अगर आपकी सांस ने आपका जीना मुश्किल कर रखा है, तो इसके लिए वो ज़िम्मेदार नहीं है; ज़िम्मेदार है आपकी नासमझी! (Satire)
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|   Jan 17, 2017
अगर आपकी सांस ने आपका जीना मुश्किल कर रखा है, तो इसके लिए वो ज़िम्मेदार नहीं है; ज़िम्मेदार है आपकी नासमझी! (Satire)

याद कीजिये जब बचपन में आप सुबह जल्दी नहीं उठती थी तो आपके बाबा आपसे क्या कहते थे –

“अरे जल्दी उठने की आदत डाल ले वर्ना ससुराल जाकर क्या करेगी?”

ऐसा ही कहते थे न?

जब आप अपनी माँ को शरारत करते हुए कोई उल्टा जवाब दे देती थी तो आपकी माँ क्या कहती थी –

“पता नहीं सांस के आगे क्या करेगी ये लड़की।“

ऐसे ही डरती थी न आपकी माँ ?

जब आप अपने भैया से जिद्द करके कोई चीज़ ले लेती थी तो वो क्या कहते थे?

“ले ले, ससुरालवाले नहीं झेलेंगे तेरे ये नखरे”

ऐसे ही चिढाते थे न भैया?

जब आप माँ के खाने में नुक्स निकालती थी तो .....

बचपन की ऐसी कई मीठी यादें होंगी जिन्हें याद करते करते शायद दिन गुज़र जाए। पर इन सभी बातों के ज़रिये, हंसी ठीठोली में ही सही, आपको बार बार ये समझाया गया था कि ससुराल मायके जैसा बिलकुल भी नहीं होगा।

फिर आप क्या उम्मीद लेकर यहाँ आई थी?

शादी के बाद पहले ही दिन आपने सुबह उठने को लेकर कहे अपने बाबा के शब्दों को याद रखा होता, तो आपको मालूम होता कि चाहे आपके पति ने आपको रात भर सोने न दिया हो, चाहे आपकी सांस भी इस रात के बारे में अच्छी तरह जानती हो, चाहे आप शादी के महीनो की तयारियों की थकान से चूर हो कर थोडा सुस्ताना चाहती हो पर अब आप ससुराल में आ गयी है और यहाँ आपको सबके उठने से पहले उठ जाना है।

और अगर कहीं आपके उठने से पहले किचन में चाय बन गयी तो ये तो आपको पहले ही पता होना चाहिए की सांस का तो जन्म सिद्ध अधिकार है आपको ताना देना।

अगर सांस आपसे कहे कि ऐसा आइन्दा नहीं होना चाहिए तो आपको इतना सा भी बुरा नहीं लगना चाहिए। आखिर बहु है आप उनकी, तो क्या हुआ कि उनके बेटे के पास भी वही डिग्री है जो आपके पास है, तो क्या हुआ कि आपको भी उतने ही नाजो से पाला गया है जितना आपके पति को आपकी सांस ने पाला है, फिर भी इस बात को समझिये कि बहुओं में सुबह जल्दी उठने का ये एक्स्ट्रा टैलेंट तो होना ही चाहिए।

अच्छा अब बात आती है खाने की! तो भाई क्यूँ रखे वो कुक? आखिर बरसों उन्होंने अपने बेटे को खाना इसी उम्मीद से तो खिलाया है कि एक दिन ये खाना खाके वो इतना बड़ा हो जाए कि एक परमनेंट कुक, याने की आप, हां जी समझ आया, ‘आप’ को ला सके। अरे तो क्या हुआ कि आपकी मम्मी ने भी आपको खाना खिलाया है, या आप भी पढाई लिखाई के चक्कर में खाना बनाना नहीं सीख पाई। ये तो कोई बहाना नहीं हुआ भाई!

