आज की यशोदा ( कहानी)
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|   Jul 05, 2017
आज की यशोदा ( कहानी)

शीतल का शादी के बाद पहला दिन ससुराल में हँसी खुशी और ठिठोलियों के बीच निकल गया। प्रेम भी अच्छे पति साबित हुए, सासू माँ और ससुरजी के हृदय में भी शीतल ने अपने सरल व्यहार से जगह बना ली थी।

शादी के एक साल बाद परिवार वाले, रिश्तेदार और पड़ोसी शीतल से बच्चे की फरमाइश करने लगे मानो बच्चा नहीं कोई चीज़ हो जो उसे परचूनी की दुकान से लाने को कहा जा रहा हो। प्रेम से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने ईश्वर के ऊपर यह फैसला छोड़ दिया। 

वक़्त बीतते देर नहीं लगती और पांच साल बाद भी शीतल के घर कोई नन्ही किलकारी नहीं गूंजी थी। प्रेम को छोड़ सबकी नजरें बदल गयीं थीं। रिस्तेदारों ने अपने घर किसी भी शुभ कार्य में भी बुलाना बन्द कर दिया था। उम्दा डिग्री हासिल करके भी एक औरत की काबलियत तभी साबित होती है जब वो अपनी कोख से बच्चा जने, ये शर्मनाक है पर हमारे समाज की सूरत ही ऐसी है जिसे बदलने में न जाने कितनी पीढ़ियाँ गुज़र जाएंगी। 

शीतल को कहीं आने जाने में भी शर्म महसूस होती थी, अपनी परेशानी पति के साथ साझा करते हुए वो बोली " सुनो मुझे बड़ी उलझन होती है जब लोग तरह तरह की बातें करते हैं। मम्मी जी भी कुछ नाराज़ सी रहती हैं। चलो न कल किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाकर चेकअप करा लेते हैं।" शीतल की घुटन को भांप कर प्रेम ने शहर के बड़े डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया। एक नई उमंग और उत्साह के साथ प्रेम और शीतल क्लिनिक पहुँच गए। वहाँ का नज़ारा कुछ यूं था कि मानो पूरा शहर ही बच्चे की कामना लिए बेन्चों पर इंतज़ार कर रहा हो। शीतल को यह देख कर राहत मिली कि वो ये सब झेलने वाली अकेली नहीं थी।

डॉक्टर ने रेपिर्स को नार्मल बताते हुए कहा कि ज़्यादा कॉम्पलेकेशन नहीं है बस थोड़े दिनों का इलाज और बच्चा आपकी गोद में खेलेगा। ये बात जब घर वालों को पता चली तो जैसे खुशी की लहर दौड़ पड़ी। कुछ दिनों में शीतल का इलाज शुरु हो गया, बड़ा कष्टकारी था और अच्छी खासी धन राशि भी लग रही थी, पर बच्चे के आगे वो पीड़ा कुछ नहीं थी।

इलाज पांच साल चलता रहा और शीतल का शरीर मानो अब तक दवाओं का बसेरा बन चुका था, शायद ही कोई ऐसा इलाज होगा जो प्रेम ने इन सालों में न कराया हो। समय तो अपनी गति से चल रहा था लेकिन शीतल अपने आप को आज भी वहीं खड़ा देख रही थी। अब किसी को कोई उमींद नहीं रही और सासू माँ के कहने से इलाज भी बंद हो गया, और उनकी बात भी सही थी कि अपनी सारी जमा पूंजी यहीं लगा दोगे तो बुढ़ापे में किसके आगे हाथ फैलाओगे। अब तो वे दोनों भी जान चुके थे कि इलाज बेकार हो चुका था, उससे और कुछ तो नहीं बल्कि बस शीतल के शरीर की धज्जियां उड़ी थीं। 

एक दिन यूँ ही उदास बैठी शीतल न जाने कहां शून्य में निहार रही थी तभी उसकी सहेली उमा आई। अपनी सहेली को देख शीतल का मानो बरसों से बंधा बाँध टूट गया, उमा ने उसे छाती से लगा कर उसकी असहनीय वेदना का कारण पूछा। बिलक बिलक कर शीतल ने अपने मनहूस जीवन का वर्णन कर दिया। " अरे तू इतनी दुखी क्यों होती है, तू अकेली नहीं है ऐसी बहुत सी औरतें हैं जो इसी दर्द से गुज़र रही हैं, पर उनमें से कुछ ने हार नहीं मानी और अनाथ आश्रम से बच्चे को गोद ले लिया। तू भी ऐसा कर सकती है, अपने घर वालों को मना ले, तेरी गोद भर जाएगी और एक मासूम को परिवार का सुख, प्यार मिलेगा।" शीतल को यह सुझाव भा गया था और उसने मन में संकल्प कर लिया कि वो एक नन्ही सी बच्ची को गोद लेगी, पर प्रेम को मनाना ज़रूरी था।

