मायका और ससुराल एक ही शहर में.. सौ सुखों से बड़ा ये एक सुख !
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|   Aug 13, 2017
मायका और ससुराल एक ही शहर में.. सौ सुखों से बड़ा ये एक सुख !

मायका - वो जगह जहाँ जाने की कल्पना भर से ही आंखों में चमक आ जाती है.. चाहे कोई त्यौहार हो, शादी हो, माँ-पापा से मिलने का मन हो, किसी कारणवश जा नहीं पाए तो दिल में कितने दिनों तक मायूसी रहती है ! अगर ससुराल दूसरे शहर में हो तो कुछ सालों में इस मायूसी की आदत सी हो जाती है.. हर बार जाने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है... अपनी, अपने बच्चो की और अपने पति की छुट्टियों का हिसाब लगाना पड़ता है, बच्चों की परीक्षा और मायके में शादी एक ही दिन हो तो हर महिला खुद को निराश ही पाती है.. ये छुट्टियों और परीक्षाओं का गणित अपने मायके जाने की खुशियों पर हर बार भारी पड़ता है.. गर्मियों की छुट्टियों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है..

मैं उन खुशनसीब औरतों में से हूँ जिनको इतना गणित नहीं मिलाना पड़ता मायके जाने के लिए.. हाँ, मेरा मायका और ससुराल एक ही शहर में है.. सिर्फ कुछ किलोमीटर के फासले पे.. दस साल होने वाले है शादी को और मायके जाने से मिलने वाली ख़ुशी आज भी वैसी ही है.. ऑफिस जाती हूँ तो रास्ते में ही पड़ता है मेरा मायका, जब भी मन होता है चली जाती हूँ माँ से मिलने, सप्ताह में २-४ बार.. हाँ, दस दिनों के लिए रहने गए सालों बीत गए, पर आना-जाना वही है, मायके जाकर आने का मोह भी वही है.. ४-५ दिनों तक ना जा पाऊं तो फ़ोन आ जाता है.. जॉब करती हूँ पर बच्चों को कभी अक़ेला नहीं छोड़ना पड़ा, दादा-दादी को कुछ काम से कहीं जाना है तो ननिहाल है ना ! हम लोगों को छुट्टी भी नहीं लेनी पड़ती, बच्चों को अकेले भी नहीं छोड़ना पड़ता और बच्चे खुश भी रहते है.. नानी क घर जाने का पता चलने पर !

मायके में हुई ज्यादातर शादियों में जाने का सौभाग्य मिला, चाहे किसी भी रिश्तेदार के यहाँ शादी हो, मेरे या इनके चाचा के घर, बुआ क घर, मेरे पापा के चाचा के घर, हमारे ननिहाल में, जहाँ हम लोगों का बचपन बीता, उन लोगों की खुशियों में शामिल होने का मौका नहीं खोना पड़ा.. सिर्फ कुछ एक को छोड़कर जब ससुराल में कोई शोक था.. बच्चे भी मेरे या अपने पापा के ननिहाल में वैसे ही खुश रहते है जैसे की अपने खुद के ननिहाल में.. कभी भी आना-जाना हो किसी काम से, रुकना हो, तो कोई टेंशन नहीं रहती की बच्चे वहां आराम से बैठने नहीं देंगे..

राखी हो चाहे दिवाली, होली हो या कोई और त्यौहार, ससुराल के साथ मायके भी जाते है हम लोग.. सच में त्यौहार की ख़ुशी दुगुनी हो जाती है ! सिर्फ त्यौहार या ख़ुशी के मौके पर ही नहीं, परिवार में किसी के दुःख-दर्द का पता चलने पर भी पता चलते ही मिलने चले जाते है.. सोचना नहीं पड़ता ! दूसरे शहर में रहने वाले बच्चे हर बार, हर छोटे-बड़े कारण के लिए यहाँ आ नहीं सकते, ये बात माँ-बाप भी समझते है और हर छोटी-मोटी तकलीफ उनको बताते भी नहीं है.. मगर माँ-पापा की तबियत ठीक ना हो और पता चलने पर भी नहीं आ सकें तो दिल पर क्या बीतती है, ये बात उस बेटी से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता जिसका मायका दूसरे शहर में है.. सच में, माता-पिता की सेवा का जो सुख एक ही शहर में रहकर मिलता है वो कही और रहकर नहीं मिल सकता.. मैं इस मामले में खुद को खुशनसीब मानती हु की मैं हर छोटे-बड़े कारण में अपने मायके जाकर आ पाती हूँ और अपनी सासूमाँ-ससुरजी के साथ-साथ अपने खुद के माता-पिता का भी ध्यान रख पाती हूँ!

कभी मन उदास हो, चाहे खुशियां बांटनी हो, माँ ही पहले याद आती है, पता नहीं क्यों, पर दोनों ही कारणों में मायके जाने का मन होता है और चली भी जाती हूँ.. जाकर कुछ बोलूं भले ही ना, पर बिना बोले ही दुःख काम हो जाता है और खुशियां दुगुनी हो जाती है.. सिर्फ मायके जाकर आने भर से.. मायका और ससुराल एक ही शहर में.. ये सपना जब हकीकत में बदला तो सबसे बड़ा सुख यही मिला की मायका छूटकर भी नहीं छूटा.. और ये फैसला आज मुझे अपनी ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन फैसला लगता है ! और आपको ?  

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