अब घर के बाकी काम! क्या कहा आपने... आपकी ननद? देखिये वो तो अपने ससुराल जाकर पिसेंगी न... उनकी सांस भी तो वहां एक मिनी सांस टाइप ननद के साथ उनका वहां इंतज़ार कर रही होंगी। तो घर के बाकी काम भी आप ही करेंगी! बस! कोई बहस नहीं!

अच्छा बहस से याद आया! माँ की बात याद है न? आपको यहाँ बहस तो दूर की बात, पलट कर कोई जवाब भी नहीं देना है। जो भी आपकी सांस कहे उसके जवाब में सिर्फ कहे, “हाँ जी मम्मी जी”! और वैसे तो कोई पूछेगा नहीं पर गलती से भी कोई दूर का रिश्तेदार कभी पूछ ले कि “बहु यहाँ कोई तकलीफ तो नहीं है?” तो आपको क्या कहना है? अरे नहीं कमर में दर्द के बारे में नहीं बताना है, कहना है “नहीं नहीं, सब बढ़िया है यहाँ।“

भाई के साथ किये हुए नखरो के बारे में तो अब आप भूल ही जाए। धीरे धीरे आपकी समझ में आ जायेगा कि नखरों की क्या, आप जिसको अपना घर समझती है, उस ससुराल में आपकी छोटी छोटी ख्वाहिशों के लिए भी कोई जगह नहीं है।

चाहे आप बीमार हो, आपका बच्चा छोटा हो, आप घर ऑफिस दोनों संभालती हो या किसी मानसिक परेशानी से जूझ रही हो, आपको हर पल, हर घडी उस टी.वी सीरियल वाली गाय जैसी बहु की तरह हँसते-मुस्कुराते हर वो काम करना होगा जो आपको धीरे धीरे इंसान से एक पुतला बना देगा! एक जीता जागता, सांस लेता हुआ पुतला!

अगर आप ये सब नहीं करेंगी तो आपको घर तोड़ने वाली कहा जायेगा। आप सच में अगर अपनी सांस को अपनी माँ की तरह समझके कहेंगी कि आप भी जीना चाहती है, तो आप बुजुर्गो का आदर न करने वाली कहलाएंगी। अगर आप अपने पति से सालो बाद भी कभी ये कहेंगी कि इस बार वो अपने घरवालो को महेंगे तोहफे न देकर उन पैसो से एक बार आपको कहीं घुमाने ले जाए जहाँ आप सुकून की सांस ले सके, तो आपको स्वार्थी ठहरा दिया जायेगा। अगर आप सोचेंगी कि जैसे आप ससुराल को अपना घर समझ कर सारा काम करती है वैसे ही आपकी सांस आपके घर को अपना घर समझके आपका हाथ ही बंटा दे तो आपको सच में बहुत ट्रेनिंग की ज़रूरत है। देखिये नियम ऐसा है – ‘आप सांस के घर में नौकरानी और सांस आपके घर में वी.वी.आई. पी माने वैरी वैरी इम्पोर्टेन्ट पर्सन’। तो ध्यान रहे गिरते पड़ते मरते खपते हर हाल में उनकी सेवा में 5 स्टार होटल जितनी सुविधा होनी चाहिए।

तो फिर क्यूँ नहीं समझती आप... कि आपकी तकलीफों का कारण आपकी सांस, आपके पति या इस समाज की घटिया सोच नहीं बल्कि आपकी अपनी नासमझी है कि ससुराल आपका अपना घर है, सांस माँ सामान है और आप उस घर की बेटी है!

अब तक जो भी आपने पढ़ा वो एक व्यंग था! पर क्या सच में हम औरते अपनी दुर्दशा के ज़िम्मेदार नहीं है? हमे बचपन से अपने लिए खड़े होना नहीं सिखाया गया, शायद यही कारण है कि हम हर गलत बात को ‘बड़ो का सम्मान’ का नाम देकर चुपचाप सहती रहती है। पर अब भी देर नहीं हुई है... अपने लिए बोलिए और इंसान की तरह जीना शुरू कीजिये... पुतले की तरह नहीं!

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