बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर उस पर विश्वास मत जताओ. 
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|   Jul 24, 2017
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पर उस पर विश्वास मत जताओ. 

 सरकार  का नारा' बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' सुन खुशी से बांछे खिल जाती है ना,आजकल तो हर जगह लड़की की सुरक्षा,तरक्की की बात होती है।हालात बदले हैं पर क्या मानसिकता बदली है ।आप कन्या भ्रूण हत्या रोकने में कामयाब हो सकते हो पर वही कन्या जब बड़ी होकर घर के बाहर कदम रखेगी तब उसका पीछा करने वाले शोहदों से कौन उसे बचायेगा।आप उसे पढ़ने के लिए अच्छे अवसर दिलवा देंगे पर जब वो नौकरी करने बाहर निकलेगी तब उसकी काबलियत पर सवालिया निशान लगाने वालों को कैसे रोका जाएगा।

दोगलापन इसी बात में है कि पुरूष क्रिकेट टीम का कोई भी मैच हो,ऐसा लगता है मानो जान पर ही बन गई है।विज्ञापन जगत में जोश दिलाने वाले ऐड्स, डिजिटल विज्ञापन,अखबार में ऐसे स्लोगन की बस लगे कि यही है जो कुछ है इसके बिना कुछ भी नहीं,आपको याद तो होगा ही "मौका मौक़ा" वाला विज्ञापन पर महिला क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप फाइनल में खेल रही है और उसका कोई प्रचार नही,कोइ जोश नही क्यों ????? यह लड़किया कम जान लगाती हैं क्या?? 

सिर्फ कहने  से की "म्हारी छोरियां छोरो से कम है क्या",लड़कियों को वो स्थान नही मिलेगा।आज के मैच में भी लोग पलकार्ड ले कर बैठे थे "support women cricket".यह तरीका ही गलत है, support माने सहारा और सहारे की तो दरकार है नही।इन्हें तो वो भरोसा विश्वास चाहिए था जो शायद हिंदुस्तान इन बेटियों को नही दे पाया। किसी ऑनलाइन वेबसाइट पर खबर थी कि हरमनप्रीत कौर को कहा गया कि तुम भज्जी नही हो कि तुम्हे सरकारी नौकरी दी जाए ।यह किसी खिलाड़ी के लिए गर्व की बात तो है नही पर संदर्भ एक महिला का है तो सब ठीक है।क्यों हरभजन की उपलब्धि मान्य है पर हरमनप्रीत की नही।

 

आज का वर्ल्ड कप फाइनल बेशक हम हार गए हैं पर मेरे लिए भारतीय महिला क्रिकेट टीम  विजेता है क्योंकि जहाँ पुरुष क्रिकेट में पैसा,एंडोर्समेंट वाहवाही है वहीं महिला टीम को तो पहले अपने अस्तित्व के लिए ही लड़ना होगा।जब अस्तित्व को ही सिरे से नकार दिया जाता है तो बाकी चीजें गौण हो जाती हैं।

"बेबस नहीं हूं,लाचार नहीं हूं,नही हूँ हालात की मारी "यूँ सहारा न दो , मुझे की...मैं चल भी न पाऊंगी "थोडा सा विश्वास तो रखो,सात समुद्र भी  पार कर  जाऊँगी।

----दीपिका शर्मा नारायण 

 

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