एक कदम...मानवता की ओर... #ForInclusiveIndia  #mycity4kids ForInclusiveIndia
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|   Jun 09, 2017
एक कदम...मानवता की ओर... #ForInclusiveIndia  #mycity4kids ForInclusiveIndia

कुछ वर्ष पहले की बात है,शाम का वक़्त था. मैं ओर मेरे पति चाय पी रहे थे,कि अचानक किसी का फ़ोन आया.पति चाय छोड़कर,फ़ोन पर बात करने लगे.जबकि मेने इशारे से कहा भी कि...साथ साथ चाय भी पीलें,नहीं तो ठंडी हो जाएगी.पर उन्होंने मेरे इशारे को नज़रान्दाज कर दिया,ओर बातों का सिलसीला जारी रखा.फ़ोन किसका था..? ये तो मुझे समझ में नहीं आया,पर पति जिस तरह से बात कर रहे थे,लग रहा था कि ...फ़ोन करने वाला कोई विशेष व्यक्ति था ओर वो बात सुनकर, बार बार ये ही कह रहे थे...congrats..! ,well done...!.तो ये ही लगा कोई ख़ुशी की बात है.

जब बात ख़त्म हो गयी, तो मेने उत्सुकतापूर्वक पति से पूछा,किसका फ़ोन था...? ऐसा क्या हुआ जो आप इतने ख़ुश हो रहे थे.पहले तो वो टालते रहे,फिर मेरे बहुत आग्रह करने पर उन्होंने अपनी वो कहानी सुनायी,जिसका ज़िक्र तक उन्होंने कभी किसी से नहीं किया था.उन्होंने बताया कि...नौकरी के शुरुआती दिनो में ,उनके पास एक माता पिता आये,साथ में उनके ९-१० साल का बच्चा था.उन्होंने पति से कहा कि,वो अपनी कम्पनी में उनके बेटे को कोई छोटी मोटी नौकरी दिलवा दे.पति ने कहा-"ये तो अभी बहुत छोटा है,इसे आप पढ़ाए लिखाए,ओर वैसे भी छोटे बच्चों से काम करवाना क़ानूनन जुर्म है". तभी बच्चे की माँ रोने लगी ओर बोली- "साहिब हम कहाँ से लाए इतना पैसा,जो इसे पढ़ासके.आधे से ज़्यादा पैसा इसके टांग के इलाज में ख़र्च हो जाता है.जब से पैदा हुआ है,इसकी एक टाँग कमज़ोर है,ठीक से चल नहीं पाता है.थक गए इलाज कर करके.अब नहीं होता साहिब.सोचते हैं,कहीं काम कर लेगा तो,चार पैसे आएँगे घर में .ओर अब तो ये भी कहता है- मुझे स्कूल भी नहीं जाना है,पढ़ना भी नहीं है ".

माँ की बात सुनने के पश्चात,पति ने बेटे से पूछा-" क्यों भई तुम तो बड़े अच्छे बच्चे लग रहे हो,क्यों नहीं पढ़ना चाहते हो..?" बच्चा रुआँसा होकर बोला- "अंकल मैं तो पढ़ना चाहता हूँ, मेरे कक्षा में सबसे अच्छे नम्बर भी आते हैं..पर स्कूल में,मुझे सब बच्चे लँगड़ा लँगड़ा कहकर बुलाते हैं ओर परेशान भी करते हैं.मुझे अच्छा नहीं लगता है.घर पर माँ ताने मारती रहती है,कहती है..तू मनहूस है,जब से पैदा हुआ है,हमारी तो ज़िंदगी ख़राब हो गयी है".

पति ने बताया कि,वो बच्चे की बात सुनकर बहुत भावुक हो गए थे,ओर उन्होंने तुरंत एक बड़ा फ़ैसला लेने का मन बना लिया.पहले तो माता पिता को समझाया कि -जब आप ही अपने बच्चे को उसकी विकलांगता का अहसास मनहूस कहकर करवाएगे ,तो ज़माने को कैसे रोकेंगे..? आपका बच्चा तो पड़ने में भी अच्छा है,तो क्यों आगे बड़ने से रोक रहें हैं...? आप चाहें तो अपने प्यार व सकारात्मक सोच से इस बच्चे को इसके अधूरेपन के अहसास से उबार सकते हैं. रही बात पैसों की कमी की,तो आज से इस बच्चे की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी मेरी.ये जितना चाहे पढ़ सकता है.आप लोग इसे रोकेंगे नहीं.पहले तो बच्चे के माता पिता थोड़ा सकुचाए..! फिर राज़ी हो गए.

उस बच्चे को पति ने समझाया-"देखो, बेटा तुम्हारी सिर्फ़ एक टाँग ही तो ख़राब है,बाक़ी दोनों हाथ,दोनों आँखे,दोनों कान सब तो ठीक है,बिलकुल हम सबकी तरह.फिर तुम सबकी क्यों परवाह क्यों करते हो..? तुम तो सिर्फ़ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.जिस दिन पड़ लिखकर कुछ बन जाओगे, सबके मुँह अपने आप बंद हो जाएँगे.रही बात माँ की, वो तो बस मुँह की ख़राब है,क्योंकि अभी वो दुखी हैं.वरना सब माये अपने बच्चों को बहुत प्यार करती है.

