माँ... मेरा कोई दोस्त नहीं है
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|   Feb 24, 2017
माँ... मेरा कोई दोस्त नहीं है

" तुम कभी समझ नहीं सकती मेरी बात को! हमेशा अपनी ही बात पर अड़ जाती हो।", अविनाश ने गुस्से में कहा।

" तुम जैसे मेरी हर बात मानते हो, हर वक़्त मुझमे कमी ही नज़र आती है तुम्हे ?", मानसी ने झल्ला कर जवाब दिया।

अविनाश टेबल पर पड़ी गाड़ी की कि चाबी उठाकर चल दिया। मानसी ने भी उसे जाने से नहीं रोका।

कमरे में बैठा उनका 5 साल का बेटा , कुश, ये सब देख रहा था। संडे का दिन था तो वो लेट उठकर अपनी वर्क में दी हुई ड्राइंग कम्पलीट कर रहा था।

मानसी रो रो कर अपने मायके फ़ोन लगाकर अपनी माँ से ये सब कह रही थी। अपनी गलती बिना बताये ,अविनाश को ' गलत आदमी' कहकर, उससे  शादी करने का पछतावा जता रही थी।

अपने मन की भड़ास निकालने के बाद, उसने खाना बनाया,कुश को नहलाया,खुद नहा धोकर पूजा पाठ किया और खुश को खाना खिलाकर अपने कमरे में जा कर लेट गयी। कुछ ही देर हुई होगी की मायके से पापा का फ़ोन आया, जो बातें उसने अपनी माँ को कही थी वही उनके सामने भी दोहरायी। मानो कोर्ट में कोई केस की सुनवाई हो और हमे किसी भी तरह ये केस जीतना हो। इस बात से अंजान कि इस क्लेश का मूल्य  हमे हमारी घर की शान्ति देकर चुकाना पड़ेगा।

हम कभी कभी अपने अहंकार; Ego( और भी उचित शब्द) को इतना बड़ा बना देते हैं कि अपने और अपने परिवार की सुख शान्ति भी हमें छोटी लगती है। कभी कभी जीतने का जुनून बच्चे की मुस्कराहट के सामने बड़ा हो जाता है। दौड़भाग की इस ज़िन्दगी में जो थोड़ा बहुत समय हमें अपनों के साथ हंसीखुशी बीताने का मिलता है उसे भी हम अपने आपसी झगड़ो में निकाल देते हैं।

कुम्हार को अपने घड़े को सही रूप देने का हक़ केवल उसको बनाते समय ही मिलता है, पकने के बाद तो वो केवल उसको बेंच के मूल्य ही ले सकता है, चाहे वो कैसा भी बना हो। 

बच्चे प्रकृति की सर्वश्रेस्ठ रचना है और भाग्यशाली होते है वो माता पिता जिन्हें प्रकृति इस तोहफे से नवाजती है। जिस तरह एक फसल की कुबत उसके किसान की मेहनत पर निर्भर करती है , किसान कड़ी धूप,तेज़ बारिश,तूफ़ान और हर तरह की परेशानी का सामना करके उसे प्यार से पालता है ठीक उसी तरह बच्चों के बचपन के पलों को संवारने के लिए मातापिता को भी कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है।

एक कवी सम्मलेन में प्रख्यात कवियत्री को सुना था मैंने " बहुत ही सरल प्रेम का व्याकरण, मेरी तू मान ले तेरी मैं मान लूँ"।

तभी गाड़ी की आवाज़ आयी। अविनाश शाम होते घर लौट आया था। बिना कुछ बोले वो कमरे में अपने लैपटॉप के सामने बैठ गया। कुछ देर तक कोई वार्तालाप नहीं हुई। तभी मानसी ने कहा, " कहाँ गए थे तुम इतनी देर, संडे है आज ,सब बंद है आज तो?"

" तुम्हे क्या फर्क पड़ता है मैं कहीँ भी जाऊं?" अविनाश ने आँखे लाल करते हुए कहा।

मानसी सुबह की बात को भुलाकर अविनाश के घर लौटने पर, मुस्कुरा कर बात को सामान्य कर सकती थी और अविनाश बाज़ार से आते वक़्त ice cream लाकर मानसी को खुश कर सकता था। 

पर दोनों अपने कलह को ख़त्म करने की कोशिश ही नहीं कर रहे थे।

तभी कुश वहाँ आ गया। कुश को वहां देख मानसी बोली, " तुम बाहर खेलने जाओ कुश और 7 बजे तक आ जाना"।

" मेरा कोई दोस्त नहीं है माँ!!!" कुश ने मासूमियत से कहा।

अविनाश और मानसी आश्चर्य से कुश की तरफ देख रहे थे। 

" क्यों तुम रोज़ तो जाते हो खेलने" मानसी ने प्रश्न किया।

" मैं जाता हूँ लेकिन वो लोग मुझे नहीं खेलाते अपने साथ। मैं केवल रोज़ बैठा रहता हूँ और उनकी बॉल उन्हें लौटता हूँ। आर्यन( उनका पडोसी) कहता है कि मैं भी उनके साथ Fight करूँगा जैसे मेरे मम्मी पापा करते हैं। और वो Fight करने वालो को अपनी टीम में नहीं रखते।"

अविनाश और मानसी की आँखे नम हो गयी थी। 

शायद उन्हें एक नन्हें फूल को अपने" ईगो "के तले रौंदने की ग्लानि हो रही थी।

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