क्या दहेज बेटी की खुशियो की गारन्टी है?
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|   May 09, 2017
क्या दहेज बेटी की खुशियो की गारन्टी है?

आपकी मुक्ता -I

जब मेरी होने वाली सास शादी की बात करने आयी थींं तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि हमे कोई सामान नही चाहिये. ईश्वर की कृपा से सब कुछ है, बस आप कमरे के लिए एक डबल बेड और सिंंगार दान दे दीजियेगा. ऍसी, टीवी सब कुछ है. फ्रिज, वाशिंग मशीन गीज़र किसी भी चीज की आव्यशक्ता नहींं है. सो मेरे घर वालोंं ने यही किया. फिर भी मेरी माँ रसोईघर के बरतन वगैरह खरीदने लगी, मैंने उन्हें टोका की इसकी क्या जरूरत है. पर शायद उनका अनुभव उनके विवेक को जगा रहा था उन्होंने कहा यह मेरी इच्छा है. बाकी सामान का कैश उन्होंने मेरे नाम बैंक में जमा कर दी. मैंने उन्हें फिर टोका कि अब यह कैश क्युँँ? मेरी शादी तो बिना दहेज के हो रही है. उन्होंने बस इतना कहा ईश्वर ना करे पर कल अगर कोई तुम्हे कहे की खाली हाथ आयी तो बता देना कि सामान का पैसा बैंक में है. मैंने भी मन में सोचा मेरी माँ भी कैसी बाते सोच रही है. शायद यही माँ का दिल होता है. 

शादी के बाद ससुराल में सब सही चल रहा था, एक दिन मेरी सास घर के दूसरे तल पे मुझे घुमाने ले गयीँ. उन्होंने ऊपर के हिस्से के कमरे दिखाये. मेरे देवर का कमरा भी था. खाली था. अचानक उन्होंने मुझ से कहा कि अब देखो कुछ दिन में इनकी शादी होगी तो इनकी पत्नी को उनके माँ बाप कमरे का पूरा समान तो देंंगे ही. कमरे का सामान मतलब सिर्फ़ बेड, ड्रेसिँग टेबल तो होता नहींं है, कम से कम टीवी, वाशिंंग मशीन, एसी तो देंंगे. कोई बेटी को खाली हाथ तो भेजता नही है. मुझे एक पल के लिए लगा यह मुझे सुनाया गया है. फिर दिल ने कहा नही नही गलतफहमी है. खैर मैंने इस कान से सुन उस कान से निकाल दिया. 

दस दिन बीते मेरी ननद के घर हमे दावत पे बुलाया गया. वहाँँ से लौटने के अगले दिन मुझे बताया गया कि हमारी फुल टाइम मेड से मेरी ननद के ससुराल वालों ने पूछा भाभी दहेज में क्या क्या लायी. तो उसने उन्हें बताया भाभी कुछ नही लायी. मेरे दिल को धक्का लगा कि आख़िर मै सब ग़लत सोच रही थी. बस एक आश्वासन था कि यह सब घर की महिला ब्रिगेड की ही सोच थी. पतिदेव को टटोला तो उन्हें मैंने दहेज विरोधी ही पाया. 

मैंने सोचा मै अपने बैंक के कैश के बारे में बता दूँँ तो सब सही हो जायेगा. झिझक सी हो रही थी कि सासु माँ कहीं आहत ना हो जायें.

शाम के समय मेरी ननद आयी थींं और सास के कमरे में बैठी थी. मैं भी चली गयी. अचानक मेरी सास ने मुझ से सवाल किया कितना कैश दिया है तुम्हारी मम्मी ने? मैंं अवाक रह गयी. मुझे उन से इस तरह सीधे सवाल की ज़रा उम्मीद नहीं थी. आखिर मेरी शादी बिना दहेज के हुई थी औऱ मुझे इस बात पे गर्व था. खुद के हाव - भाव सम्भालते हुए मैंने उन्हें जवाब दिया. पर हाँँ उस दिन के बाद से मैंने दहेज ना लाने के और भी ताने सहे. मुझे वजह समझ नही आयी. 

