क्या ये कहानी सिर्फ उसकी थी ??
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|   May 05, 2017
क्या ये कहानी सिर्फ उसकी थी ??

वो (मै उसका नाम नहीं जानती) मेरी कोई ख़ास तो नहीं थी पर मै उसे सिर्फ इतना जानती थी की वो मायरा की मम्मी थी। हम अक्सर पार्क मे, इक मुस्कान के साथ हाय- हेलो बोल दिए करते थे। बस इस से ज्यादा न कभी मुलाक़ात हुई और न कोई बात। सेंट्रल पार्क था तो मुझे ये भी नहीं पता की वो रहती कहाँ थी। मैंने उसे सिर्फ उसकी बेटी को उसके नाम से कई बार पुकारते सुना था इसलिए उसकी बेटी का नाम मालूम था। उसकी बेटी शायद 5 या 6 साल की थी। उस रोज उसकी बेटी swing लेती हुई गिर गई और घुटने पे चोट लग गयी। बचची का रोना तो स्वाभाविक है लेकिन उसे रोता देख मुझे हैरानी हूई। मुझे लगा इंसानियत के नाते उसके पास जाके उसे सांत्वना देनी चहिये। चोट ज्यादा गहरी नहीं थी। मायरा चुप हो चुकी थी और वापिस खेलने जाने को कह रही थी पर वो रोये जा रही थी। मैंने उसे console करते हुए कहा कि आपकी बेटी अब बिलकुल ठीक है। देखिये वो वापिस खेलने जाना चाहती है। आप ज्यादा ही चिंता कर रही हैं। इतनी चोट तो बच्चों को खेलने मे लग ही जाती है। वो बिना मेरी तरफ देखे अपने आंसू पोंछते हुए बोली कि वो ठीक है। उसने अपनी बेटी को ज्यादा ज़िद्द करते हुए देख खेलने को भेज दिया। मुझे उसके पास बैठे हुए संकोच सा हुआ कि बात करूं या उठ के चली जाऊं। फिर बात बढ़ाने के लिए मैंने उस से कहा... लगता है आप बहुत ज्यादा attach हैं अपनी बेटी से। उसने मुस्कुराने की कोशिश की पर वो फफक के रोने लगी। मुझे अजीब सी intention हुई कि जरूर बात कुछ और है। मै फिर उल्झन मेे पड गई कि बात करूं या नहीं। पर मेरी अंतर-आत्मा उसे रोते हुए छोड़ के जाने की इजाजत नहीं दे रही थी। मैंने उसके हाथ पे अपना हाथ रख के कहा... चोट इतनी ज्यादा नहीं है जित्ना आप रो रही हैं। आपके मन मे कोई और बात है। उसने हमारी अब तक की बातचीत मे पहली बार मेरी तरफ देखा मानो मैंने उसका दिल पढ़ लिया हो। वो तकरीबन 10 सेकण्ड्स तक मेरी आँखों मे देखती रही जैसे विश्वास नाम की चीज ढून्ढ रही हो पर वो बोली कुछ नही। मुझे लगा वो बात करने को त्यार थी लेकिन आश्वस्त नहीं थी। मैंने फिर कहा... आप मुझसे share कर सकती हैं। आपका मन हल्का हो जाएगा। आप मुझे अपना mirror समझ के मन हल्का कर लीजिये। उसे मानो यही चाहिए था। उसने कहा... "मेरा घर जाने का बिलकुल मन नहीं करता। उस जगह को अपना घर भी नहीं कह सकती। हर चीज़ की explanation देनी पड़ती है या permission लेनी पड़ती है। मायरा को और खेलना है तो घर जा के explain करो कि देर क्यों हूई। बाजार मे कोई एक्स्ट्रा सब्जी ले लूँ तो इतनी महंगी क्यों ली। अपनी मर्जी से कुछ बना दूँ तो पूछा क्यों नहीं कि क्या बनाना है। पूछ लूँ तो सुनने को मिलता है कि तुमे अभी तक घर के लोगो का taste नहीं पता। हर काम मुझपे है। मायरा, पति, सास ससुर, घर, मार्केट। सब अचछे से निभाने की कोशिश करती हूँ पर फिर भी इज़्ज़त नहीं मिलती। बीमार होती हूँ फिर भी जैसे तैसे उठ के सब काम करती हूँ पर हाल चाल पूछना तो दूर, बात करना ही छोड़ देते हैं। कल मुझे बुखार था। सब काम ख़तम कर के लेटना चाहती थी। पति को अचछे मूड मे देख के बोल दिया कि मुझे प्लेट मे खाना डाल के ला दो please। हाँ माँ को कहता हूँ, बोल के चले गये। सास ने पलेट ला के ऐसे पटकी जैसे कुत्ते को रोटी डालते हैं। ग़लती कर दी बोल के। खुद ही उठा लेती। अपने माँ बाप की नाजों से पली एक्लौती बेटी हूँ और यहाँ औक़ात सिर्फ एक नौकर की रह गई है। नौकर से भी इतनी सख्ती से पेश आओ तो वो काम छोड़ के भाग जाता है। लेकिन मैं कहाँ जाऊं"। उसने मोबाइल पे टाइम देखा और एकदम खड़ी हो गई और मायरा को आवाज दी के चलो चलें। टाइम हो गया। मेरी तरफ पलट के उसने कहा... 'thank you मेरी बकवास सुनने के लिए और sorry आपका टाइम waste हुआ'। मैंने उसे फिर से console करना चाहा कि आपका मन हल्का हो गया मुझसे बात कर के, इस से बड़ा और कुछ नही। एक छोटी सी मुस्कान के साथ bye बोल के वो चली गई। 

और मै ये सोचती रही कि जो उसने बताया उसकी अपनी कहानी थी या किसी किताब की कहानी सुना के चली गई क्योंकि ये कहानी मैंने बहुत बार पढ़ी है। बहुत बार सुनी है। शायद जयादातर औरतों की यही कहानी है।

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Pooja Garg.

     

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