विदाई....! आत्मग्लानि एक पिता की !
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|   Mar 05, 2017
विदाई....! आत्मग्लानि एक पिता की !

गुप्ता जी सुबह से 3 कप चाय पी चुके और कम से कम दस बार रोहित कॊ डाँट चुके है जल्दी से साक्षी के घर जाने के लिये ! दरअसल सुबह से ही बड़े बेचैन है । क्योंकि ! आज उनकी बेटी साक्षी शादी के बाद पहली बार घर आने वाली है पग फेरे की रस्म ले लिये ।

वैसे गुप्ता जी आज जैसे लग रहे है न ! कल उनकी स्थिति इसके बिल्कुल उलट थी , बेटी की शादी के बाद कितनी ही देर तक पीछे की कुर्सियों मॆ छिपे हुए सिसकते रहे , क्योंकि !... मर्द रोते नहीँ ना ! हमेशा से यही सोचते थे कि बेटी की शादी के बाद पैर फैला कर निश्चिंत होकर सोउँगा । दरअसल पिछले छः महीने से जब से साक्षी का रिश्ता पक्का हुआ था , एक पल का भी कहाँ चैन आ पाया था । रिश्ता ही क्यों ?... बल्कि !... तब से जब से उन्हे ये महसूस हुआ कि अब उनकी बेटी भी बड़ी हो गयी है और उन्हे उसकी शादी जल्द ही करनी है और उसके लिये लड़का देखने का समय आ गय़ा है । पहले तो बेचारे इसी चिंता मॆ रहे कि कोई अच्छा लड़का मिल जाये , बिना दहेज की माँग वाला ! आज के समय मॆ अच्छा लड़का ! और वो भी बिना दहेज..... । ये तो एक सपना सा ही है , पर ख़ुशकिस्मती से उन्हे ऐसा लड़का मिल भी गय़ा लेकिन समाज कॊ दिखाने का जो ये चलन है उसके हिसाब का खर्च भी तो चहिये जिसमे किसी कॊ मिलना मिलाना कुछ नहीँ ! बस पैसा बर्बाद करना है.... फ़िर उसके लिये चाहे रिश्तेदारों से माँगना पड़े , जो पहले ही से इस बात से सहमें से है ये सोच कर "अरे ! उनकी बेटी तो बड़ी हो गयी है शादी के लिये कोई मदद ना माँग ले , इसलिये उनसे पहले ही दूरी बना लो ! मेल तो बेटे वालो से मेल रखो क्यों कि उनके बेटे की शादी मॆ रिश्तेदारों के लिये कुछ तो आयेगा ही "।

या.... फ़िर बैंक से कर्ज लेना पड़े जिसे चुकाने के लिये शायद बची हुई उम्र भी कम पड़ जाये ।

कोई उपाय नहीँ तो घर कॊ गिरवी रख कर पैसे लो...। मतलब दिखावे के लिये सब कुछ करो , चाहे परिणाम जो भी हो ।

पैसों का जुगाड़ होने के बाद उसका सही इस्तेमाल करने की चिंता मॆ गुप्ता जी और उनकी धर्मपत्नी पिछले छः महीनों से रात कॊ सो भी नहीँ पा रहे थे । गुप्ता जी इन मसलों पर अधिकतर खामोश ही रहते थे , पर उनकी पत्नी सोचती थी कि शायद कुछ बात करे तो चिंता कम हो पर कभी कभी बात होती भी थी और कभी कभी गुप्ता जी T V चला कर उसे देखने का बहाना करते थे भले ही वो आराम कुर्सी पर बैठ कर शादी की उलझन मॆ घंटों सिगरटे सुलगा रहे हो ।

 शादी का दिन भी आ ही गया शादी मॆ इतना खर्च करने वाले गुप्ता जी ने अपने लिये शादी मॆ पहनने के लिये अपना पुराना सूट ही चुना , क्योंकि ! उनके हिसाब से उनके कपड़े कौन देखेगा ? और भी बहुत कुछ है देखने कॊ । घर मॆ तरह तरह के पकवान बने है पर गुप्ता जी तो कुछ खा नहीँ सकते । सुबह से व्रत है... कन्यादान जो करना है.... डायबीटीज के मरीज भी है और अपनी दवाई लेना तो भूल ही गये । साक्षी ने तो लेकिन अलार्म लगाया हुआ है ना पापा कॊ एक गिलास दूध और दो केले के साथ इसी शर्त पर दवाई देकर आयीं है कि 10मिनट मॆ वो खा लेंगे ।

