90 के दशक के भांति भांति के पेन .…😊😊
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|   Aug 10, 2017
90 के दशक के भांति भांति के पेन .…😊😊

सुनहरा दौर शायद मेरे लिए तो कम से कम कल मैंने पेन के लिए अपने बेटे को ज़िद करते देखा तो याद आया हमारा भी यही हाल था तो सोचा कुछ लिखू : तो बात है ये लगभग सन 93-94 की, जब हम केवल दो तरह के ही पेन लेते थे : एक तो Ink वाले जो शायद ही किसी बच्चे को अच्छे लगे हो जिसकी पीछे सबसे बडी एक धारणा कि इससे बच्चो की handwriting बडी साफ हो जाती है .... handwriting का तो पता नही पर सफेद शर्ट पे नीले छींटे जरूर छप जाते थे .... ☺☺ और दूसरा जीवन में केवल एक ही अच्छा पेन था , न की आज कल की तरह ढेरो विकल्प उसका नाम था : 

Reynolds जी वही " Reynolds bold kuch jyada hi bold ",

और उस समय भी इसकी कीमत लगभग 5 रुपए थी हर पेपर में इसका हमारे साथ होना उतना ही जरूरी था जितना जीभ के नीचे " तुलसी का पत्ता " कुछ याद आया तुलसी के बारे में , नही ... , नही तो , आ जायेगा , जैसे - अगर कोई बच्चा तुलसी मुंह में रख कर नही लाया तो साथ के लोगो की पूरी जिम्मेदारी थी उसे उपलब्ध कराने की फिर चाहे स्कूल के पेड़ों में उसे ढूंढना पड़े या जिसके पास दो हो तो उससे उधार लेेंंना पड़े ।

थोड़े बहुत काम के लिए एक रंग बिरंगा pen भी आया

 जिसमे 4 रिफिल होते थे लाल, हरा , पीला और नीला जिसके बारे में हर बच्चे की एक ही मंशा कैसे भी ये चारों एक साथ चल जाये ...।

तभी एक और पेन ने जीवन मे दस्तक दी जिसका नाम था 

ROTOMAC 

 ROTOMAC likhte likhte love ho jaye 

इसकी खास बात ये थी कि ये लिखते समय Reynolds के पेन की तरह स्याही नही छोड़ता था और लिखावट में भी थोड़ा अलग था और सबसे बड़ी बात पेन के साथ एक रिफिल मुफ्त , और बच्चे ! वो तो मुफ्त के दीवाने । 

फिर लगभग सन 96 में एक और पेन की क्रांति आयी Jotter pen 

पर उसकी कीमत सुनते ही कितनो के उसे खरीदने के सपने धराशायी हो गए .... पर फिर एक सुकून की खबर ये आयी कि उसके ही रूप रंग और जाति का बाजार में एक सस्ता वर्ज़न आया जो बच्चो की पहुंच में भी था वही कीमत 5 रुपए ।  पर कहीं न कहीं इन सब पेन क्रांति के बीच मे एक और महँगा पेन था जो 3-4 सालों से अपनी चमक बरकरार रखे हुए था जिसे खरीदने का सपना बच्चे कभी देखते ही नही थे पर हाँ ! ये उम्मीद जरूर करते थे ... कि कोई घर का सदस्य या कोई रिश्तेदार पेन गिफ्ट में दे तो यही दे । जी हाँ ! वही हमारा .....pilot pen 

 और इसी के साथ ही एक और पेन जिसे लेने की तो बच्चे इस जन्म में सोच भी नही सकते थे , उसका नाम था Parker pen वो तो जिसके भी पास था तो समझो किसी खास रिशतेदार का गिफ्ट ही है 

parker pen

वही दूसरी और साधारण बच्चो के बीच अब जेटर के पेन की चमक फीकी सी पड़ने लगी थी , तो एक और पेन का आगमन हुआ जिसकी खास बात थी इसे लिखने के बाद उसकी लिखावट से खुशबू का आना , इसका नाम तो याद नही या शायद इसका नाम खुशबू वाला पेन ही था, इसने भी बच्चों के दिलो पर बहुत राज़ किया इसकी मुझे कोई फोटो तो नही मिली पर इसकी शक्ल सूरत लगभग Jeter के पेन जैसी ही थी टिक टोक वाली ... , पर इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम ये हुआ की अब बच्चे लिखने कम और सुंघने ज्यादा लगे थे ।

