Continuation from previous blog...(बच्चे का विकास घर के बाहर भी)...पेरेंटिंग 
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|   Jul 07, 2017
Continuation from previous blog...(बच्चे का विकास घर के बाहर भी)...पेरेंटिंग 

मैं घर के अंदर आ चुकी थी मगर बच्चो के खेलने के बारे में मिसेस सक्सेना के विचार अभी भी मुझे सोचने पर मजबूर किये हुए थे। मिसेस सक्सेना अपनी इस सोच से खुद को बहुत बुद्धिमान समझती मगर हम सब यह देख रहे थे की उनका बेटा खेलते वक्त नॉर्मल नही रहता था उसे हमेशा जीतना होता था या फिर वो अपने हिसाब से ही खेलना चाहता था। मन का न होने पर या तो वो रोने लगता या फिर उसकी लड़ाई हो जाती। माँ की तरफ से उसे बहुत ज़्यादा रिज़र्व रखने और स्पेशल फील कराने के वजह से अन्य बच्चो के साथ उसका व्यवहार नॉर्मल नही होता।

वास्तव में हमारे बच्चे स्कूल और ट्यूशन के बाद जब खेल के मैदान में अन्य बच्चो के साथ होते है तो उनकी पर्सनालिटी बहुत तेज़ी से ग्रूम होती है क्योंकि उस समय फिजिकल एक्टिविटीज के साथ उनकी मेन्टल एक्टिविटी भी होती है। team spirit,sharing,caring,healthy competition और साथ ही अलग अलग उम्र स्वभाव के बच्चो के साथ रहने से उनमें adjustment और maturity बढ़ती है।

इसके विपरीत मिसेस सक्सेना जैसी mothers को लगता है कि बच्चो को बाहर भेजने से कई तरह की प्रॉब्लम हो सकती है। बेहतर है कि घर में ही बच्चो को गैजेट्स और गेम दिला कर हम उनकी ज़्यादा ग्रोथ कर सकते है। ये लोग अपने बच्चो के पर्सनालिटी डेवलोपमेन्ट के लिए क्लासेज में भेजने को तैयार रहते है मगर पड़ोस के चार बच्चो के साथ खेलना उन्हें पसंद न हीँ। ऐसे बच्चे भविष्य में अच्छे प्रोफेशन्स में चले जाते है,अच्छा बैंक बैलेंस भी बना लेते है मगर व्यहवारिक्ता का विकास न होने से अपने सामाजिक जीवन में वे अकेले पड़ जाते है। वो समझ ही नही पाते की दैनिक जीवन में उन्हें कब कैसा व्यहवार करना है। व्यहवार का संकोच उन्हें अलग थलग कर देता है। इस लिए सभी पेरेंट्स को चाहिए की वो अपने बच्चो पर अनावश्यक रोक न लगाएं। उनकी अनगढ़ मासूमियत,शरारतों को सबके साथ एन्जॉय करे।

RAGINI SRIVASTAVA...

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