जब मैं ऑफिस से घर देर से पहुंची..
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|   Jun 28, 2017
जब मैं ऑफिस से घर देर से पहुंची..

कल मैं ऑफिस से घर देर से पहुंची. मेरा ३ साल का बेटा मेरे साथ ही creche जाता है जो मेरे ऑफिस में ही है. पर कल शाम एक जरूरी मीटिंग होने की वजह से बेटे को साथ नहीं ले गई थी और वो अपने पापा के साथ घर पर ही था.

कल का दिन कुछ अलग सा गया. ऑफिस बस में बैठी तो ऐसा लग रहा था कुछ घर पर भूल आई हूँ. आदत सी हो गई है बेटे को सीने से लगा कर बस की सीट पर बैठने की. फिर बस से उतरी तो सब लोग पूछने लगे "आज विभू नहीं आया..?" मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि मेरे बेटे में सबके साथ घुल मिल जाने का गुण है, वो बस में साथ आने वालो से लेकर ऑफिस के गार्ड्स, सिक्योरिटी स्टाफ और कई सारे ऑफिस के लोगो को अच्छे से जानता है. जिस दिन वो ना आए ऑफिस साथ, तो सबको उसकी कमी महसूस होती है..उन सबको बताते हुए कि आज विभू घर पर ही है, आगे बढ़ी.

ऑफिस में नाश्ता किया तो फिर से उसकी याद आई. रोज उसे भी बाते बनाते हुए नाश्ता कराती हूँ और कल चुप चाप जल्दी-जल्दी नाश्ता करके सीट पर पहुंच गई. फिर पतिदेव को फ़ोन मिलाने कि कोशिश करने लगी ताकि हाल चाल ले सकू. पर फ़ोन लग ही नहीं रहा था, शायद नेटवर्क में कुछ प्रॉब्लम थी. बीच-बीच में फिर से कोशिश करती रही पर बात नहीं हो पाई. हार कर पतिदेव को चैट विंडो पर लिखा "फ़ोन नहीं लग रहा है, विभू का हाल लेना था..उसने कुछ खाया..? परेशान तो नहीं कर रहा..?" पतिदेव ने जब मैसेज देखा तो उसका जवाब भी दिया "विभू ठीक है, परेशान नहीं कर रहा.."

पूरा दिन ऐसे ही बीत रहा था बेटे की आवाज सुने बिना, सुबह भी उसे सोते हुए ही छोड़ कर आई थी. मन नहीं लग रहा था. जैसे ही कोई पूछता "मीटिंग घर से लोगी या यही ऑफिस से..?" और मैं कहती " ऑफिस से..", लोग तुरंत अगला सवाल पूछते "विभू कैसे रहेगा फिर शाम को.. creche तो बंद हो जाएगा तब तक..?" फिर मैं सबको बताती कि "आज उसे लेकर नहीं आई हूँ..वो घर पर पापा के साथ है.." शाम हो गई और मीटिंग का टाइम हो गया, मैं थोड़ी देर के लिए अपने बेटे को भूल मीटिंग में लग गई.

घर पहुंचते-पहुंचते ८.३० से ज्यादा हो गया था, बेटे ने घर के दरवाजे पर मुझे देखते ही कहा "मम्मा आ गई तुम.." तो मन भर आया मेरा.. १२ घंटे से ज्यादा समय मैंने उससे दूर बिताया था कल.पर उसकी ख़ुशी देख कर सारी थकन और अपराध बोध निकल गए मन से. फिर बेटे के साथ बाते की, पतिदेव से सारा दिन का हाल चाल पूछा..उन्होंने बताया कि ठीक रहा दिन, विभू ने परेशान नहीं किया. दोनों साथ में खेले खूब. जब विभू छोटा था तो उसे हम एक गाना सुनाते थे..कल फिर से वो ही गाना पतिदेव ने उसे सुनाया और बेटे को बड़ा पसंद आया. मुझे भी वो गाना फिर से सुनने को मिला पर इस बार बेटा भी उसे मज़े से गुनगुना रहा था.

एक दिन साथ रह कर पापा और विभू की दोस्ती अलग परवान चढ़ गई थी. जबकि मैं सारा दिन उससे दूर थी, बेटा पापा से ज्यादा लाड कर रहा था. बड़ा अजीब लगा .."देखो इसे, मैं सारा दिन इसे याद करती रही..और ये है कि पापा पापा कर रहा है..वैसे तो मम्मा के आगे पीछे लगा रहता है..पर आज जैसे इसे फरक ही ना पड़ा हो.. "

ये मातृत्व भी ऐसा अजीब सा अहसास है ना? बच्चो से प्यार इतना हो जाता कि कभी-कभी हम उन पर अपना अधिकार समझने लगते है. इसे ही possessive होना कहते है. बच्चो को तो बस प्यार से मतलब होता है वो अगर माँ दे तो माँ के हो जाते हैं और अगर पापा दे तो पापा के. उन्हें  इससे फरक नहीं पड़ता कि सामने कौन है, वो तो बस स्नेह की डोरी में बंधे होते हैं जिस तरफ स्नेह ज्यादा मिला उसी तरफ खिंचे चले जाते हैं. कल मेरे पतिदेव ने भी ऐसा ही कुछ काम किया, बेटे को सारा दिन इतने मज़े से रखा कि उसे मम्मा की कमी ही नहीं महसूस हुई. थोड़ी जलन मुझे जरूर हुई पर एक गहरी ख़ुशी भी मिली कि हम दोनों ही अपने बेटे के लिए पूरी तरह से समर्पित हैं. और इसके लिए हम, पति-पत्नी , एक-दूसरे की भी पूरी मदद कर रहे हैं. जैसे कि कल मैं ऑफिस में देर तक रुकी और पतिदेव ने बेटे को संभाला सारा दिन.

जीवन जीने का यही आनंद हैं सच में.. जब आप अपने सपनो को पूरा करते हुए अपने बच्चो के सपनो को भी ध्यान दे पाए.. मैं खुद को भाग्यवान समझती हूँ कि मेरे जीवन में आनंद की कोई कमी नहीं हैं..

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