काश...!! मेरे अपने भी ऐसे ही होते....
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|   May 09, 2017
काश...!! मेरे अपने भी ऐसे ही होते....

कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते......कहीं से निकल आये जन्मो के नाते.........!!!! रेडीओ में फ़िल्म आनंद का बड़ा ही सुंदर गाना बज रहा था ,में गाना सुनते सुनते खो गयी बीती यादों में.....!!!!

दो साल पहले की बात है,में अपने निकट के रिश्तेदार के यहाँ मुंबई गयी थी.जब भी फ़ोन पर बात होती वो हर समय मुंबई आने के लिए कहती ....अरे एक बार तो आ जाओ ...काफ़ी समय हो गया मिले हुए....... हम सब तो बहुत याद करते तुम्हें ....! हाँ जब भी आना ,समय लेकर आना....ये नहीं कि बस दो दिन के लिए आए ओर चल दिए.......! इतने अपनेपन से कोई बुलाए तो एक बार तो मन करता ही है कि चलो मिलकर आते हैं.

बेटे को बोला...चलो प्रोग्राम बना लो ओर टिकिट जल्दी से बुक करवालो....क्योंकि अभी बच्चों की छुट्टीआँ होने वाली हैं,फिर टिकिट नहीं मिलेगी.बेटे को ज़्यादा छुट्टीआँ नहीं थीं ,इसलिये केवल दो दिन का ही प्रोग्राम बनाकर जाने का टिकिट बुक कर दिया .आने का टिकट वेटिंग का था.बेटे ने कहा....७-८ वेटिंग है कन्फ़र्म हो जाएगा.हमने उनको अपने आने की सूचना दे दी.

हम दोनों मुंबई पहुँच गए.गाड़ी से उतरकर मेने उन्हें फ़ोन किया कि हम लोग पहुँच गए हैं,बस १ घंटे में आपके पास पहुँच जायेंगे.मेने सोचा दूसरी तरफ़ से जोश व उत्साह से भरी आवाज़ आएगी....अरे वॉ..!! पहुँच गए...चलो जल्दी से आ जाओ सब इंतज़ार कर रहें हैं .....!! पर ऐसा कुछ नहीं हुआ....बस उन्होंने कहा....ओके,आ जाओ. एक बार को मुझे उनका इस तरह की प्रतिक्रिया देना अच्छा नहीं लगा.. पर मेने हँसकर कहा हाँ पहुँच रहे हैं दीदी.बेटे को मेने कुछ नहीं कहा.क्योंकि वो मुझे ही सुनाता....आपको ही सबसे मिलने की पड़ी रहती है...बस ज़रा से किसी ने बोला नहीं ओर आ जाती हैं बातों में......!! सोचती हूँ बच्चों का क्या क़ुसूर..? मैं हूँ ही ऐसी...सीधी...सरल...नहीं समझती लोगों के दोहरे स्वभाव को.

कुछ ही समय में हम घर पहुँच गए...! दीदी ने दरवाज़ा खोला.... हम दोनों अन्दर आ गए. बेटे ने दीदी जीजा जी के पैर छुए.दोनों ने ख़ुश रहो कहकर बैठने को कहा.छुट्टी का दिन था सो जीजा जी घर पर ही थे .दीदी चाय ओर नाश्ता ले आयीं.इधर उधर की बातें होती रहीं ओर बातों ही बातों में दोनों ने हमारा प्रोग्राम भी पूछ लिया. उन्हें इस बात की तसल्ली हो गयी कि हम दो दिन से ज़्यादा नहीं रुकेंगे.

