"उन्हें फ़िक्र है मेरी...और मुझे फ़क़्र है,अपनी परवरिश पे.."
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|   Jul 25, 2017
"उन्हें फ़िक्र है मेरी...और मुझे फ़क़्र है,अपनी परवरिश पे.."

कुछ समय पहले की बात है,मेरे छोटे बेटे को ऑफ़िस की तरफ़ से अवॉर्ड मिला.वो बहुत ख़ुश था.उसने मुझे जब अवॉर्ड थमाया तो में बहुत ख़ुश हुई,मेरे आँखे भर आयी थी.सबके लिए ये मामूली सी बात होगी,किंतु मेरे लिए ये मेरे सालों की तपस्या,मेरे धेर्य और संघर्ष का फल था.इसमें मेरे पति के वो सपने थे जो उन्होंने अपने लाड़ले के लिए देखे थे.साथ ही मेरे बेटे का कठोर परिश्रम भी शामिल था.उससे भी बड़ी बात ये थी कि,ये उनके लिए एक करारा जवाब था-जिन्होंने एक दिन मेरे बेटे की क़ाबलियत पे शक किया था..!!

मेरा छोटा बेटा बचपन में बहुत ही सीधा व शर्मिला था.पड़ायी में अच्छा था.जैसा आजकल ज़माना चुस्त चालाक लोगों का होता है,वैसा ही उसके विद्यालय में होता था,जो बच्चें बोलने में होशियार थे टीचर के आगे पीछे थे घूमते रहते थे,उन्हें ही अक्सर विद्यालय में होने वाली गतिविधियों में आगे रखा जाता था.चाहे वो प्रतियोगिताएँ हों या फिर वर्षिकोत्सव.उस वर्ष भी बेटे के विद्यालय में वर्षिकोत्सव की तैयारी पूरे ज़ोरशोर से चल रही थी,मेने बेटे से कहा-'तुम भी मेडम के पास जाओ,ओर कहो मुझे भी किसी नाटक या सामूहिक नृत्य में भाग लेना है'.दूसरे दिन बेटा जब विद्यालय से घर वापिस आया,तो मेने उससे पूछा कि वो मेडम के पास गया था.मेरा इतना पूछना ही था,कि वो रोने लग गया ओर रोते रोते बताया-वो मेडम के पास गया था ओर उनसे कहा था कि उसे भी वर्षिकोत्सव में भाग लेना है, तो मेडम ने tounting way में कहा-'I know how much talent u have' run away !!, 'सब बच्चे मेरा मज़ाक़ बना रहे थे'.ये सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा ओर आश्चर्य भी हुआ कि,कोई टीचर इतने कठोर शब्द किसी मासूम बच्चे को कैसे कह सकता है.उसने एकबार को नहीं सोचा कि,बच्चे के कोमल मन पर इसका कितना बुरा असर पड़ सकता है.?फिर वो तो एक स्त्री भी है,इस बात को बेहतर समझ सकती थी.मेरा बेटा दिन भर उदास रहा.मेरे से ये ही पूछता रहा कि-'क्या सचमुच मेरे में कोई टैलेंट नहीं है..?'. मेने उसे प्यार से समझाया-'बेटा धेर्य रखो,एक दिन तुम्हारा दिन ज़रूर आएगा.बस अच्छे से अपनी पढ़ायी करो ।.बेटे को तो जैसे तैसे शांत करा दिया,पर मुझे उसके भविष्य को लेकर चिंता होने लगी.एक पल को सोचा,टीचर को जाकर मिलूँ ओर पूछूँ कि उन्होंने मेरे बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया..? पर अगले पल को लगा,मेरा ऐसा करना मेरे बच्चे के भविष्य को प्रभावित कर सकता है,क्योंकि वो टीचर विद्यालय की मैनज्मेंट कमेटी में बड़े पद पर आसीन थीं,ओर उनकी विद्यालय में बहुत चलती थी.बस यही सोचकर मेने अपना निर्णय बदल दिया ओर सोचा ,में ही बच्चे के संघर्ष में उसका धेर्यतपूर्वक साथ निभाऊँगी उसे उसका भविष्य बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती रहूँगी.सदैव उसकी ढाल बनकर रहूँगी,जिससे लोगों के कटु वचनो रूपी बाण कभी भी उसके कोमल हृदय को घायल ना कर सकें.

