क्या दिन थे वो। नानी के घर के।
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|   May 31, 2017
क्या दिन थे वो। नानी के घर के।

ज़िन्दगी आपको कैसा कैसा समय दिखाती है। आज जब मैं पीछे मुड़ के देखती हूँ तो लगता है बीते दिन कितने अच्छे थे ना।  मुझे अच्छे से याद है मैं बहुत छोटी थी तबसे नानी के घर जाने का मेरा रेगूलर रूटीन था। जब बहुत छोटी थी तो मम्मी शायद इसलिए भेज देती थीं क्यूंकि बड़े परिवार के काम काज और मेरे छोटे भाई की देख रेख में उनको मेरा ध्यान रखने का टाइम नहीं मिलता था। मेरी पांच मौसियां हैं, उनके साथ मेरे बचपन का काफी समय कटा है। नानी के घर जाके लगता था में कोई राजकुमारी हूँ, पाँचों मौसियां अपने अपने तरीके से मुझपे बहुत प्यार लुटाती थीं। मैं अपने नाना नानी के घर की पहली नयी पीढ़ी की थी ना शायद इसलिए भी। उन सब को मौसी बनने का क्रेज होगा. नानाजी DESU कॉलोनी में रहते थे, खुली जगह, पेड पौधे बड़ा मज़ा आता था। मौसियां तो थी ही सहेलियों के जैसी। ऐसा नहीं है की अपने घर में कुछ कमी थी वहां भी बड़ा भरा पूरा परिवार था दादा, दादी, चाचा, बुआ सब। लेकिन वहां सब रिश्ते अपनी अपनी जगह थे और नानी के घर में मौसियां अलग अलग रिश्ते जैसी थी। बड़ी वाली दो मौसियां बिलकुल माँ जैसी डांटने डपटने वाली। बाकी २ मौसी बहनो जैसी सिखाने समझने वाली और छोटी वाली मौसी का तो क्या कहूं वो तोह हमेशा से दोस्त जैसी रही है। गप्पे मारने वाली हंसने ठहाके लगाने वाली, उसने मुझे बहुत सारी जगह घुमाया भी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस, अप्पू घर, कनॉट पैलेस, कालकाजी मंदिर और भी बहुत जगह।

नाना नानी से भी बहुत लाड प्यार मिलता था। नानी कभी कभी कहती थी की तेरा एक मामा होता तो अच्छा होता, लेकिन मैं तो बचपन से मूंह फट थी झट से बोल देती थी "नानी अगर मामा होता तो पता नहीं मामी को मेरा बार बार आना अच्छा लगता या नहीं और फिर तू भी अपने पोते पोती को हमसे ज्यादा प्यार करती।" पहले मम्मी भेजा करती थी फिर धीरे धीरे मेरी भी आदत बन गयी हर गर्मियों की छुट्टी में नानी के घर जाने की। नानी का घर छोटा था दो कमरों का और लोग ज्यादा लेकिन ये बात सच्ची लगती है की दिल में जगह हो तो घर में भी बन जाती है। मौसियों के साथ हँसते खेलते लड़ते झगड़ते छुट्टियां कैसे बीत जाती थी पता ही नहीं चलता था। मौसियां होमवर्क भी करवा देती थीं ताकि मम्मी के ऊपर बर्डन न हो।

