बचपन वाली होली की यादें....😊
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|   Mar 07, 2017
बचपन वाली होली की यादें....😊

होली लगभग आने कॊ है , पर अब होली कुछ फीकी सी लगती है । होली तो बचपन मॆ होती थी , जिसकी तैयारियों की जानकारी तो होली के एक हफ्ते पहले ही से तब पता चलती थी जब गली के बाहर कोने पर खड़े बच्चे आते जाते सब पर पानी डालते थे ।

वैसे छुट्टी तो शायद होली पर 2-3 दिन की ही होती थी और हमारी होली तो स्कूल से रंग बिरंगे कपड़े कर के लाने से शुरू होती थी । और घर आकर हमारा काम भी तभी से शुरू होता था , जब मम्मी दादी के साथ मिलकर होली से दो दिन पहले गुँजिया नमकपारे और शक्कर पारे बनाती थी और हम गर्म गर्म पर ही टूट पड़ते थे ।

फ़िर आती थी छोटी होली जब लोग रात कॊ होलिका दहन कर रहे होते थे हम अगली सुबह फाग की तैयारी कर रहे होते थे । पिचकारी और वो भी प्लास्टिक वाली ! रंग बिरंगी.....। घर मॆ कोई अगर स्टील वाली लाकर भी देता था , तो खुशी से ज्यादा तो उन पर गुस्सा आता था कैसी पिचकारी है ? बस एक बार ला दी जो 10 साल चले । कंजूस ! ये भी नी सोचा की हम इससे गुब्बारे कैसे भरेंगे ? पूछो तो कह दिया : पानी की टंकी मॆ लगा के भर लो जो कभी भरे ही नहीँ जाते थे , टंकी तेज चलाओ तो वो छूट कर नीचे गिर जाते हल्की चलाओ तो भरते ही नहीँ थे ।कितना काम था ? गुब्बारे भर कर एक बाल्टी मॆ रखना , जिसमे से सुबह कॊ कुछ गुब्बारे तो छोटे हो जाते थे और कुछ फूट भी जाते थे , लगभग 1/3 ही बचते थे सही सलामत । एक बाल्टी मॆ रंग घोल कर तैयार करना । ताकि ! सुबह हो तो उठते ही शुरू हो जाये देर ना हो जाये कहीँ ? सुबह कॊ तेल मालिश जो करनी होती थी जल्दी रंग छुडाने के लिये । 

उन्ही रंगीन हाथो से खाना। मम्मी का बनाया जल्जीरा जो स्पेशल मीठे वाला उसमें बूंदी डाल के पीना ।

और लोगों कॊ छज्जे से गुब्बारे मारना कभी - कभी निशाना चूकना और वो गुब्बारा हमें ही आकर लगना और फ़िर मम्मी के साथ पड़ोस मॆ जाना जहाँ सब औरतें एक दूसरे कॊ गुलाल लगाती थी , अपने कुछ लोक गीत टाइप के गाती और नाचती भी थी । वही अपने घर वाला नाश्ता सबके घर खाना एक जैसा ही तो था वहीं गुँजिया वहीं शक्कर पारे बस स्वाद अलग होता था ।

12 बजे के बाद रंग उतारने का कार्यक्रम , नींबू के साथ । कुछ बच्चो का रंग तो ऐसा पक्का होता था कि शक होता था अगले दिन स्कूल मॆ नहा के आये भी या नही । 

तो चले ! वापस उन्ही गलियों मॆ , उन्ही छज्जों पर होली मनाने । हाँ समय ज़रूर बदल गय़ा है जैसे : बचपन वाली गलियां और छज्जे अब ससुराल के हो गये और खुद का बचपन अब बेटे का । उसे भी तो दिखाने है होली के रंग , बचपन वाले । नहीँ तो ! उसके पास क्या यादें होगी बचपन की ? बड़े होकर याद करने के लिये ।

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