बचपन से सुना था,एक शिक्षक की भूमिका उस सीडी जैसी होती है,जिसके सहारे लोग जीवन की ऊँचाइयों को छूते हैं.एक बच्चे के जीवन में,शिक्षक का स्थान माता पिता के बाद,किंतु ईश्वर से पहले आता है.शिक्षक उस माली के समान होता है,जो विद्यार्थी रूपी पौधे को सींचकर उसे एक आदर्श नागरिक रूपी वृक्ष का रूप देता है..!! शायद सभी माता पिता इसी आस के साथ अपने जिगर के टुकड़ो को शिक्षक के सुपुर्द करते है.शिक्षक की अहम भूमिका तो यही होती है कि,वह उन विद्यार्थियों की ओर ज़्यादा ध्यान दें ,जो ���ड़ने में कमज़ोर है या ज़िनमे आत्मविश्वास की कमी है..तथा अपने प्रयासों से व शिक्षा से उनमे सीखने की प्रवृति का विकास करे,ओर उनके सोए आत्मविश्वास को जगाए.

पर मेने अपने बच्चे के साथ ऐसा कुछ नहीं होते देखा.ना तो उसकी शिक्षिका उसके लिए सीडी बन सकी,जिसके ज़रिए वो ऊँचाइयों को छूता.ना ही वो माली जो उसे अपने प्रेम व आदर्श से सींचकर एक कामयाब इंसान बनने में सहायता करती.

मेरा बेटा इस घटना से इतना प्रवाभित हुआ कि,अब उसका विद्यालय जाने का मन नहीं करता.कहाँ वो पहले ख़ुशी ख़ुशी जाता था,एक दिन भी नागा नहीं करता था.जिन प्रतियोगिताओं में वो बड़ चढ़कर हिस्सा लेता था,उनमे भी उसकी रुचि कम होने लगी.परीक्षाफ़ल पर भी इसका प्रभाव सीधेतौर पर दिखायी दे रहा था.ये हमारे लिए संकेत था..!,एक अलार्म था...! .ओर हमने इसे समय रहते समझ लिया था.अमूमन माता पिता इस संकेत को समझ नहीं पाते,या फिर समझते समझते बहुत देर हो जाती है ओर परिस्थितियाँ हाथ से निकल जाती हैं.फिर पछताने के अलावा कुछ नही रह जाता.ऐसे में कभी कभी तो माता पिता आपस में झगडने लगते हैं,ओर इक दूजे को परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेवार ठहराने लगते हैं.कई माता पिता बच्चे के प्रति कठोर हो जाते हैं ओर उसे कोसने लगते हैं.यही वो संवेदनशील मोड़ होता है बच्चों की परवरिश मे,जहाँ ज़रूरत होती है माता पिता को धेर्य रखने की ओर गम्भीर होने की.

हम दोनों पति पत्नी ने भी समय की नज़ाकत को समझा ओर बेटे को धेर्यतपूर्वक अपने स्नेह से ,अपने कार्यों से ओर अपने समर्पण से इस मनोदशा से उबारा.हमारे प्रयास सफल हुए,बेटे ने १२वी कक्षा ऊतीर्ण कर ली थी.अब इंजीनियरिंग की पड़ायी के लिए उसे दूसरे शहर जाना पड़ा.में वहाँ भी उसके पास परीक्षा के समय चली जाती थी ओर जो सहयोग मेरे से बन पड़ता वो में करती थी.बेटे ने अच्छे अंकों के साथ इंजिनीरयिंग की पढ़ायी पूरी कर ली थी.हम सब बहुत ख़ुश थे कि हमारी मेहनत सफल हुई.किसी से कोई गिला शिकवा नहीं था.बस ईश्वर का शुकराना था.

