कहानी थोड़ी फ़िल्मी है !!
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|   Feb 23, 2017
कहानी थोड़ी फ़िल्मी है !!

" प्यार" ऐसा शब्द, जो हमारे जीवन में हर पहलु को जोड़े रखता है। एक ऐसा एहसास जो हर किसी के दिल में, किसी ना किसी कोने में, कही न कही ज़रूर है। और ये प्यार ही है जिसने आज इतनी इतने अहंकार और स्वार्थ भरी दुनिया में भी अपना वर्चस्व बनाये रखा है।

माँ का अपने बच्चों से, शिक्षक का अपनी किताबों से,लेखक का अपनी कलम से,भक्त का अपने भगवान् से, पति का अपनी पत्नी से....ये प्यार ही तो है जो हर दिन सुबह उठकर जीने का एक नया हौसला देता है। 

जब रात को ऑफिस से थके हुए पिता से बच्चा लिपटकर हँसता है

 जब hostel से रात को खाने के बाद केवल 10 मिनट माँ से बात करने का समय मिलता है,और माँ तपाक से सिर्फ यही पूछती है," खाना तो सही से खाया ना?"

ऑफिस से लेट हो जाने पर बीवी दरवाज़े पर मुस्कुराकर इंतज़ार करती मिलती है

जब बेटी के स्कूल से लेट हो जाने पर धड़कने बढ़ने लगती है

जब भाई यूं ही  Favourite गिफ्ट ले आता है

और ना जाने कहाँ कहाँ किस किस रूप में प्यार अपनी जगह बना लेता है। हर जगह अपनी मनमानी करता है। गुस्से  को हरा देता है और रिश्तों को बचा लेता है।

" पहली नज़र का प्यार" मैंने केवल फिल्मों में ही देखा था । कभी सोचा ही नहीं की ऐसी कोई चीज़ असल ज़िन्दगी में भी हो सकती है।

मैं कॉलेज में पढ़ा करती थी उस वक़्त। मेरे लेट एडमिशन की वजह से काफी प्रॉब्लम होती थी पहले और करंट होमवर्क को करने में। मम्मी भी किसी कारण से घर पर नहीं थी तो घर का थोड़ा काम भी मुझे ही देखना पड़ता था। दौड़भाग में समय निकल रहा था कि एक दिन सुबह पापा ने कहा कि , "  लड़के वाले आ रहे है कल, तेरी मम्मी को भी वापस बुलाना पड़ेगा"।

" हे भगवान्! सारे सब्जेक्ट के एग्जाम क्या अभी के अभी ही ले लोगे???😂" मैंने मन ही मन सोचा।

खैर.... मम्मी को बुलवाया गया और कल का दिन भी आ गया। 

" बड़ा गुणवान बच्चा है,अरे!! लड़के ने 19 लड़कियां देख रखी हैं, पता  नही कही जंचती ही नहीं उसे तो", माँ ने थोड़े चिंतित स्वर में कहा।

मैं मन ही मन बड़ी खुश हुई। नहीं नहीं! गलत समझ रहे हैं आप , खुश इसलिये नहीं कि मम्मी पापा की तारीफों का पात्र बन चुका  लड़का मझे देखने आ रहा है पर इसलिये की जिसे 19 पसंद नहीं आयी तो मैं कहा ऐश्वर्या राय हूँ जो मैं पसंद आ जाऊंगी। (  एक कड़वा सच... हा हा हा). चलो जान बची तो लाखों पाये।

कॉलेज में कम attendence होने की वजह से मैं छुटटी नहीं ले सकती थी, तो सुबह कॉलेज तो गयी लेकिन तबियत का बहाना करके lunch में घर आ गई( मम्मी पापा के  निष्ठुऱ निर्देशानुसार)😢।

लड़के के आने से ठीक 1 घंटे पहले घर पहुँची, एक ढन्ग का सलवार सूट( जिसकी विविधता बहुत कम थी मेरी अलमारी में) पहना,बाल बनाये( जो स्कूटी चलने से  बुरी तरह के हो गए थे) , एक नकली मुस्कान के साथ खुद को खुश दिखाते हुए मैं उनके परिवार से मिली। 

"19 लड़कियों को मना कर दिया, इतना भी क्या घमंड?, खुद भी कहीं का रणवीर कपूर( मेरा पसंदीदा अभिनेता)  नहीं है!!!" । मैंने आँख बचाकर लड़के को देखा तो सबसे पहले यही सोचा।

" बेटी आप लोगो को कुछ बात करनी है तो कर सकते हो" लड़के की माँ ने बड़े प्रेम से मुस्कुराकर कहा। असली जंग तो अब थी, मन में प्रश्नों की सुनामी चल रही थी, क्या पूछेगा,क्या सोचेगा मेरे बारे में,कहीँ रूढ़िवादी हुआ तो,कहीँ मम्मी पापा को पसंद आ गया और मुझे नहीं तो?????

