परवरिश - सर्वगुण संपन्न
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|   Jun 15, 2017
परवरिश - सर्वगुण संपन्न

हर माँ बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा सर्वगुण संपन्न हो। पढाई लिखाई, घर के काम, धार्मिक, बड़ो को इज़्ज़त, छोटों को प्याऱ, हिम्मत, आतम विश्वस, अकल, सब्र और प्यार कूट कूट के भरा हो। आज कल हम पेरेंट्स पॉजिटिव पेरेंटिंग की ओर बढ रहे हैं। ये बहुत अचछी बात है। लेकिन कुछ बातें जो हम पॉजिटिव पेरेंटिंग के चक्कर मे करते हैं वो शायद बच्चों को बिगाड़ देती हैं। बिगाड न सही लेकिन थोड़ा डिमांडिंग तो बना ही देती हैं। आज कल 'हम दो हमारा इक' का चलन है। ये हर किसी की अपनी सोच या ज़रूरत है। कमाई और सुख सुविधाएं बढ़ी हैं तो खर्चे उस से भी ज़्यादा बढ गए हैं। माँ बाप दोनों मिल के भी कमायें तो भी पूरे नहीं पडते। बच्चों को टाइम भी नहीं दे पाते। लेकिन अगर हम थोड़ी सी प्लानिंग और हिम्मत करे तो कुछ भी असंभव नहीं है। थोड़ी तकलीफ तो हम अपने आप को, अपने नन्हे मुन्नों के लिए, दे ही सकते हैं। हेल्पिंग हैंड भी रखें पर उसे हेल्पिंग हैंड ही रहने दें , पूरे तरीके से उनपे निरभर न हों। आज कल टाईम भी बहुत ख़राब चल रहा है। किसी पे ज्यादा भरोसा या उम्मीद भी न रखे। ये सब के लिए पॉसिबल है चाहे आप स्टे एट होम मदर हैं या फिर वर्किंग मोम।

* सुबह बचचे के उठने से ले के उनको स्कूल भेजने तक उनके साथ बने रहिये। उनसे बातें कीजिये। स्कूल जाने से पहले बचचे से की गई बातें बच्चों को पूरा दिन कॉंफिडेंट रखती हैं कि उसके पेरेंट्स हर पल उसके साथ हैं। 

* बच्चों को सुबह नहाने के बाद प्रार्थना की आदत डालिये। उनको धार्मिक कहानीयाँ सुनाऐं। ये काम दादा दादी, नाना नानी भी कर सकते हैं। इससे वो धार्मिक इतिहास से भी जुड़ेंगे और बड़े बुजुर्गो से भी। 

* बच्चों को हमेशा अपने तरीके से मत चलायें। उन्हें ये बताएं कि क्या करना है। कैसे करना है, ये उनपे छोड़ दें। यकीन मानिये, बचचे ऐसे रास्ते भी खोज लेते हैं जो हमारे दिमाग मे कभी नहीं आते।

* किसी के समझाने से कोई नहीं समझता। चोट खा के ही अकल आती है। ये बात बच्चों पे भी लागू होती है। हर चोट पे रोने वाला बच्चा न बना कर उन्हें स्ट्रांग बनाये ताकि वो खुद ही छोटी मोटी चोटों को इग्नोर करना सिखे। 

* ज्यादा लाड न लड़ायें। बचचे को कुछ गलत करने से पहले थोड़े डर का एहसास होना जरूरी है। 

* घर के फैसलों मे उनको भी साथ बिठाऐं। उनकी राय भी जरूर लें। इस से वो ज़िम्मेदार और समझदार बनेंगे।

* उनके दोस्तों को भी सम्मान दें। उन्हें आप पे बहुत फक्र होगा।

* बचचे को किसी के भी सामने मत डांटिये। बचचों के आतम सम्मान की भी उतनी ही कदर कीजिये जितनी हम अपनी करते हैं। बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। इस उम्र मे जो बात छप जाती है, ज़िन्दगी भर नहीं निकलती।

* कम से कम एक वक़्त का खाना बच्चों के साथ उनके साथ बातें करते हुए खाऐं। उनसे उनकी दिनचर्या पुछिये और अपनी भी बताऐं। उन्हें भी उतना ही हक़ है जानने का कि उनके मम्मी पापा क्या करते हैं दिन भर। 

* अपने दोस्तों से भी उनकी जान पहचान कराऐं। 

* बच्चों के होमवर्क और प्रोजेक्ट्स मे उनकी हेल्प करें। उनका पूरा काम नहीं। वो उन्हें खुद करने दे। बच्चों की क्रिएटिविटी आपको हैरान कर देगी। 

* पॉजिटिव पेरेंटिंग करें, ओवर पेरेंटिंग नहीं। 

* बच्चों को लाड कम करेंगे तो चलेगा। लेकिन विश्वास पूरा कीजिये। इससे बचचे आपके दोस्त बनेंगे। आपको हर बात बतायेंगे।

* बच्चों की प्रॉब्लम्स को आप सॉल्व करने की बजाये उन्हें रास्ता बताइए। साल्व उन्हें खुद करने दीजिये। एक नहीं, कई मौके दीजिये उन्हें, खुद अपनी प्रॉब्लम को साल्व करने के। नहीं कर पाएंगे तो, हम हैं न। खुद करने से वो आत्म निर्भर बनेंगे।

* उन्हें कम्फर्टेबल जोन मे उतना ही रखिये जित्ना उनके लिए सही है। बाहरी दुनिया के स्ट्रगल मे उन्हें कम्फर्टेबल जोन से बाहर निकालिए। ये उनकी सफलता के आड़े आ सकता है। 

* उन्हें दोस्ती और रिश्तेदारी के मायने बताइये। अपनों के सुख दुःख मे साथ खड़े होना सिखाइये।

चाणकय पे एक नॉवेल मे मैंने पढ़ा था कि 5 साल तक के बचचे को खूब प्यार करो। फिर अगले 10 साल तक डांट डपट के रखो। और 15 साल की ऐज के बाद उनसे दोस्ती करो। पता नही, आज कल के स्मार्ट वर्ल्ड मे ये फिट बैठेगा या नहीं, पर हम जो अपने बचचो के लिए सपने देखते है उनके सर्वगुण संपन्न होने के, उसके लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं। आप भी अपनी राय और परवरिश के तरीके बताऐं। मैं पूरी कोशिश करुँगी कि मैं भी अपनी बेटी को सर्वगुण संपन्न बना सकूँ।

Thank you dear Reader for your valuable time. Your suggestions and comments are most welcome. Please Follow me for my upcoming blogs.

Pooja Garg.

 

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