वो ठगी सी रह गई
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|   Jan 30, 2017
वो ठगी सी रह गई

बचपन मे छोटे कपड़े पहनकर वह खूब ईठलाती थी। वो भी क्या जमाना था साहब  कभी फ्राक कभी मिनी कभी शॉर्ट्स पहनकर वह अपने-आप को किसी हीरोइन से कम न समझती थी। 

अपने स्टाइलिश कपडे पहन नये खिलौने लेकर दिन भर आस पडोस के लडकी-लडको  के साथ खेलती रहती थी। लडको से खूब झगडती थी। तब उसे लगता था वह चांद छू सकती है। सब उसे ढेर सारा प्यार देते और वह इतराती रहती। माता पिता उसको बेटी नही बेटा बुलाया करते थे।

हकीकत से अनजान वो अक्सर अपने आने  वाले भविष्य को लेकर ख्वाब देखा करती थी। खूबसूरत दिखने का ख्वाब,  दूनिया को अपनी मुठ्ठी मे कर लेने का ख्वाब और न जाने क्या-क्या।

पर धीरे धीरे सब बदलने लगा । पहले उसके कपडे पहने का तरीका। उससे कहा गया अब बडी हो गई हो सभ्य कपडे पहनो और इसी के साथ उसका हीरोइन जैसे दिखने का सपना टूटा। फिर कुछ समय बाद उससे कहा गया सारा दिन लडको के साथ खेलना लडकियों को शोभा नही देता। कुछ और बडी हुई उससे कहा गया लडकियों के लिये पढाई की कुछ फील्ड ही अच्छी रहती आराम की नौकरी मिल जायेगी घर नौकरी दोनो संभाल पाओगी। इस प्रकार उसका चांद छूने का सपना भी फर्श पर टूट कर बिखर गया।कल तक जो आसमां  उसके उड़ाने लिए खुला था आज उस आसमां को बादलों और तूफानों ने घेर लिया था। कल तक जो उसे सबका प्यार मिलता रहा था आज न जाने क्यो उसे झूठा सा लग रहा था।

 कल तक तो उसे सब कन्या और देवी कह कर पूजते थे फिर आज क्यो उसे जंजीरों से बांध रहे थे। आज उसकी ओर उठने वाली हर नजर उसे कमजोर बहुत कमजोर होने का एहसास दिला रही थी। उसे समझ नही आ रहा था क्या उसे लडकी होने की कीमत अपने सपनो की बली देकर चुकानी होगी? ठगी सी रह गई वो क्या उसका सारा बचपन एक फरेब था। जिनकी नीव पर वह अपना महल बना रही थी वो एक धोखा था। 

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