हम तो हिंदी मीडियम वाले है..
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|   May 19, 2017
हम तो हिंदी मीडियम वाले है..

आज शुक्रवार है और हमेशा के जैसे ही कोई न कोई फिल्म रिलीज़ हुई होगी. पर इस शुक्रवार की फिल्मो में से एक "हिंदी मीडियम" कुछ हटके है. सच्चाई ये है कि मैंने ये फिल्म अभी देखी नहीं है पर इसके नाम ने आस पास के माहौल में एक हलचल सी कर दी है. लोग अचानक से हिंदी को याद कर रहे है, उसे मात्र भाषा होने पर सराह रहे है. कुछ हिंदी की दुर्दशा की भी बात कर रहे है और बाकी बचे सिर्फ फिल्म में इरफान खान के अच्छे अभिनय की बात कर रहे है. मैंने भी जिज्ञाषा वश फिल्म के रिव्यु पढ़े. सबने कहा कि फिल्म अच्छी है. आज के समाज की परेशानियों को परदे पर उतारती है. कैसे हिंदी माध्यम का कोई स्तर नहीं है ये भी बखूबी दर्शाती है. और हंसी-हंसी में एक अच्छा सन्देश दे जाती है. उम्मीद करती हूँ कि मैं भी ये फिल्म देख पाउ.३ साल के शरारती के साथ में फिल्म देखना उससे भी ज्यादा मुश्किल है जितना सोच कर लगता है.

अच्छा, ये ब्लॉग इस फिल्म के प्रमोशन के लिए बिलकुल नहीं है. ये ब्लॉग बस हिंदी मीडियम के बारे में है. जब से इस फिल्म के ट्रेलर ने टीवी पर दिखना शुरू किया, कुछ बचपन की यादें ताजा होने लगी. जी हां, मेरी भी पढाई हिंदी माध्यम की है. बचपन में जब भी कभी हम कही सपरिवार जाते और हमसे हमारे स्कूल के बारे में पूछा जाता तो थोड़ी झिझक होती थी ये बताने में कि स्कूल हिंदी मीडियम है. या ये कहू कि मेरा स्कूल तो आधा हिंदी और आधा संस्कृत मीडियम था. टीचर और मैडम की जगह हम 'आचार्य जी' और 'दीदी' बोलते थे. जब भी रोल कॉल होती तो यस मैडम या प्रेजेंट मैडम की जगह हम "हरि ॐ" बोलते थे. हमारे स्कूल में क्लासेज नहीं कक्षाऐं थी, जो फर्स्ट, सेकंड नहीं प्रथम, द्वितीय से चल कर नवम दशम तक थी. वैसे सच में कुछ अलग तो था मेरा स्कूल.

सुबह जाते ही वंदना होती थी. बच्चे जमीन पर बिछी दरियो में बैठ जाते और फिर हाथ जोड़ कर हम माँ सरस्वती को याद करते. हमारे आचार्य जी भी साथ में ही बैठे होते थे दरियो पर. फिर लंच भी थोड़ा अलग होता था मेरे स्कूल में. बरामदों में पट्टियां बिछाई जाती थी और सब बच्चे एक साथ उन पर बैठ कर खाना खाते थे. खाने से पहले मुश्किल से २ मिनट का भोजन मंत्र होता था. मंत्र में हम ईश्वर को धन्यवाद देते थे हमे सुरक्षित रखने के लिए और हमे अन्न देने के लिए. फिर विश्व शांति की कामना से 'ॐ शांति शांति शांति' बोलकर खाना शुरू करते थे. तब इसकी महत्ता समझ नहीं आती थी पर अब लगता है कितना अच्छा संस्कार था वो. दोपहर में छुट्टी के समय सब फिर से इकठ्ठे होते थे बरामदों में और फिर एक साथ "वन्दे मातरम.." जो कि अपना राष्ट्र गीत है गाते थे. उसके बाद ही हम घर जाते थे. 

मुझे अपने स्कूल से बड़ा प्यार था. पांचवी तक तो ध्यान ही नहीं दिया कि हिंदी मीडियम और इंग्लिश मीडियम में क्या अंतर है. पर धीरे धीरे ये अंतर महसूस होने लगा. हिंदी मीडियम के बच्चे इंग्लिश बोलने में कमज़ोर होते है. मैं ये भी नहीं कहूँगी कि सभी बच्चे ऐसे होते है पर एक साधारण बच्चा इंग्लिश में कमज़ोर ही होता है. उसे इंग्लिश कभी पढ़ाई ही नहीं जाती ऐसे कि वो उसे अपनी दूसरी भाषा के जैसे समझ और अपना ले. मेरे साथ भी यही समस्या थी. बारहवीं तक को स्कूल हिंदी मीडियम था तो ज्यादा फरक नहीं पड़ा. फिर कॉलेज में आते ही क्लास में कॉन्वेंट स्कूलों से पढ़े सहपाठी थे. मुक़ाबला उनसे था जो फर्राटेदार इंग्लिश बोलते थे और यहाँ तो B Sc की साइंस की किताब को समझने के लिए डिक्शनरी देखती पड़ती थी. खैर, हिम्मत नहीं हारी मैंने और पूरी ताकत लगा दी इंग्लिश को अपनाने में. मेहनत रंग भी लाई, B Sc के तीनो सालो में अच्छे नंबर आए. और उसके बाद मैंने अपने प्रोफेशनल कोर्स को भी इंग्लिश में पढ़ा. तब तक हिंदी और इंग्लिश के बीच का अंतर काफी काम हो गया था मेरे लिए. जब ग्रुप डिस्कशन के राउंड में सिलेक्शन होने लगा तो आत्म विश्वास और बढ़ा. फिर तो मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. और आज मैं इंग्लिश में ब्लॉग लिखती हूँ. कोशिश पूरी करती हूँ कि सरल शब्दों में अपनी बात लोगो तक पंहुचा पाउ. पर समय के साथ एक और चीज बदली है अब मैं गर्व से बताती हूँ कि मैं हिंदी मीडियम से हूँ.. मेरे स्कूल ने बच्चो को पढ़ाई के साथ संस्कार भी दिए है जो हमेशा रहने वाले है उनके साथ. था ना कमाल का मेरा हिंदी मीडियम स्कूल..?

 

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