में जो मिठाई व सबके लिए गिफ़्ट्स लायी थी वो दीदी को दे दिए.....बोली अरे इनकी क्या ज़रूरत थी....हम लेने देने में विश्वास नहीं रखते.....! अरे दीदी अब इतने दिनो बाद मिली हूँ,कोंनसा से रोज़ रोज़ आ रही हूँ....फिर बच्चों की माँसी हूँ, उनके लिए कुछ नहीं लाती क्या...? मेरी बात सुनकर दीदी चुप तो हो गयी पर उनके चेहरे को देखकर लग रहा था मानो उनके ऊपर कितना बोझ लद गया हो...!! दिनभर कैसे बीत गया,मालूम ही नहीं पड़ा.दीदी के बेटे ओर बेटी भी मेरे बेटे के हम उम्र ही थे इसलिए आपस में जल्द ही घुलमिल गए. में ये सोचकर ख़ुश थी कि...चलो बेटे को कम्पनी मिल गयी नहीं तो बोर हो जाता ..!रात को खाना खाने के बाद,बच्चें सोने चले गए दीदी जीजा जी बोले चलो थोड़ा बाहर घूम आयें....! हम तीनों घूमने निकल गए.आधा पॉन घंटा घूमने के बाद घर आ गए.पहला दिन ठीक ठाक निकल गया. दूसरे दिन भी सबको छुट्टी थी,किंतु दीदी के बच्चे नाश्ता करने के बाद कोई ना कोई बहाना बनाकर चले गए...किसी को कहीं जाना था तो किसी को कही ओर...खेर क्या कर सकते हैं....? सबकी अपनी अपनी लाइफ़ है. जीजा जी दीदी से बोले ....सुनो मेरे कुछ क्लाइयंट आए हुए हैं ,तो mujhe होटल जाना हैं. तुम इन्हें लेकर चली जाना कोई मॉल दिखा देना.दीदी बोली.....मेरे सर में रात से ही दर्द हो रहा है,अभी अभी दर्द की गोली ली है...अगर ठीक हो जाता है तो.....मेने बीच में टोकते हुए कहा....अरे दीदी हम तो बस आप लोगों से मिलने आए.......घूमना फिरना तो होता रहता है.....!आप अपनी तबियत पर ध्यान दें. जीजा जी चले गए....दीदी दिन भर सर पर पट्टी बांधे घूमती रहीं ....मेने लंच तैयार कर दिया ....दीदी थोड़ी थोड़ी देर में ये ही कह रही थी...अरे तुम भी क्या सोचोगी...? दीदी ने काम पर लगा दिया.. .! मेने कहा ......तो क्या हुआ दीदी ....घर पर भी तो काम करते है ना.लंच पर बच्चे भी आ गए ,सबने खाना खा लिया,सब काम हो गया तो दीदी भली चंगी हो गयी.दिन भर यों ही निकल गया,ना दीदी ने ना hi बच्चों ने किसी ने घूमने का नाम nahi लिया.मेरा भी अब घूमने का कोई मूड नहीं रहा गया था, में भी थक चुकी थी.

रात को जीजा जी घर आए तो उन्होंने एक बार को भी नहीं पूछा कि......दिन भर क्या किया....? कहाँ गए...? मुझे अब इन सबकी योजना स्पष्ट नज़र आ रही थी.रात को सोते सोते अचानक मेरे घुटनो में काफ़ी दर्द शुरू हो गया ओर सुबह तक इतना बड़ गया कि चलने में बहुत दिक़्क़त हो रही थी,मुझे चिंता होने लगी किआज शाम को तो हमारी ट्रेन है...कैसे सफ़र करूँगी .? तभी बेटे ने बताया कि माँ टिकिट कन्फ़र्म नहीं हुआ...! सुनकर थोड़ी राहत मिली.... चलो कल कीं ट्रेन देख लेंगे........तब तक दर्द में भी आराम आ जाएगा.लेकिन दीदी जीजा तो सुनकर परेशान हो गए......बेटे को समझाने लगे .....अरे कोई दूसरी ट्रेन में देख लो .....सेकंड AC में ट्राई करो.......नहीं तो कहो तो में किसी से बात करूँ........यानी की वो चाहते थे ,कि हम जैसे तैसे आज ही निकल जाए..!!

बेटे ने कहा.....अंकल जी कल की ट्रेन में देख लेता हूँ,माँ को भी दर्द मे आराम आ जाएगा......!! बेटे की बात सुनकर दीदी लपक कर बोली.....अरे बेटा माँ को तो में ऐसी पेन किलर दूँगी की तुरंत आराम आ जाएगा.अब तो हद हो गयी थी.....मेने बेटे को कहा.....रात कीं ही ट्रेन में ही देख ले ......चाहे फ़र्स्ट AC में ही क्यों ना मिले.... ! मन तो कर रहा था एक पल भी ओर ना रुकूँ यहाँ......!!

बेटे ने जैसे तैसे रात की ट्रेन की टिकिट बुक कर दी.मेने दर्द की दवा ले ली.थोड़ी राहत मिली पर चलने meअभी भी तकलीफ़ हो रही थी.शाम हो गयी थी ,बच्चे व जीजा जी ऑफ़िस से आ गए थे.हमारा भी जाने का समय हो रहा था.क्योंकि स्टेशन जाने में भी १ घंटा लगता था. दीदी बड़े बेमन से बोली साथ का खाना बना दूँ...मेने कहा.., रहने दो दीदी ट्रेन में ही कुछ ले लेंगे.बेटे ने समान उठाकर बाहर रखा,ना किसी ने उसकी मदद कीं.नाहीं कुछ बोला कि.....आप लोग आए अच्छा लगा.......फिर आना.नीचे तक भी कोई नहीं आया बस लिफ़्ट तक आकर बाय बाय कर दी.

