परिंदा तो चला गया...पर जाते जाते सबको,मानवता का पाठ पड़ा गया....#पहलीकिरण
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|   Jun 01, 2017
परिंदा तो चला गया...पर जाते जाते सबको,मानवता का पाठ पड़ा गया....#पहलीकिरण

संडे का दिन था, बच्चों के ऑफ़िस की छुट्टी थी.सोचा था आज थोड़ा आराम से ऊठूँगी...किंतु सुबह से ही किसी कोवै की लगातार काँव-काँव की आवाज़ आ रही थी..जिससे नींद जल्दी ही खुल गयी.आवाज़ बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी...खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर देखा,तो..सामने के पेड़ पर एक कौवा उलटा टंगा हुआ था,काँव..काँव चिल्ला रहा था ओर बुरी तरह फड़फड़ा रहा था.ये देखकर,एक पल को मेरा मन बहुत ख़राब हो गया पर अगले ही पल में अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गयी. दोपहर के १२ बज रहे थे,में सुबह के काम से अभी फ़्री हुई थी कि फिर से उस कौवे की तरफ़ मेरा ध्यान चला गया...उसकी आवाज़ पहले से कम हो गयी थी,शायद चिल्ला चिल्लाकर अब उसमें शक्ति ही नहीं रही थी.हाँ फड़फड़ाहट उसकी पहले से भी ज़्यादा हो गयी थी.उसकी ये दशा देखकर मेने बेटे को बुलाया ओर कोवै को दिखाया, बोला... तुरन्त नीचे जाओ ओर वॉचमेन को बोलो इसको नीचे उतारने का कोई प्रबंध करे.मेने सोचा बेटा कहेगा...जी माँ अभी जाता हूँ किंतु इसके विपरीत वो बोला....माँ आप तो छोटी छोटी बातों को लेकर परेशान हो जाती हो.ना जाने ऐसे कितने पशु पक्षी हैं,जो रोज़ मरते रहते है,आप किस किसको बचायेंगीं...? में नीचे नहीं जाऊँगा,मुझे शर्म आती है...सब लोग क्या कहेंगे...? एक पक्षी को लेकर इतने परेशान हो रहे हैं.मज़ाक़ बनेगा सो अलग. दूसरे बेटे को बोला, तो उसका भी वही जवाब था.मेने दोनों बेटों को समझाया कि..'इंसान हो या पशु पक्षी सबकी जान बहुत क़ीमती होती है, हाँ सबकी जान तो हम नहीं बचा सकते,किन्तु जों हमारे सामने तड़प रहा है,उसके लिए प्रयास तो कर ही सकते हैं...ओर हाँ..शर्म तो बुरे ओर ग़लत काम करने में आनी चाहिए,किसी की जान बचाने में नहीं क्योंकि किसी की जान बचाना शर्म का नहीं पुण्य का काम होता है'. ये कहकर में स्वयं नीचे जाने के लिए तैयार हो गयी यही सोचकर कि...जब तक 'ख़ुद ना मरो,तब तक स्वर्ग नहीं मिलता है'.

नीचे जाकर वॉचमेन को बोला...'भैया बाहर पेड़ पर एक कौवा ना जाने कब से उलटा लटका हुआ है,बुरी तरह तड़प रहा है.आपके पास कोई लम्बी सीडी या बाँस है,जिसकीं सहायता से इसको नीचे उतारा जा सके' . वॉचमेन ने पहले तो मुझे बड़ी अचरज भरी नज़रों से देखा....!!! जैसे मेने कुछ ग़लत कह दिया हो,फिर बोला...'नहीं मेडम हमारे पास इतनी बड़ी सीडी नहीं है,ओर वैसे भी हम तो डूटी पर हूँ'. में अभी बात कर ही रही थी की ऊपर से किसी की व्यंग भरी आवाज़ आयी....अरे आंटी जी इतनी ही चिंता है उस कौवे कि तो ख़ुद ही क्यों नहीं पेड़ पर चढ़कर उसे उतार लातीं....!! मेने ऊपर की ओर देखा...तीन चार लड़के लड़कियाँ मिलकर हंस रहे थे.सोचा कह दूँ ...तुम्हारे जैसे जवान होती तो शायद पेड़ पर भी चड़ जाती...!! फिर सोचा कौन मुँह लगे इनके.बस निराश मन से ऊपर आ गई.

