ट्रोल की कहाँनी एक लेखक की ज़ुबानी
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|   Jan 11, 2017
ट्रोल की कहाँनी एक लेखक की ज़ुबानी

वैसे अगर मैं अंग्रेजी के ट्रोल(troll) से R हटा दू तो बचेगा टोल (toll) जो अक्सर हम हाइवेज पर देते है। सही शब्दो में चुंगी या कर। देखा जाए तो ज्यादा फर्क नहीं है इन दो शब्दो में। दोनों ही में आप अपनी इच्छा की विरुध्द देते है या लेते है। टोल देते देते इंसान थक जाता है और एक लेखक ट्रोल होते होते पक जाता है या फिर उसे पाक का वीसा दिलाने की कोशिशे जारी रहती हैं ।

खैर अगर आप लिखाई के मैंदान में आये हैं तो ट्रोल सामान्य सी बात हैं। और इसको भी नहीं नाकारा जा सकता की एक इंसान अपने लेख से पूरी दुनिया को खुश कर सके। कुछ दिन पहले फेसबुक पर कुछ पंक्तियाँ पढी। लिखा था "मैं राजमा चावल नहीं जो सबको खुश कर सकूँ " ,पढ़ कर हँसी भी आयी और महसूस हुआ की राजमा चावल को नहीं पसंद करने वाली भी जनता है। ज्यादा दूर क्यू जाऊँ , एक मेरे घर पर ही मौजूद हैं। एंटी राजमा चावल प्राणी।

मैं भी एक लेखक हू  और ख़ुशी होती है जब लोग मेरा लिखा हुआ पढ़ की खुश होते है और कुछ शब्द तारीफ़ में लिखते हैं। या फिर में बात करूँ उन लेख की जहाँ कुछ स्त्रियों के सामने आने वाली कठिनाईओ के बारें में लिखा था। यही सोच के की कुछ सोच बदले लोगों की।

अब आते है खिचांई पर या ट्रोल या यह कहें की अपनी बैंड बजवाना जनता से और वह भी बिना शादी के लगन के और फ्री में।

अच्छा थो नहीं लगता जब खुले आम आप पर लात और घूंसे बरसाए जाते है वह भी शब्दो के बाण से।इसी बात पर एक गाना याद आ गया ,"चलायो ना नैनो से बाण रे, जान लेलो न..... " और अगर मैं इसको बदलना चाहु तो बस नैनो के बदले "सोशल मीडिया" डाल दूंगी जो आजकल के माहौल में सही जमेगा। पर इस सच्चाई को भी नहीं नकार सकते की यह जरूरी नहीं आपकी सोच हमेशा सब से मिले। कभी -कभी हम भी गलत हो सकते है या हमारा नज़रिया एक तरफ़ा हो सकता हैं।

जब एक लेखक लिखता हैं थो किसी का दिल दुखाने के लिए या किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं लिखता। वह भी एक नज़रिया होता है किसी और की नज़र से। यह भी ज़रूरी नहीं की आप सिर्फ अच्छा लिखे या अपनी मन की बात ना बोलें पर ज़रा थोड़ी सी अच्छी भाषा का प्रयोग करें। अपनी शब्दो के बाण ऐसे ना चलाये। क्या पता आपके सही तरीके के ट्रोल से बाकियो को कुछ सीख मिले और यह अपशब्दो की लंबी गाथा शुरू ही ना हो।

और बहुत बार थो लोगो में इतना जोश होता है की बिना लेख पढे और सिर्फ लोगो की प्रतिक्रिया देख कर ही शुरू हो जाते है।  फिर बीच में से किसी की आवाज़ आती है अरे लोगो पढ़ तो लो किसने और क्या लिखा है। 

मैं भी पढ़ती रहती हू बहुत सारे लेख। कुछ पसंद आते है कुछ नहीं लेकिन उन शब्दो को किसी के ऊपर व्यक्तिगत तरीके से प्रहार नहीं करती। मुझे बस यही लगता है की अगर आप को वह चीज़ नापसंद है तो जरूर बोलेन लेकिन एक सहज तरीके से , ना की हाथ में तलवार लिए। चूंकी हमेशा देखा गया है अच्छी चीज़े कम रफ़्तार से फैलती है बाकायदा गलत चीजो के। 

मेरा यह कहने का मतलब बिल्कुल नहीं की किसी को किसी के बारें में कुछ राय रखने का हक़ नहीं जो अच्छी  , बुरी या कैसी भी हो सकती है। और शायद हर कोई परेशानियो से झूझ कर ही सफल होता है। पर शब्दो का खेल निराला है कुछ दिल को छूने वाले और कुछ चीरने वालें। हमेशा आखिरी इच्छा आप ही की होगी की कैसे हम अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करें।

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