शाम होने लगी और गुप्ता जी की घबराहट बढ़ रही थी रह रह कर माथे पर फरवरी के महीने मॆ भी पसीना आ रहा था । बारात द्वार पर आ चुकी थी और शादी स्थल लाइट्स से जगमगा रहा था जैसे जैसे बाजे की आवाज तेज आनी शुरू हुई घबराहट भी बढ़नी शुरू हो गयी जैसे जीवन का ये पहला और आखिरी इम्तिहान हो और अगर कोई कमी रह गयी तो उसकी भरपायी मुश्किल है ।

आखिर कार बारात आ गयी मेहमानों की संख्या देख कर ही उनके हाथ पाँव फूल गये , धीरे से अपने घर के लोगों और रिश्तेदारों के बीच गये और निवेदन कर के आये कृपया ! " बारात के बाद खाने जाये इज्जत का सवाल है बाराती कुछ ज्यादा से जान पड़ते है आप लोग तो घर के है समझ सकते है " ।

  घर के लोग तो ज़रूर समझ गये , पर रिश्तेदार ! वो कहाँ समझने वाले थे उनका तो एक ही उसूल "लिफाफा दिया है तो खायेगे भी बारात के बाद ख़त्म हो गया " तो !

फ़िर भी खाने पीने का कार्यक्रम अच्छी तरह हो गय़ा , अब बारी आयी कन्यादान की । सही मायने मॆ तो गुप्ता जी और उनकी पत्नी अब समझ पा रहे थे की बेटी का दान भी तो करना है , अभी तक तो बस बाकी तैयारियाँ कर रहे थे एक बोझ की तरह ।

इसीलिये दोनो के आँसू नहीँ रुक रहे थे जिस बेटी कॊ बचपन से खुद से दूर नहीँ होने दिया , यहाँ तक की ! दूर रहने के डर से उसे पढ़ने के लिये दूसरी जगह भी नहीँ भेजा उसे एक पल मॆ कैसे सौंप दे अनजान के हाथो मॆ ! जिन्हे केवल कुछ महीनों पहले से ही तो जानते है , कैसे ? रह पायेंगे... उसके हाथ की बनी सुबह की चाय के बिना और उसकी सूरत देखे बिना । कैसे ? वो बेटी ! अपनी इच्छायें और ख्वाहिशें उन अजनबियों कॊ बता पायेगी या वो लोग उसे समझ पायेगे ।

इसी कशमश मॆ उन्होने बहते हुए आँसुओं की धारा की साक्षी अपनी कन्या का दान भी कर दिया ।

और अब ! सबसे मुश्किल घड़ी । जो आने वाली थी इसीलिये वो दूर सबसे पीछे वाली कुर्सी पर छिप कर बैठ गये रोने के लिये । शायद ! एक पिता कॊ एक आत्मग्लानि भी होती है । कि ! क्या ? वो इतना मजबूर है..... जो अपनी बेटी कॊ साथ नहीँ रख सकता और उसके लिये उसके रहने के लिये उसे नया घर ढ़ूंढ़ना पड़ा । गुप्ता जी भी इसी आत्म ग्लानि मॆ थे जब तक उन्हे आवाज लगायी गयी । क्योंकि ! घर के लोग सब जगह गुप्ता जी कॊ ढूँढ रहे थे और वो एक कॊने अपने आँसुओं कॊ छुपाये बैठे थे ।

अब विदाई की घड़ी आ चुकी थी और साक्षी अपने पापा से एक बार गले मिलना चाहती थी पर गुप्ता जी ने इस डर से कहीं गले लगने से उनका नियंत्रण ना खो जाये । साक्षी के सर पर हाथ रख कर वहाँ से जैसे ही मुड़ने लगे साक्षी ने उन्हे जोर से खींच लिया और वहीं हुआ जिसका गुप्ता जी कॊ डर था । वो खुद कॊ रोक ही नहीँ पाये और दोनो ऐसे ही बहुत देर तक एक दूसरे के आँसू पोंछते रहे और रोते रहे...। जब तक साक्षी के ससुर ने गुप्ता जी कॊ आकर वही लाइन नहीँ कही जो हर विदाई मॆ कहीं जाती है । " आप चिंता ना करे हम बहू नहीँ बेटी की तरह रखेंगे साक्षी कॊ "। पर अब ! विदा तो करना ही था और साक्षी विदा हो गयी ।