जैसे जैसे समय बीतता गया 4 मौसियों की शादी हो गयी और नानाजी रिटायर हो गए। मैं भी शायद 5th या 6th क्लास में आ गयी थी और अब नानी के घर जाने का रूटीन और बढ़ गया। अब मैं दिवाली होली में भी वहीं जाती थी। एक दिन पापा ने मम्मी को कहा की ये बार बार वहां जाती है अपने घर से ज्यादा वहां रहती है तो मम्मी ने कह दिया की पहले तो मैं काम के चक्कर में मैं भेज देती थी पर अब वो ज़िद्द करके जाती है. सुनती नहीं। जब मैं दिवाली की छुट्टियों में फिर वहां जाने की तैयारी करने लगी तो पापा ने कहा "बेटा तू त्योहारों पे वहां चली जाती है दादा दादी को बुरा लगता होगा, घर के बच्चों से ही तो घर में रौनक होती है।" जैसा की मैं आपको बता ही चुकी की हूँ की मैं बचपन से ही मुंह फट थी तो मैंने फट से पापा को कह दिया की यहाँ तो भाई होता है और अब तो दोनों चाचा के भी बच्चे हैं तो रौनक हो जाती है लेकिन मेरे नाना नानी के घर में कौन बच्चा है जो वहां रौनक लाये। पापा के पास कोई जवाब नहीं था वो चुप हो गए, खैर में उनके जवाब का इंतज़ार नहीं कर रही थी क्यूंकि मुझे पता है की सही बात को वो सही मानते हैं। दादा दादी को कभी कभी बुरा लगता लेकिन मुझसे कुछ कहते नहीं थे क्यूंकि मैं बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों वाली थी। मम्मी को अच्छा लगता था लेकिन खुल के बोलती नहीं थीं।

जब नानी के घर जाती तो वहीं आस पास तीन मौसियां रहती थीं तो शाम को वो भी अपने बच्चों को लेके आ जाती, हर रोज़ जैसे पार्टी हो जाती थी बहुत मज़ा आता। जब में 10th मैं आयी तो मम्मी ने कहा अब नानी के घर नहीं जाना घर पे रह कर पढ़। फर्स्ट unit टेस्ट में जब मैं सोशल स्टडीज में फ़ैल हो गयी तो बस फिर गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर भेज दिया क्यूंकि मेरी छोटी वाली मौसी ही मुझे पढ़ा सकती थी। धीरे धीरे ऐसे ही समय बीतता गया। छोटी वाली मौसी की शादी हो गयी अब तो नानी के घर रेगुलरली जाना ज़रूरी हो गया था क्यूंकि नाना नानी अब बिलकुल अकेले थे। अच्छी बात ये है की अब मैं कॉलेज में थी इसलिए कोई schedule पक्का नहीं था इसलिए में अपने कुछ कपडे लेके नानी के घर चली जाती वहीं से कॉलेज आना जाना और फिर थोड़े दिन बाद घर। जब मैं जॉब करने लगी तब नानी के घर जाना कम हो गया क्यूंकि मौसियों के बच्चे भी अब बड़े हो गए थे वो नाना नानी के पास आते जाते रहते थे। और मुझे भी लगता था कि अब कुछ साल बाद शादी हो जाएगी तो मैं मम्मी के साथ ज्यादा वक़्त गुज़ारूं शायद भगवान् सब पहले से प्लान कर लेते हैं। जून 2009 में मेरी माँ अचानक हम सब को छोड़ के स्वर्ग सिधार गयीं। हम सबके लिए वो बहुत मुश्किल समय था, तेरवीं के बाद मैं रोज़ सुबह पापा के ऑफिस जाते ही नानी के घर चली जाती थी और शाम को ही आती थी। नानी को मेरी बहुत चिंता होती अब इसका कौन ध्यान रखेगा, शादी कैसे होगी। खैर शादी तो हो ही गयी। शादी के बाद जब भी नानी के घर जाती तो मौसियां आ जाती वही गप्पे मारना हंसना ससुराल की कहानी पूछना। नानी भी हर बार कुछ न कुछ देती ही।

 दो साल बाद नानी गुज़र गयी और उसके डेढ़ साल बाद नानाजी। मौसियां अब भी उतना ही प्यार करती  हैं। उनके घर मैं मुझे बिलकुल मायके वाले सुख मिलते  हैं। लेकिन नानी के घर की बहुत याद आती है। ख़ास कर गर्मियों की छुट्टी में।

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