हौसलों की उड़ान
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|   Mar 15, 2017
हौसलों की उड़ान

कुछ वर्ष पहले की बात है जब हम जम्मू में रहते थे।उस समय ना तो वहाँ मॉल कल्चर था, न सुपर मार्केट्स और ना ही ऑनलाइन शॉपिंग की सुविधा।लोकल किराना शॉप या जनरल स्टोर से ही काम चला करता था।घर के पास ही एक दुकान थी जहाँ आवश्यकता का सारा सामान मिल जाता था, कहने पर होम डिलीवरी भी हो जाती थी।

         उस दिन भी मैंने दुकान पर फ़ोन किया कुछ सामान के लिए।कुछ समय बाद दरवाज़े की घंटी बजी।मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा कि दस ग्यारह वर्ष की आयु का एक बच्चा सामान लिए खड़ा है।उसके शरीर पर पुराने से कपड़े और पाँव में घिसी हुई रबड़ की चप्पल थी।उसकी दशा उसकी स्तिथि को बक़ूबी दर्शा रही थी लेकिन उसका चेहरा कुछ और ही बता रहा था।उसकी मन जीत लेने वाली मुस्कान और आत्मविश्वास से भरी उसकी चमकती हुई आँखों ने मुझे सहसा ही प्रभावित कर दिया था।मैंने उससे नाम पूछा और बात करनी चाही।उसने बताया कि उसका नाम गंगा है।उसके पिता किसी बीमारी के चलते काम नहीं कर सकते थे, माँ घरों में काम करती और परिवार का पेट पालती।एक बड़ी बहन थी जो घर पर ही कपड़ें सिलने का काम करती थी।गंगा दिन में स्कूल जाने से पहले और शाम को दुकान पर काम करता था।मैंने कहा "अरे बाप रे तुम इतना सारा काम करते हो, थक जाते होगे"।"नहीं आंटी,मैं थकता नहीं।अभी तो दीदी की शादी करनी है, एक अच्छा सा घर बनाना है पक्का वाला और बाबा का अच्छा इलाज भी करवाना है।देखना आँटी एक दिन मैं बड़ा आदमी ज़रूर बनूँगा", भले ही उसने ये कहा मगर मेरे लिए तो वह बड़ा आदमी बन चुका था, अपने बड़े बड़े हौसलों से अपनी अच्छी सोच से, और अपनी आशा भरी बातों से।

          मुझे आज भी गंगा की वह रोशन आँखें याद हैं जिनमें सपने थे ,आशाएँ थीं और कमाल का हौसला था।उसकी वह स्वच्छन्द मुस्कान उसके इरादों और विश्वास की साक्षी थी।

         आज वह बच्चा बड़ा हो चुका होगा और निश्चय ही उसने अपने सपने पूरे किये होंगे ऐसा मेरा विश्वास है।

          मेरी ये कविता गंगा के नाम-

                 जी हाँ........ ज़रूर

कुछ रूठ सा गया है, शायद मेरा मुक़द्दर, ज़िद्दी हैं हम भी उसको मनाएंगे हम ज़रूर।

अरमान है परवाज़ का और पंख नहीं हैं, पर हौसलों से उड़ के दिखाएंगे हम ज़रूर।

राहों में ठोकरें भी हैं काँटे भी संग भी, मंज़िल को फिर भी एक दिन पाएंगे हम ज़रूर।

हो आसमां बुलंद या हस्ती हो मेरी पस्त, दामन में भर के तारों को लाएंगे हम ज़रूर।

जो ख्वाब हमें रातों को सोने नहीं देते, सच करके एक रोज़ दिखाएंगे हम ज़रूर।

जिस शहर ने रुस्वा किया था एक दिन वहीं, शोहरत कमा के लौट के जाएंगे हम ज़रूर।

जब तक रवां क़लम है ख़यालात हैं जवां, बातें हमारे दिल की सुनाएंगे हम ज़रूर

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