इस उधेड़ बुन में बैठी थी की अब क्या करूँ,क्या ना करूँ...? तभी मुझे याद आया मेने कहीं पड़ा था,शहरों में 'नेचर केयर क्लब' होते हैं जो पशु पक्षियों की देखभाल करते हैं.पशु पक्षी यदि घायल हो जाते हैं तो इनको फ़ोन करने पर इनके सदस्य आते है ओर इनको साथ ले जातें हैं व इनका इलाज करते हैं. बस मुझे एक आशा की किरण दिखायी दी.सोचा कोशिश करने में क्या जाता है...? बेटों को बोला. ...सुनो नेट पर नेचर केयर क्लब वालों का फ़ोन नम्बर ढूँढो शायद मिल जाए.बच्चे फिर ग़ुस्सा हो गए कहने लगे...फ़ोन नम्बर मिल भी गया तो उठायेगा कौन......? ओर उठा भी लेगा तो इस भरी दोपहर में आएगा कौन...? हमारा संडे तो आपने ख़राब कर ही दिया है उनको तो छोड़ दो.सब लोग अपने अपने घरों में आराम कर रहे हैं ,ओर एक आप हो की सुबह से ख़ुद भी परेशान हो रही हो ओर हमें भी चेन से नहीं बेठने दे रही हो.मेने कहा...हाँ बेटा में परेशान हूँ,क्योंकि मुझे लगता है कि तुम्हारे पापा को समय पर मेडिकल सुविधा नहीं मिल सकी इसलिए हम उन्हें नहीं बचा पाए.किंतु इस पक्षी की समय पर मदद करके तो हम इसे बचा सकते हैं ना...!!

मेरी बात सुनकर दोनों भावुक हो गए ओर बिना कुछ कहे,लैप्टॉप चालू करके नम्बर ढूँढने लगे.कुछ ही देर में फ़ोन नम्बर मिल गया ओर उनसे सारी बात भी हो गयी .उन्होंने एक घंटे के भीतर आने को कहा..!! मेने चेन की साँस ली......!!!! में बार बार उस कौवे को देख कर आती कि हिलडुल रहा है या नहीं...?

४ बजे नेचर केयर क्लब वालों का बेटे के पास फ़ोन आया कि वो लोग आ गए हैं,वो नीचे आ जाए.मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि सचमुच ऐसे संस्थाएँ इतनी सक्रिय होती हैं,जो एक फ़ोन कॉल करने पर हाज़िर हो जाती है,वो भी संडे के दिन.......!!

मेने नीचे देखा... दो तीन युवक ओर युवतियाँ बायक पे आए थे. बेटे से बातचीत कर रहे थे.कुछ ही देर में उन्होंने फ़ायर ब्रिगेड को बुलाया.फ़ायर ब्रिगेड वालों ने एक बटन दबाया तो लम्बा सा लोहे का रोड ,जिसके एक सिरे पर हुकनुमा आकृति बनी हुई थी,बाहर आया ओर पेड़ की उस ऊँचाई तक पहुँच गया जहाँ कौवा लटका हुआ था...बस हुक की सहायता से उसे खींचकर नीचे उतार लिया ओर उसे नेचर क्लब वालों को सौंप दिया.उन्होंने सबसे पहले उसे पानी पिलाया फिर उसके घावों पर दवा लगायी ओर प्यार से ऐसे सहलाया जैसे कोई अपने बच्चे को सहलाता है.....! उनका पक्षियों के प्रति निश्चल प्रेम देखकर मेरी आँखे भर आयी.वहाँ खड़े सभी लोग ये दृश्य देखकर भावुक हो गए.

कौवे को नेचर क्लब वाले अपने साथ ले गए.बच्चे भी ऊपर आ गए थे.मेने देखा जो बच्चे सुबह से मुझे भला बुरा कह रहे थे,कभी ग़ुस्सा कर थे तो कभी मुझे कोस रहे थे,वो अब एकदम शांत थे उनके चेहरे पर एक सुकून था मानो वो किसी अपने की जान बचाकर आयें हैं...!! बच्चों में जो ये परिवर्तन हुआ ओर परिंदे को कष्ट से मुक्ति मिली उसके पीछे कहीं ना कहीं मेरा धेर्या ही था.क्योंकि सबकी बातें सुनकर में यदि अपना इरादा बदल देती,तो शायद ये सब सम्भव नहीं हो पाता......!!

मेरा ये मानना है कि बच्चों को अच्छे कार्यों को करने के लिए सदैव प्रेरित करते रहने चाहिए.ओर उन्हें ये भी समझाना चाहिए कि घर,परिवार ओर समाज के अलावा पशु पक्षियों के प्रति भी हमारी ज़िम्मेदारी होती है ,जिसे पूर्ण निष्ठा से निभाना चाहिए.

परिंदा तो चला गया...पर जाते जाते सबको, मानवता का पाठ पड़ा गया....!!

आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा ........? अवश्य बतायें. ज़्यादा से ज़्यादा like व share करें.

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