पति ने बताया बच्चा बहुत ख़ुश हो गया था,ओर उसने कहा था कि...अंकल में प्रॉमिस करता हूँ,अबसे बस पढ़ाई में मन लगाउँगा.! बच्चे के माता पिता भी पूरी तरह से कन्विन्स हो गए थे.

पति ने हर महीने एक नियमित राशि अपनी सामर्थ्य से ज़्यादा,बच्चे के माता पिता को भेजनी शुरु कर दी,हालाँकि उस समय उनकी भी आर्थिक स्थिति ठीक ठीक थी,ओर परिवार की भी सारी ज़िम्मेदारियाँ थीं.पर कहते हैं ना..आप एक क़दम किसी की मदद के लिए आगे बड़ाते हैं तो,ईश्वर आपकी मदद स्वयं करते हैं.उस दिन के बाद से कभी उन्हें पैसों की कमी महसूस नहीं हुई अपितु दिन रात तरक़्क़ी ही होती गयी.

पूरी कहानी सुनाने के बाद उन्होंने बताया कि,ये फ़ोन उसी बच्चे का था.उसने इंजेनियेरिंग कीं पढ़ाई कर ली है,ओर उसको जॉब भी मिल गयी है,इसलिए उसने फ़ोन किया.वो बहुत ख़ुश था ओर बहुत बहुत धन्यवाद कर रहा था.

पति की पूरी कहानी सुनकर,में भावुक हो उठी...! मेने पति से कहा-"ये तो नेक कार्य है, फिर आपने आज तक किसी को क्यों नहीं बताया..? जहाँ तक की मुझे भी नहीं..!". पति ने कुछ देर रुक कर फिर कहा-" मेने,इसलिए नहीं बताया, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम,बच्चे या परिवार का कोई भी सदस्य उस बच्चे पर,या परिवार वालों पर कभी भी कोई अहसान जताओ कि मेने उस बच्चे को पडाया है ".में पति की भावनाओं को समझ चुकी थी,अतः मेंने भी उस बच्चें का नाम पता फिर कभी नहीं पूछा.

पति नहीं रहे,पर उनके बाद बच्चों को कभी शिक्षा व रोज़गार के लिए किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ा.शायद ये उनके नेक कार्यों का ही फल था.

यदि आप भी चाहते हैं,ऐसे नेक कार्यों में भागीदार बनना तो,कुछ टिप्स हैं जो आपके साथ शेयर करना चाहूँगी-

१.यदि आप आर्थिक रूप से सक्षम हैं,तो स्वयं किसी दिव्यांग जन की मदद करने के लिए आगे आयें व उन्हें जिस प्रकार की मदद की आवश्यकता है-चाहे वो शिक्षा सम्बंधी हो,या स्वास्थ्य सम्बन्धी हो,उपलब्ध कराए.

२.यदि स्वयं ना मदद कर सके,तो उन्हें इतना तो समझा सकते हैं कि-सरकार की तरफ़ से जो दिव्यंगो की शिक्षा व रोज़गार से सम्बंधी योजनाए या सुविधाएँ उपलब्ध हैं,उनसे वे कैसे लाभान्वित हो सकते हैं. क्योंकि कई बार जानकारी के अभाव में,वो इन सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं.आर्थिक व सामाजिक सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम शिक्षा है.इस प्रकार इन्हें शिक्षित करके समाज की मुख्यधारा से जोड़ा सकता है.

३.कई ऐसी सामाजिक संस्थाए हैं,जो दिव्यंगो का निशुल्क इलाज करती हैं...यदि ऑपरेशन की आवश्यकता होती है, तो वो भी निशुल्क ही किया जाता है.वहील chair,सर्जिकल footwear जैसे उपकरण भी निशुल्क प्रदान करतीं है.इनके खाने पीने व रहने की व्यवस्था भी संस्थान द्वारा ही की जाती है.यहाँ इन्हें व्यावसायिक शिक्षा दी जाती है ताकी आगे चलकर ये कमायी कर सकें ओर आतमनिर्भर बन सकें.ऐसी सामाजिक संस्थायो से जोड़कर भी,इन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकता है.ऐसी ही एक संस्था राजस्थान के उदयपुर नामक शहर में है,जिसका नाम 'नारायण सेवा संस्थान है'.

४.इन्हें कभी हीन भावना से नहीं अपितु प्रेममयी भावना से देखना चाहिए.आपकी एक प्यार भरी नज़र,इनको आगे बड़ने में मदद कर सकती है,कुंठा से बाहर निकाल सकती है.इनको ये कभी ना जताए कि आप उनपर दया या अहसान कर रहें हैं,अपितु ये अहसास कराये कि वो भी हम जैसे ही हैं,ओर समाज के मुख्य अंग है.इस प्रकार भावनात्मक रूप से भी मज़बूत करके उन्हें हम समाज में समावेश (include) कर सकते हैं,उन्हें ओरों के जैसे सम्मान पूर्वक जीवन जीने के लिए प्रेरित कर सकते हैं.

तो फिर देर किस बात की,उठाइए----

एक क़दम ...मानवता की ओर...

आपको ये कहानी व मेरे अनुभव कैसे लगे....? ज़्यादा से ज़्यादा Share व like करें.

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