फिर सन 98 - 99 में एक नया पेन आया 

cello gripper 

जिसकी खास बात थी उसमें रबर वाली ग्रिप, जिसके कारण उसने बच्चो के दिलो में अपनी खास जगह बना ली और बच्चे भी अब उसकी grip का बहाना ले कर घर वालो से Reynolds के evrgreen पेन की जगह grip वाले पेन की डिमांड करने लगे ये कह कर : अरे माँ ! तुम क्या जानो ? कितने हाथ दुखते है इससे exam में लिखने में , grip वाले पेन में देखो , पकड़ने वाला भाग रबर का , कितना भी लिखो ।

पर धीरे धीरे इसकी भी खामियां बाहर आने लगी जैसे exam की पतले पेज वाली कॉपी में इससे लिखने से इसमें छेद होने लगे या अगर हल्का सा गलती से गहरी लाइन खींच दी गयी तो समझो पेज तो गया । 

शायद इसीलिए बाजार में इसकी अगली पीढ़ी आयी जिसकी नोक बिल्कुल भी बारीक नही थी , एक बराबर थी । जिसका नाम था 

cello gripper 2 

पर इसकी भी वही समस्या ! स्याही छोड़ने की .... इसीलिए कुछ बच्चों को ये भाया भी , और कुछ को नही भी , पर कुल मिला कर इसे उतनी प्रसिद्धि नही मिली जितनी इसकी पिछली पीढ़ी को मिली थी ।

अब इन्ही सबके बीच कुछ और पेन भी बाजार में आते गए और जाते गए पर 3-4 साल तक इन्होंने अपनी बादशाहत कायम रखी । फिर एक नई क्रांति आयी gel पेन के रूप में , 

इसकी खास बात थी इसका रंग , जो कि नीला न होकर समुंद्री हरा सा था पर फिर भी ये नीले रंग के रूप में ही माना जाता था , बच्चे इस पर दौड़ कर टूट पड़े , इसकी एक वजह उनके बजट का बढ़ जाना भी था ! महंगाई के साथ साथ उन्होंने भी थोडे महगे  pen खरीदने शुरू किए , लेकिन ! धीरे धीरे इसक��� नई परेशानियां भी सामने आती गयी ���ैसे इसकी लिखावट को गीले हाथो से छुओ तो , ये बिगड़ कर अजीब सी हो जाती , समझ ही न आता ,  लिखा क्या और दिखा क्या .....? और दूसरी ये की इतनी जल्दी ये खत्म हो जाता कि समझो theory वाले exam में तो एक पेन कम पड़ जाता । फिर इतना महंगा पेन लेने का मतलब भी क्या ? अब बच्चे दूसरे विकल्प ढूंढने लगे जिसमे आया एक Linc वाला पारदर्शी पेन , 

 जिसकी लिखावट बिल्कुल gel pen जैसी , बच्चो का अब एक ही नारा हो गया " जब कम दाम में मिले , तो कोई ये क्यो ले, वो न ले " । और दूसरी उसकी खासियत , जितने में एक नया रिफिल आता उतने में तो ये पेन ही आ जाता । बस देखने में थोड़ा down class लगता था पर बच्चों को इससे क्या जब " अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता " ।

बस इसके बाद तो इन्ही सब पेन में से कोई एक दो पेन ले कर ग्रेजुएशन हासिल कर ली, तब तक सारे बेवजह के craze खत्म हो चुके थे और शायद बचपन भी !  मेरे बचपन के तो बस यही pen मुझे याद है आपको अगर कुछ अपना सा लगा तो बताये जरूर ।

धन्यवाद !

Neha Bhardwaj 

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