सचमुच हमारी ऐसी विदाई इससे पहले कभी नहीं हुई थी.हम दोनों बुझे मन से बस स्टॉप पहुचे...काफ़ी इंतज़ार के बाद बस आयी,सारी भीड़ उसमें chad गयी.खड़े खड़े मेरा तो बुरा हाल हो गया था.बड़ी मुश्किल से बेठने को एक सीट मिली तो बेटे ने मुझे बेठने को कहा ओर स्वयं खड़ा रहा. में बहुत आहत थी ,एक तो दर्द से .....दूसरा अपनो के व्यवहार से .बस बहुत ही रुक रूककर चल रही थी......लग रहा था समय से पहुँचेगी भी की नहीं..........??

कुछ ही देर में एक लड़का ,जिसके कंधे पर एक बेग लटका हुआ था.. शायद वो भी स्टेशन जा रहा था......मेरे बेटे के पास आकर खड़ा हो गया .कहने लगा आप भी स्टेशन जा रहे हो......बेटे ने बोला हाँ...... शायद गाड़ी भी उसकी ओर हमारी एक ही थी..तभी वो चिंतित होकर बोला......जैसे बस चल रही है,लगता नहीं है कि समय पर पहुँचाएगी.....में तो अगले स्टॉप पर उतरकर टैक्सी से स्टेशन चला जाऊँगा........क्या आपको भी चलना है ......?? बेटे ने कहा ....नहीं ,मेरे साथ माँ हैं,उनको टांगो में तकलीफ़ है वह बार बार chad उतर नहीं सकती.वो लड़का तो अगले स्टॉप पर उतर गया ओर में भगवान से ये ही प्रार्थना कर रही थी कि जैसे तैसे हम समय पर पहुँच जाए..!!

फ़ाइनली हम स्टेशन पहुँच गए,गाड़ी प्लैट्फ़ॉर्म पर खड़ी थी,हम तेज़ तेज़ चलकर अपने कोच तक पहुँचे.अंदर जाकर अपनी सीट पर बेठे ही थे कि गाड़ी चल पड���ी.अभी सब लोग अपना समान रख ही रहे थे कि इतने में वो बस वाला लड़का हमें ढूँढता हुआ आ गया.बेटे को देखकर बोला.......आराम से chad गए कोई दिक़्क़त तो नहीं हुई....? मुझे आप लोगों की चिंता हो रही थी.. कहीं गाड़ी तो नहीं छूट गयी.......? आंटी जी का दर्द कैसा है......? बेटा कह रहा था...नहीं भैया बस थोड़ा भाग दौड़ करनी पड़ी बाक़ी आराम से chad गए थे. आपका कोच कोनसा है.....? वो बोला. ..मेरा कोच तो पाँच डिब्बे पीछे है.बेटे ने कहा...थैंक यू भैया,आप हमसे मिलने इतनी दूर से आए.मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला,में तो बस अवाक् सी रह गयी....!! सोच रही थी....जो घर में देखकर आयी थी वो सही था ...या जो में देख रहीहूँ वो सही है. जहाँ आज के वयस्तम दौर में अपनो को अपनो के लिए समय नहीं है,वहाँ इस अजनबी का ,जिसे हम जानते तक नहीं बस कुछ पलों कीं मुलाक़ात,हमारे लिए इतना फ़िक्रमंद होना,मेरे दिल को छू गया मेरी आँखे भर आयी...........!!!!

वो अजनबी तो चला गया....!! सूरत तो उसकी याद नहीं पर सीरत उसकी आज भी मालूम है.......जो दूसरे की माँ की इतनी फ़िक्र करता हो,वोअपनी माँ को कितना चाहता होगा......? जिसके लिए चंद मुलाक़ात इतनी अहमियत रखती हो......वो रिश्तों को कितनी ख़ूबसूरती से निभाता होगा....?

आज भी जब उस अजनबी को याद करती हूँ तो मन से ये ही आह निकलती है........काश....!! मेरे अपने भी ऐसे ही होते.....

आपको मेरी कहानी कैसी लगी.....?ज़रूर लिखिएगा. ज़्यादा से ज़्यादा लाइक करे व शेयर करें....par atithiti ke sath aisa vyavahar kabhi na Kare.

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