" आप बैठिए ना Please!" , एक धीमी सी आवाज़ ने तूफ़ान को शांत किया हो जैसे।

कुछ क्षण के लिए ऐसा सन्नाटा था जैसा किसी की "मौन सभा " में होता है।

" आपने पोस्ट ग्रेजुएशन किसमे किया है?" फिर वही आवाज़ आयी।

"केमिस्ट्री में" , एक ही शब्द बोलने की हिम्मत जुटा पायी मैं।

कुछ कॉलेज सबंधी सवाल पूछे जो की काफी मनोरंजक थे और किसी भी तरह ,किसी intervier द्वारा पूछे गए सवाल की भाँति बिलकुल  भी थे। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अंजान शक्श केवल हमारे बारे में कुछ जानने का प्रयास कर रहा हो।

10 मिनट की छोटी सी मुलाक़ात कब ख़तम हो गयी पता ही नहीं चला। 

" आप चाहे तो मुझसे कुछ पूछ सकती हैं" , बहुत विनम्र होकर उसने मुझसे कहा।

मैं " ना " में सर हिलाकर कमरे से बाहर आ गयी।

धड़कने बहुत तेज़ थी। हाथ काँप रहे थे। चेहरे पर लगातार एक मंद मुस्कराहट थी जो मुझे सब लोगो को देखकर छुपानी पड़ रही थी। जो मन सुबह कॉलेज जाते वक़्त घबरा रहा था वो अचानक प्रफ्फुलित था।

ये क्या हो रहा है मझे? मन में कैसे भाव आ रहे हैं? ऐसा तो पहले कभी नहीं लगा? 

बात करने का इतना सहज भाव मैंने किसी में नहीं देखा था अब तक। मेरी घबराहट को भांप गया था वो शायद तभी मुझे " नार्मल" करने का प्रयास कर रहा था अपनी बातों से। किसी लड़की को "कसौटी पर खरा उतरेगी या नहीं" वाली भावना से नहीं बल्कि उसके लिए मैं बनी हूँ या  नहीं, यही सुलझाने की कोशिश कर रहा था।

मिलने जुलने , भोजन और बातों के सिलसिले के बाद वो लोग भी चले गए। माँ शायद मन ही मन मेरी " हाँ" को समझ गयी थी।

 क्या मैं अच्छी लगी होऊंगी उनको? इतने सरल व्यक्तितव के साथ जीवन के पल बीताने हो तो ज़िन्दगी में अलग ही रस होगा। ये तो नहीं पता की इस लड़के से मेरी शादी होगी या नहीं, जो भावनाएं मेरे मन में हैं वो उनके मन में भी होगी या नहीं ,पर जो कोई भी बना है मेरे लिए, वो इसका ही प्रतिबिम्ब हो। मन में ऐसा ही कुछ चलते चलते मझे नींद आ गयी।

सुबह वही सिलसिला, सब लोग अपने काम पर जाने की तैयारी कर रहे थे , मैं भी कॉलेज के लिए तैयार हो रही थी, तभी एक फ़ोन आया ,पापा के फ़ोन पर, दाढी बनाने के कारण वो उठा नहीं पा रहे थे तो उन्होंने मुझे फोन को स्पीकर पर लगाने को कहा।

" अरे कैलाश चंद्र निवेदन कर रहा हूँ साहब! आप लोग भीलवाड़ा( अब मेरा ससुराल) नहीं पधारेंगे? देख तो लीजिये आपकी बेटी रहेगी कहाँ शादी के बाद!!!!"

आज 4 साल हो गए हमारी शादी को पर आज भी हमारे रिश्ते में एक ही शक्श ज़िंदा है " प्यार"!!!

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