छुट्टी का दिन था. मुझे उठने में ज़रा देर हो गयी. जब मै तैय्यार हो के कमरे से बाहर आयी तो सास मेरी दरवाजे पे ही खडी़ थीं. उन्होंने कहा तुम अपने पैसे से अपनी washing machine ले आओ. मै बस हल्का सा मुस्कुरा दी. दिमाग ने कहा ले आओ. दिल ने कहा पति की आज्ञा बिना नही. मैंने मौका देख उनसे बात की. जवाब सुन के इतना तो समझ आ गाया कि मुझ पे विशवास नही हुआ उन्हें कि उनकी माँ ऐसा कोई सवाल कर सकती है. मैंने भी चुप्पी साध ली. 

वक्त बीतता गाया, मैंं ताने सुनती रही. 

एक शाम चाय के बाद मैंं और मेरी सास साथ बैठे थे. ऐसा मौका अब कभी ही आता था क्योंकि मै अब ख़ुद उन से दूर रहती थी. अचानक से उन्होंने अपना favourite topic शुरू किया. मेरी ननद के बारे में बताने लगी कि कैसे शादी में दी गयी टीवी में कमी निकाली गयी और उनकी बेटी ने फौरन उन्हें फ़ोन कर के टीवी बदलवाने को कहा. मैंं आज तक इस दहेज के एपिसोड में खामोश थी पर उस दिन मैंने कहा मै तो कभी नही फ़ोन करती. यह मेरे मायके की गरिमा का सवाल होता. उनके अन्दर का दर्द था या सवाल , वह बोली मेरी बेटी ने आज तक ऐसा क्यूँँ नही सोचा. उसने हमेशा दबाव ही बनाया कि मेरी खुशी के लिए करना होगा. और मैंने भी उसकी खुशी के लिए किया. 

मै सोच में पड़ गयी यह कैसी खुशी थी. वह ज्यादा खुशहाल बहु थी या मैंं ? इसका आंंकलन मुश्किल था. 

फिर एक दिन जाने क्या बात हुई मेरी सास अपनी बेटी के ससुर का नाम ले ले कर गुस्से में बोलते हुए रसोई में आयी. मै नाश्ता बना रही थी, उन्होंने कहा इतनी शान से हमने शादी की, इतना सारा सोना दिया और फर्स्ट क्लास लड़की दी, तब भी छोटी छोटी बातो के लिए परेशान किया जाता है. 

खैर मुझे इतना तो पता है कि वह परेशान होती कम करती ज्यादा है. पर इस बहाने मेरी सास भरपूर तरीके से मेरे दिल को चोट पहुन्चाने की कोशिश जारी रखे है, पर वह यह नही समझती की उनकी शख्सियत मेरी नजरो में गिर रही होती है. मुझे समझ नही आता अगर मेरी खुशियो की गारन्टी वही दहेज है तो उनकी बेटियाँँ क्यूँ खुश नहीं हैंं, वह तो हर मौके पे चाहे जन्म्दिन हो या त्यौहार आज भी तोहफोँ के नाम पे दहेज के रूप में खूब सारा कैश ले के जाती हैंं. 

मैंने पहले साल तो यह तोहफोंं वाली रीत निभायी पर व्यवहार में अहन्कार देख के मैंने बन्द करवा दिया. 

कोशिश कीजिये शायद आप या आप से जुडा़ कोई इन्सान इन परेशनीयो से जूझ रहा हो. दहेज लेने वालों को कुछ कहने से पहले देने को ना कहना सीखिये. अपने मायके की गरिमा बनाए रखेँ, अपने व्यवहार से दहेज से नहींं. मेरी सास भी अब वही ताने मार मार के बोर हो चुकी हैं. मैं उन्हें सुनाने का मौका भी नहीं देती. जैसे वह कहने वाली होती हैं मैं काम का बहाना कर के चली जाती हूँ. 

यदि आपकी दहेज की समस्या गम्भीर हो तो आवाज़ उठाएँ. खामोश ना रहें.

आपकी मुक्ता

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