शाम को शीतल ने प्रेम के सामने बड़े प्यार और संव���दना के साथ अपनी कामना रखी, कुछ देर मना करने के बाद प्रेम मान गया और अगले ही दिन दोनो अनाथ आश्रम पहुंच गए। वहाँ के अधिकारियों ने उन्हें एक हॉस्पिटल का पता बताते हुए कहा कि उनके पास खबर है कि एक बच्ची अभी अभी जन्मी है पर उसका परिवार उसको अपनाना नहीं चाहता , तो आप जाकर उनसे बात करिए। प्रेम और शीतल को देख कर उस बच्ची के परिवार वालों ने सारी फॉर्मेलिटीज़ पूरी करने के बाद बच्ची उन्हें सौंप दी, यह पूछने पर की वो बच्ची को गोद क्यों दे रहे हैं उन्होंने कहा कि हमें तीन बेटियां हैं और एक और कि हम परवरिश नहीं कर पाएंगे। 

वो तेज़ बारिश की रात थी जब मिनी ने पहली बार घर में प्रवेश किया था। सासू माँ और ससुरजी ने प्रेम के फैसले पर मोहर लगाते हुए मिनी को अपना लिया। थोड़े ही दिनों में सबको पता चल गया कि शीतल ने एक बच्ची को गोद लिया है, सब बधाई देने आने लगे। मिनी के नामकरण का फंक्शन देखने लायक था, हर कोई उसकी मासूम हँसी का दीवाना हो गया। सबनें शीतल को आशीर्वाद देते हुए माँ बनने की बधाई दी।

समय ने करवट ली और मिनी 10 साल की हो गयी है, हवा की तरह चंचल और पढ़ाई में अव्वल। शीतल और प्रेम ने बड़े लाड़ से उसकी परवरिश की थी, उसकी हर फरमाईश पूरी होती, घर में उसकी पसंद का ही खाना बनता, उसकी चहक से पूरा घर गुंजायमान हो जाता था। पर शीतल के भीतर कुछ उथल पुथल चलती रहती थी, उसे डर था कि कहीं कोई मिनी को सच न बाता दे, उनके छोटे से शहर में सभी तो जानते थे इस बात को। यही सोच सोच कर शीतल हलकान हो रही थी, पर सोचा अभी मिनी 10 साल की ही तो है जब 15 कि हो जाएगी तब हिम्मत कर के उसे बाता दूँगी।

किस्मत में अक्सर वो नहीं होता जो हम चाहते हैं, और ऐसा ही कुछ शीतल के परिवार के साथ हुआ। मिनी रोती हुई घर में घुसी और अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया। शीतल घबरा गई क्योंकि मिनी ने ऐसा कभी नहीं किया था, बड़ी मिन्नतों के बाद उसने दरवाज़ा खोला। शीतल ने उसके रोने का कारण पूछा और जवाब में उसे ऐसा सवाल मिला जिससे वो सबसे ज़्यादा डरती थी। हाँ.... मिनी को किसी ने सच्चाई बाता दी थी और वो ये मानने को तैयार नहीं थी कि उसकी मम्मी उसकी असली मम्मी नहीं थीं। शीतल ने बड़ी समझदारी के साथ अपना संतुलन गवाँए बिना मिनी को चुप कराया और उससे कृष्ण और यशोदा माँ की कहानी सुनाई। उसने मिनी को बाताया कि यशोदा माँ  ने अपनी संतान न होते हुए भी श्री कृष्ण को अपनी मंंमता से सराबोर कर दिया था। शीतल ने बड़े प्यार से मिनी से पूछा कि क्या उसे कभी भी घर मे पराया संमझा गया है, मिनी ने बड़ी मासूूूमियत से मना कर दिया। "माँ आपने तो मेरी हर बात मानी है,कितना प्यार करतें हैं सब मुझसे,  मेेरा स्कूल भी बहुत अच्छा है, कभी ऐसा लगा नहीं कि मैं यहाँ की हूं"। शीतल रोने लगी और मिनि से सिसकती हुई बोली " हम सब तुुमसे बहुत प्यार करते हैं, तुम हम सबकी खुशी हो, चाहे कोई कुछ भी कहे बेेटा हमेशा याद रखना कि तुम हमारी उतनी ही अपनी हो जितनेे कृष्ण यशोदा माँ के।" 

मिनि को दादी ने श्री कृष्ण केे बहुत से किस्से सुनाये थे और वो जानती थी कि यशोदा माँ अपने कृष्ना से बेहद प्यार करती थीं। जहाँ ऐसी स्थिति में बच्चे अपना मानसिक संतुलन संभाल नहीं पाते, वहीं शीतल ने बड़ी समझदारी और अपनेपन के साथ मिनि का विश्वास भी जीत लिया और भविष्य में आने वाली कितनी ही अनहोनियों के होने के रास्ते भी बंद कर दिया।

जहाँ कुछ लोग बच्चियों को कचरे के ठेर में फेंक देते हैं, वहीं कुछ शीतल जैसे लोग ऐसी ही बच्चियों को अपनापन और स्नेह देने में पीछे नहीं रहते। ऐसी ही आज की यशोदा को मेरा नमन,  जो दूसरों के बच्चों को अपना जीवन बना कर उन्हेंं आयूषमान कर देतीं हैं।

आशा की किरण भेजती

स्वपनिल

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