घर पहुँच कर सब रिश्तेदार लगभग जाने की तैयारी करने लगे और साक्षी की मम्मी उन्हे भेजने की कपड़े , मिठाई और गिफ्ट वगर्ह के साथ ।

वहीं गुप्ता जी के पास तो जैसे आज कोई काम ही नहीँ था बेटी की विदाई क्या हुई सब ख़त्म ! मन से भी और धन से भी ! शाम तक एक एक करके सभी रिश्तेदार जा चुके थे और उनके साथ जा चुकी थी घर की रौनक और चहल पहल भी ।

अब तो घर जैसे भाँय ! भाँय ! करके खाने कॊ आ रहा है घर मॆ बाकी के लोग भी तो है बेटा रोहित ! और छोटी बेटी अनु ! पर आँखें तो बस साक्षी कॊ ही ढूँढ रही है । रात होते होते सारी भावनायें फ़िर से आँखो मॆ आ गयी । पहले सोचा ! बेटी कॊ फोन करे पर ये सोच कर रह गये कि वो कहीँ नये घर मॆ रीति रिवाजों मॆ लगी होगी और बात करने की स्थिति मॆ भी होगी या नहीँ । और फ़िर अगर उसे एहसास भी हो गया अपने पापा की हालत का तो बेवजह परेशान हो जायेगी ।

इसी उलझन मॆ रात के खाने का समय हो गया लेकिन ! अब भूख किसे ? बड़ी मुश्किल से दो रोटी खा पाये वो भी साक्षी कॊ फोन कर के बताने के डर से ! जो उनकी पत्नी ने उन्हे दिया । रात कॊ बिस्तर पर लेट कर जहाँ थकान के मारे नींद आँखों मॆ भरी थी पर वहीं बेटी की याद उन्हे सोने नहीँ दे रही थी । पूरी रात गुप्ता जी और उनकी पत्नी ने रोते रोते ही बिता दी और आसमान मॆ ज़रा सा चाँदना होते ही , फट से उठ बैठे ! कि आज बेटी घर आयेगी जिसे कल ही तो विदा किया था । उन्हे लग रहा था जैसे सालो बीत गये हो उसकी शक्ल देखे भी ।

रोहित साक्षी कॊ लेकर आ गया था ये सुनते ही गुप्ता जी गेट के पास पहुँच गये और बस इतना ही पूछ पाये " कैसी है ? बेटी ! ससुराल मॆ कोई परेशानी तो नहीँ हुई ! फ़िर दोनो फफक फफक कर रो पड़े । बहुत कोशिश की अपने आँसू रोकने की पर अब ये मुमकिन नहीँ था ।

इन सब मॆ कुछ भी तो नया नहीँ हुआ गुप्ता जी के साथ । ऐसा तो , शायद हर बेटी के पिता के साथ होता है पर उन माँ बाप पर क्या बीत ती होगी.....जो इन सबके बाद भी अपनी बेटी कॊ खुश ना देख पाये , या उसे दहेज जैसी चीजो के लिये रोता पिटता हुआ देखते हो । पहले मुझे लगता था कि शायद ! शादी अगर सबसे मुश्किल लड़की के लिये होती है पर अब लगता है कितनी गलत थी मै .....? सबसे मुश्किल तो ये उन माँ बाप के लिये है , जिनकी बेटी भी गयी ! घर की दौलत भी गयी ,और शायद हिस्से मॆ कुछ आया तो वो है ! कर्ज जो उन्होने अपनी बेटी की शादी के लिये लिआ है और वो दुख , वो चिंता , वो तड़प , वो एहसास जिसे कोई नहीँ समझ सकता । क्यों कि ! अगर कोई कहे मुझसे कहे अपने बेटे कॊ एक दिन के लिये खुद से दूर करने के लिये तो मुझ पर क्या बीतेगी , और वो तो क्या क्या करते है ?

Hats off !!!! To all parents who have daughter .

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