वह एक महीना-लड़का होगा या लड़की
48371
38
396
|   Jul 03, 2017
वह एक महीना-लड़का होगा या लड़की

आज से ठीक १० महीने पहले कीर्ति को वह खुशखबरी मिली थी। वह बहुत ही खुश थी क्योंकि उसका परिवार पूरा होने वाला था। उसने अपने परिवार के साथ अपनी ख़ुशी बाटी। सभी बहुत खुश हुए। उसकी बड़ी बेटी(दिया) ३ साल की थी। समय के साथ उसने अपनी बेटी को एक नन्हे मेहमान के आने और उसे अपना बनाने के लिए तैयार करना चालू कर दिया था। 

कीर्ति की प्रेगनेंसी में पहली बार जैसी कोई कॉन्प्लिकेशन नहीं थी इसलिए वह बहुत खुश थी। ८ महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला। सब अच्छा चल रहा था। जैसे-जैसे समय नजदीक आता गया सब दिया से यही पूछते कि भाई चाहिए या बहन? दिया को तो अपनी गुड़िया जैसी बहन ही चाहिए थी। थोड़े तो उसे समझाते कि भाई होने की कामना करो और थोडे दिया की बातों पर हंस देते।

९वा महीना शुरु हुआ। कीर्ति को डिलीवरी के लिए अपनी मां के घर भेज दिया गया। जब वह चेक-अप के लिए अस्पताल गई तो उसने वहां एक औरत को देखा जो चौथी बार प्रेगनेंट थी। उसकी तीन बेटियां थी। और उसके ससुराल वाले उससे एक बेटे की अपेक्षा कर रहे थे।

उसे देख कर कीर्ति घबरा गई। अभी तो डिलीवरी को एक महीना बाकी था। वह बहुत परेशान रहने लगी थी। वह ठीक से खाना नहीं खाती और उसे नींद भी नहीं आती थी। दिन भर बस एक ही चिंता कि लड़का होगा या लड़की? एक बार तो परेशान होकर उसने अपने पिता से जेंडर टेस्टिंग करवाने को कहा। उसके पिता ने मना कर दिया। वह बोले कि लड़का हो या लड़की उससे कोई फर्क नहीं पड़ता और अगर पता भी चल गया की लड़की है तो क्या कर लेंगे? ऐसा सोचना भी गलत है। बस तुम खुश रहा करो। इतना परेशान रहोगी तो बच्चे की सेहत पर असर पड़ेगा।

पर कीर्ति के दिमाग में बहुत सी बातें चल रही थी। वह तो अपने सपनों में भी यही सब देखती कि लड़का होगा या लड़की।वह सोचने लगी कि अगर लड़की होगी तो घर में कोई खुश नहीं होगा। सब बड़ों को लड़का ही चाहिए रहता है और फिर सब यही कहेंगे कि मेरा परिवार पूरा नहीं हुआ। उसने अपनी दादी जी को बहुत बार कहते हुए सुना था कि लड़का होने से ही वंश आगे बढ़ता है और परिवार पूरा होता है।

१ दिन बाद उसकी डिलीवरी होने वाली थी। उसके दिमाग में इतनी बातें चल रही थी उसने अपने पति सुरेश से सब बातें शेयर की। फिर सुरेश ने उसे समझाया कि उसका परिवार तो पूरा होने वाला है, लड़का या लड़की होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस उसके लिए यह ज़रूरी है कि कीर्ति और बच्चा स्वस्थ रहे। कीर्ति अभी भी संतुष्ट​ नहीं थी क्योंकि वह जानती थी कि घर के बड़े बेटे से ही खुश होंगे। जब वह ऑपरेशन थिएटर में पहुंची तब भी वह परेशान ही थी। डिलीवरी हो गई और डॉक्टर ने उसे बताया कि लड़की हुई है। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसके सामने सारे परिवार के दुखी चेहरे घूम रहे थे। डॉक्टर समझ गई कि कीर्ति पर क्या बीत रही है तो उसनेे तुरंत उस नन्ही सी जान को लाकर कीर्ति के हाथ में दे दिया। कीर्ति ने जब उस प्यारी सी बच्ची को गोद में लिया तो वह सारी बातें भूल गई और उसी क्षण उसने ठान लिया कि कोई कुछ भी कहे उसे बस अपनी बच्ची को खुश रखना है। 

उस दिन से जब भी कोई कहता कि बेटा होता तो अच्छा होता तो कीर्ति मुस्कुरा कर कहती की बेटी हुई तो भी अच्छा ही हुआ है। बस फिर उस बात को लेकर वह कभी परेशान नहीं हुई। आज भी लोग उससे एक बेटे की आशा रखते हैं पर सुरेश के सपोर्ट से उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि उसका परिवार पूरा हो चुका है। उसके लिए जरूरी यही था की अपनी बेटियों को वह प्यार और दुलार से बड़ा करें और उन्हें आत्म-निर्भर बनने के योग्य बनाए।

बड़ों की बात गलत नहीं है कि घर में बेटा होना चाहिए पर अगर बेटी हो जाए तो भी संतुष्ट रहना जरूरी है। क्योंकि बेटा या बेटी किसी के हाथ की बात नहीं। यह तो नियति ही तय करती है। कीर्ति की नियति में दो प्यारी बेटियां ही है और वह इस से संतुष्ट है। बस जब भी उसे वह महीना याद आता है उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं और ऐसे चिंता भरे दिन उस के जीवन में कभी ना आए बस यही उसकी भगवान से प्रार्थना है।

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day