पर हमारी ख़ुशियों को अचानक जैसे किसी की नज़र लग गयी,पति का अचानक देहावसान हो गया.मैं टूट चुकी थी.जिस इंसान के साथ ही क़दम से क़दम मिलाकर ये कठिन सफ़र तय कर पायी थी,अब अकेले कैसे पहाड़ जैसा जीवन तय करूँगी...?.ये सवाल मुझे अंदर ही खाए जा रहा था.पर कहते हैं..माँ कितनी ही दुखी क्यों ना हो (टूटी हुई) पर वो अपने बच्चों को टूटता हुआ नहीं देख सकती.अपने बच्चों के लिये फिर से नए सिरे से अपने जीवन की शुरुवात की.मेरे होंसलो को बढ़ावा देने के बजाय,लोग कई बार ऐसी ऐसी बातें करते थे..'हमने भी अपने बच्चे को पड़ने के लिए घर से दूर भेजा था,पर उनके साथ नहीं गए थे,उन्हें अकेला छोड़ दिया था.अब उन निष्ठुरों को कौन समझाये कि,हर बच्चे की प्रवृति अलग अलग होती है सबको एक ही डंडे से नहीं हाँक सकते .बच्चे मेरे से सलाह लेते हैं या मेरे प्रति अपना concern दिखाते हैं,तो बच्चों को 'माँ का बेटा' या 'माँ का चमचा' कहते हैं.आप बताये,क्या बड़ों से सलाह लेना गलत है..? जब माता पिता जीवन में अकेले रह जायें तो बच्चों द्वारा उनकी देखभाल करने को 'कर्तव्य' कहेंगे या 'चमचागिरी'..? मैं तो इन सब बातों को नज़रंदाज करते हुए बस बच्चों के साथ हर पल,हर घड़ी भावनात्मक रूप से जुड़ी रहतीं हूँ ताकि उन्हें पिता की कमी ना महसूस हो.उन्हें अच्छा इंसान बनने की,ओर down-to-earth रहने की प्रेरणा देती रहतीं हूँ.मेरी परवरिश का ही फल है,जो बच्चे आज मेरे साथ हैं.आज के समय में जहाँ बच्चे पड़ लिखकर, नौकरी मे बड़ा पद ओर बड़ा पेकेज पाने के लिए माता पिता को अकेला छोड़कर विदेशों का रूख कर रहें हैं,वहीं मेरे बच्चों ने मेरे साथ चुना.अपने ही देश में रहकर नौकरी करना उचित समझा क्योंकि,

"उन्हें मेरी फ़िक्र है...और मुझे फ़क़्र है,अपनी परवरिश पे "

मैं अपने अनुभव के आधार पर सभी माता पिता से यही कहना चाहूँगी कि,'बच्चों की परवरिश 'कोई ग़ुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं ,ये एक परीक्षा है माता पिता के धेर्य की,उनके प्रयासों की.जितनी आपकी इसमें भागीदारी (involvement) होगी ,उतने ही आपके प्रयास सफल व सार्थक होंगे.परवरिश के सफ़र में जब भी ऐसे गम्भीर मोड़ आयें ,जहाँ आपको लगे कि आपका बच्चा किसी दुविधा में है,या मानसिक तकलीफ़ से गुज़र रहा है ,तो बच्चों को कोसने या बुरा भला कहने की बजाय उनकी समस्याओं को धेर्यतापूर्वक सुने,उनका हल धूँडे.उन्हें अपना स्नेह व साथ दें,उनके समक्ष धेर्या ओर समर्पण का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करें ,जो भविष्य में उनके लिए प्रेरणा बन सके.

आप सब मेरे इस अनुभव से कितने सहमत हैं,अवश्य बतायें.हाँ यदि आप शिक्षक या शिक्षिका हैं,तो यही सलाह दूँगी कि कभी भी किसी विद्यार्थी के साथ इतने कठोर ना हों ,जिससे उसके अंदर से कुछ करने की चाह ही ख़त्म हो जाए.

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