बदलते बारिश के मायने..!! (कागज़ की कश्ती बारिश का पानी)
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|   Jul 02, 2017
बदलते बारिश के मायने..!! (कागज़ की कश्ती बारिश का पानी)

एक वक्त था जब मैं बारिश होने का बेसब्री से इंतेज़ार करती थी....ज्योही बादल घिरते मैं अपनी फेवरेट ड्रेस पहन कर छत पर भीगने , और नाचने भाग जाती....आज भी याद है वो उन्मुक्त बचपन और बारिश की बूंदों का उत्साह....दिल मे कुछ अजीब सी खुशी दौड़ जाती थी ....कभी कभी तो पानी बरसने का मौसम देखकर मैं बाथरूम में कपड़े रख पूरी तैयारी के साथ नहाने का प्लान बनाती थी कि बारिश में भीग के कपड़े लेने घर के अंदर जाउंगी तो माँ गुस्सा होंगी...मां मना करती जाती पर में हाथ हिलाती  ..भाग जाती..! फिर धीरे धीरे समय बीतता गया जब मैं 15 16 वर्ष की हुई तो भी बारिश के लिए वही दीवानगी थी मन मे...! मगर अब थोड़ा डर लगता कि मां डाँटेगी 'छत पर मत जाना ...कोई देख लेगा...लोग क्या कहेंगे बेटी..!' 

मैं अपने शरीर मे होते बदलावों को समझने लगी थी इसलिए अभी छत पर न जाती ..दुनिया की नज़रों से छिप के आंगन या सीढ़ी पे ही नहाती भीगती पानी मे तन व मन के साथ अंतरात्मा को भी तृप्त करती ..! 

फिर और समय बीता...मैं बड़ी हो गयी अब मैं बारिश देखकर मचल कर न भागती.... अब घर के सभी लोगों के सो जाने का इंतजार करती कि,कब लोगों की आंख लगे और मैं सबसे छुपकर बारिश की बूंदों से अपने तन मन को भिगो सकु और अपने मन को प्रसन्नता की लहर से टकराकर मुझे क्षण के लिए ही सही परंतु अपने विगत बचपन को दोबारा जी सकूं।

 समय के बढ़ते क्रम में मुझे अपने घर की चार दीवारों को छोड़ सात फेरों के बंधन में बंध कर अपने सपनों के राजकुमार के साथ उसके घर आंगन में प्रवेश करना था इस प्रवेश के साथ मैंने जीवन के कई पड़ावों में प्रवेश किया..

 अब मैं एक कुल की मर्यादा एक घर की लक्ष्मी और किसी के घर की संस्कारों की दस्तक थी किंतु बारिश तो हर बार की तरह इस बार भी आनी थी और वह आयी किंतु इस बार में मर्यादा की डेहरी को लांघ न पाई ...!

इस बार कमरे की बालकनी से बाहर टपकती बूंदों का शोर मेरे तन मन को छलनी कर रहा था.. क्योंकि एक बहू होकर कैसे मैं उन बूंदों के जल से अपनी बचपन को जीने व ताज़ा करने की प्यास बुझा सकती थी ??भला क्या आज आँगन में खड़ी होकर भीग कर हथेलियों में भरने का बचपना कर सकती हूं मैं ?? शायद बिलकुल भी नही..! कोई देखेगा तो क्या कहेगा!इसको तो कोई शर्म हया नही है,भला कोई बहू, वो भी नई नई ऐसे हरकतें करती है क्या?उस दिन बहुत रोई मैं... कितनी मजबूर हो गयी हूं मैं.. दुनिया, समाज, लोग क्या कहेंगे ..ने हर चीज़ की सीमाएं सुनिश्चित कर रखी हैं।

...खैर अब तो बच्चों को खुशी से बारिश में झूमता नाचता कूदता देखती हूँ तो खुश हो लेती हूँ कि, चलो अभी इनका बचपन जिंदा है, और ईश्वर करे हमेशा रहे। जैसे हम सबको अपना बचपन याद है।और हमेशा रहेगा। और खुद बारिश के आने पर कभी खिड़की से हाथ फैला के हाथ पर बूंदे गिरा कर ही खुश हो लेती हूं...!!

और इतने वर्षों बाद अब जब कोई टोकने वाला नही है,मैं चाहूं तो आराम से बारिश का लुत्फ उठाऊं..पर जैसे अब मन के ख्याल पर आज की जरूरतें हावी हो गयी हैं...मै चाह कर भी अपने मन का नही कर पाती...लगता है,बच्चे क्या सोचेंगे! एक दिन मैंने सोचा बारिश के मौसम में जब आफिस से लौटूंगी तो रास्ते मे लौटते वक्त खूब भीग लूँगी किसी को आपत्ति भी नही होगी।...पर अगर आफिस से लौटते वक़्त बारिश हो भी जाती ���ै तो, भीगने का मन करता है,पर डर होता है,भीग जाउंगी,बीमार हो गयी तो बेवजह छुट्टी लेनी पड़ेगी..फिर बच्चों की देखभाल ,घर के हज़ारों काम सब कुछ बेकार हो जाएगा..इससे बेहतर खुद की इच्छाओं को मन से झटक देना ही होगा..!

उफ्फ...कितने मजबूर होते है,हम बड़े..! अब समझ आता है कि सच मे बचपन बेहद कीमती होता है,किसी चीज़ की फिक्र नही ..अपने आप मे मस्त।अब जगजीत सिंह जी की वो ग़ज़ल याद आती है,और उसके मायने भी समझ आते हैं....

ये दौलत भी ले लो,ये शोहरत भी ले लो.. भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी... मगर मुझको लौट दो बचपन का सावन.. वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी..!!

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कविता जयन्त श्रीवास्तव

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