गृह-प्रवेश
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|   Aug 03, 2017
गृह-प्रवेश

एक लड़की शर्माती सी सकुचाती सी  जब एक नए घर में गृह-प्रवेश करती है, तो उस गृह -प्रवेश के साथ उसमे भी बहुत सी  जिम्मेदारियां अनायास ही प्रवेश कर जाती है  और प्रवेश करता है उसके ह्रदय में एक अनजाना डर, उन जिम्मेदारियो को ठीक से पूरा करने का डर । एकाएक उसकी जिंदगी में सब कुछ परिवर्तित हो जाता है उसके रिश्ते, उसकी आदते, उसके जिंदगी जीने के तौर-तरीके सब कुछ । उसकी अवस्था एक ऐसे पेड़ जैसे हो जाती है जिसे उसकी जड़ो से उखाड़कर किसी और स्थान पर रोपित कर दिया जाता है और उस स्थान पर खुद को स्थापित करने का दबाव भी बनाया जाता है । ऐसे मैं जरुरत होती है उस पेड़ को खाद-पानी की, देखभाल की और वो कुछ ही दिनों में वहां हरा-भरा हो जाता है । अब जरा सोचिये की अगर उस पेड़ को कही और रोपित करके यूँ ही छोड़ दिया जाये तो क्या वो उस नई मिटटी में अपनी जड़  जमा पायेगा ! नहीं, वो कुछ ही दिनों में मुरझा जायेगा।  बस वही हालत एक लड़की की भी होती है जिसे ब्याहकर हम अपने घर तो ले आते है बस उसे उस घर में पनपने को खाद- पानी मेरा आशय है की देखभाल और प्यार देना भूल जाते है । हम देते क्या है, अपने रीती-रिवाज, अपने घर -परिवार के चाल-चलन।  अरे उसे सम्हलने तो दीजिये, उसे तो आपके घर में ही रच-बस जाना है थोड़ी सी प्रतीक्षा कीजिये और फिर देखिये वो कैसे आपके घर के हर कोने में हंसी - मुस्कुराहटें बिखेरती है । उसे ये एहसास दिलाये की वो किसी और के घर में नहीं अपितु अपने घर में आई है । जैसे एक माँ अपने बच्चे को सब कुछ सिखाती है प्यार से ,मार से और कभी -कभी मनुहार करके बस उसी तरह आप भी अपनी बहु को अपने घर की मिटटी को परखना सिखाइये ,एक बार वो मिटटी को परख गई तो कभी भी आपके परिवार-रूपी वृक्ष  को कुम्हलाने नहीं देगी । आपके थोड़े से सहयोग से आपकी बहु के गृह-प्रवेेेश के साथ-साथ ही आपके घर में नई उमंगो और असीमित ख़ुशियों का भी गृह-प्रवेश हो जायेगा और आपकी उम्र उन खुशियो में प्रफुल्लित होने में बीतेगी। 

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