किन्नर
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|   Apr 19, 2017
किन्नर

"मृगछालों पर पलथी मारे मदिरारुढ़ आँखों वाले उन उन्नमक्त किन्नर किन्नरियों की मृदुल मनोरम अंगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है बादल को घिरते देखा है...." कवि नागार्जुन की उपर्युक्त पंक्तियां किन्नर -किन्नरियों के ख़ुशनुमा संगीतमय एवं आनंदित छवि को दर्शा रही है । अब आप सभी सोच रहे होंगे कि अचानक मुझे "किन्नरों " के विषय में सोचने की क्या जरुरत पड़ गई? नागार्जुन तो बता ही रहे हैं कि यह समुदाय तो वैसे ही प्रसन्न रहता है। कभी-कभी हम अपने आप में इतने मगरूर रहते हैं कि हमें अपने आसपास के लोगों की समस्याएं नजर नहीं आती। शायद हमने कभी सोचा भी नहीं होगा कि दूसरों की खुशियों में बिन बुलाए मेहमान की तरह जबरन प्रवेश करने वाले किन्नर ,ट्रेनों में खुलेआम आपकी जीबो पर हमला कर अपना हिसाब उड़ा ले जाने वाले किन्नर, आपकी खुशियों मैं ताली पीट- पीटकर नाच गाकर खुशियां बिखेरने वाले किन्नर ;कभी दुखी हो सकते हैं भला। मुझे लगता है हमारे समाज को किन्नर जैसे सभ्य शब्दों के प्रयोग की आदत नहीं है । यहां तो इस समुदाय के लिए "हिजड़ा "शब्द प्रयोग किया जाता है। अपने ही समाज से बहिष्कृत यह समुदाय ,आज स्वयं की पहचान प्राप्त करने के लिए दर दर की ठोकरे खाता फिर रहा है। हम उन्हें कभी इंसान तक नहीं समझते हैं। हम स्वयं को प्रकृति का हिस्सा तो समझते हैं ।लेकिन हमें यह तक नहीं पता है कि मनुष्य श्रेणी में सिर्फ महिला या पुरुष ही नहीं आते अपितु किन्नर समुदाय भी आता है। 21वीं सदी मे रहकर भी हम उनकी उपयोगिता ना समझ सके ।लेकिन महाभारत काल में भीष्म पितामह जैसे योद्धा को पराजित करने के लिए, श्रीकृष्ण ने शिखंडी नामक किन्नर की उपयोगिता समझ ली थी। हमें यह सोचना चाहिए कि भगवान राम को भी दुआएं देने वाला यह वर्ग ,जिनके बिना भगवान की आरती भी पूरी नहीं मानी जाती है ;हम उन्हें ही अपने समाज का हिस्सा नहीं समझते। मुगल काल मैं इन्हें राजनीति में हिस्सा लेने का हक हासिल था,रनिवास के प्रधान सेवकों में इस वर्ग का नाम था ।आज भी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, रोज ,रिया सरकार एवं अन्य किन्नरों का नाम एक अच्छे पढ़े-लिखे प्रतिष्ठित समुदाय में दर्ज है ।इससे यह तो निश्चित है कि उनके पास भी पर्याप्त वैचारिक क्षमता मौजूद है। हमारे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तो इन्हें इनकी पहचान दे दी है ।अब किसी भी नौकरी में ,मतदान करने में इनको हक प्राप्त है। हमारे संत शिरोमणि 'मोरारी बापू 'जी ने उन्हें अपनी कथाकार शीर्षक बनाया है। अब बारी है हमारी ,आपकी और समाज की। हमें इस समुदाय को अपनाना चाहिए ।स्वागत करना चाहिए इस वर्ग का ताकि कोई माता-पिता ऐसे बच्चों को लावारिस न छोड़ दें। इस भय को समाज से निकालना चाहिए ;बहुत आंसू दिए हैं हमारे समाज ने।अब वक्त है इन्हें उनका हक ,सम्मान पूर्वक देने का ताकि नागार्जुन की वह पंक्तियां अपने आपको साकार कर सके। - शीला सिंह

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