंटरेस्ट आता है और न ही रोली , मोली में ,,,  पर मैं जब भी किसी मंदिर के आगे से गुजरती हुँ तो श्रद्धा से सिर झुकाकर हाथ जोड़कर उन्होंने मुझे जो भी दिया उसके लिए उनका शुक्रिया अदा करती हुँ और अपने परिवार की खुशिया बनी रहे ये दुआ मांगती हुँ ,, तो क्या मेरे भगवान् मेरी सुनेगे या उन्हें मानाने के लिए ये सब पूजा पाठ करने पड़ेंगे ,,, 

मुझे क्या करना चहिये। 

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