"तू तो इस घर की लक्ष्मी है...."
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|   Apr 13, 2017
"तू तो इस घर की लक्ष्मी है...."

प्रेशर कुकर की सीटी की आवाज से मेरी नींद टूटी ...हड़बड़ाकर मैंने घड़ी की ओर देखा, हे भगवान! 7:10 हो चुके हैं और यह क्या अभी तक मैं सो ही रही हूं अब क्या होगा सोच कर मैंने बगल सोए पतिदेव की ओर देखा और भागकर बाथरूम में घुस गई लगभग 20 मिनट बाद में जैसे-तैसे तैयार हो कर अपने कमरे से निकल कर सीढ़ियां उतरते नीचे स्थित किचन की ओर बढ़ी ... कांपते हुए मन के साथ चोर नजरों से ,अपराधी की भांति, खड़ी हो गई जैसे' जाने कितना बड़ा अपराध हो गया है मुझसे..... मैंने सशंकित होकर सास की भाव भंगिमा को देखा और ज्यो ही आटे की परात को हाथ लगाना चाहा, तो उन्होंने बोला- रहने दो! अब तो सब हो ही चुका है ...जाओ सोओ जाकर! "जो आदत मां-बाप डालेंगे वही तो ससुराल में भी पड़ी रहेगी "और यह कहकर तेज कदमों से चाय के प्याले लेकर ससुरजी को देने चली गई, और मैं वही अपराधिनी की भांति खड़ी चुपचाप डबडबाई आंखों से अपने आप को धिक्कार रही थी कि क्यों आंख लग गई मेरी इतना सुनने से तो अच्छा था कि सुबह ही उठ जाती है और तभी देखा कि वह अपने से बिना मेरी मदद लिए स्वयं सारे कार्य फुर्ती से करने लगी जो कि कभी मेरे समय पर उठने पर बिस्तर से बैठे बजे चाय पानी नाश्ता चाहती थी और उम्मीद करती थी और सोचती थी कि सभी काम मै ही करूं आज वह मुझे संभवत: दंड देने की अति आवश्यक कार्यवाही करते हुए मुझे और अधिक ग्लानि से भरने के लिए वह ऐसा कर रही थी ताकि मैं खड़ी-खड़ी वहीं गड़ती जाऊं ....वही किचन की फर्श पर अपने पैर के नाखून से भविष्य का दर्द कुरेदते हुए मैं सोचने लगी अपने अतीत के 7 वर्ष पूर्व के विवाह के दूसरे ही दिन को... 

जब मैं इस घर में पहली बार बहू बनकर आई थी आज भी याद है मुझे वह दिन जब मैं विशाल के साथ सात फेरों के बंधन में बंध कर आई थी अपने घर की चौखट पर इन्हीं चार दिवारी के बीच कभी मुझे तमाम रस्मों रिवाजों के साथ घर की लक्ष्मी के रूप में प्रवेश कराया गया था उस वक्त यूं लगता था जैसे मेरी दुनिया बहुत ही भरी पूरी संपूर्ण और संपन्न है... दुनिया के सारे सुख खुशियां सब कुछ मेरे कदमों के नीचे हैं ,

प्रेम करने वाला पति है जो पति कम मित्र ज्यादा है और मां के जैसी सास है जो बहुत ही प्रेम से बोलने और प्रेम रखने वाली है उसकी डांट भी मुझे शहद सी मीठी ही लगती थी किंतु धीरे-धीरे जैसे जैसे समय बीतता गया सुखों के पीछे का छलावा और हर कड़वा सच मेरे सामने आता गया ....   अब हर कार्य में मेरी उपेक्षा होती थी मुझ में खोट निकाला जाता था पति और सास के व्यंग उलाहनों और तानों के रत्न अब मेरी सुंदर जिंदगी की तस्वीर में मढ़े जाने लगे  और  मेरी जिंदगी  शनै: शनै:  नारकीय होने लगी .... एक दिन रोज की भांति  जब मेरे बनाए भोजन में  अन्नपूर्णा का स्वाद साथ छोड़ने लगा था,  क्योंकि अब मैं  पति के लिए भोजन तैयार करने वाली पत्नी कम और पूरे परिवार के लिए सुबह दोपहर और शाम के खाने नाश्ते  का प्रबंध करने वाली  एक नौकरानी रह गई थी  इसलिए संभवत: मेरे हाथों का स्वाद भी मेरे मन की प्रसन्नता के साथ कहीं उड़ गया था  और तभी  मुझे अपनी ननद के इस व्यंग का सामना करना पड़ा  की दाल में कहीं इतना ज्यादा घी डालकर छोंक लगाया जाता है  क्या यह भी आप अपने मायके से लेकर आई हैं," ... यह सुनकर सहसा मुझे लगा कि अपने मन से  दाल में एक या दो चम्मच घी भी मैं नहीं डाल सकती  .....

ऐसे ही जाने कितनी कहानियां जाने कितनी बातें जो मेरे ही नहीं ,हर गृह स्वामिनी के मन में होती है जो आए दिन इन समस्याओं से अवगत होती है रोज झेलती है ,रोज एक नई प्रत्यंचा पर रखकर उसको परखा जाता है कि वह कितनी अच्छी ग्रहणी कितनी अच्छी पत्नी ,कितनी अच्छी बहू कितनी अच्छी मां, है  इन कसौटियों पर कसे जाते जाते एक दिन मेरा मन इतना व्यथित हो गया  कि मैंने अपने पति से कहा," काश आपका कोई छोटा भाई होता  और उसकी कोई पत्नी होती है  जब आपकी मां दूसरी बहू के साथ तालमेल ना बैठा पाती "तब आप क्या कहते ? यह सुनकर मेरी सास ने तुरंत इस बात का प्रतिकार किया कि कम से कम  तब  दूसरी बहू की उम्मीद तो होती! " आज  अकेली तुम्हें तो ना झेलना पड़ता  तुम जो भी घास-फूस गोबर बनाकर दे दो वही तो न खाना पड़ता  और यह सुनकर मैं लगभग सकते में आ गई  कि भाग्य की विडंबना कितनी अजीब होती है कल तक  जो इस घर की  लक्ष्मी थी  आज  वह  इस घर पर एक कलंक है  कल जो इस घर की अन्नपूर्णा थी  आज  वह घास-फूस एवं गोबर देती है  कल जो इस घर के लिए चंद्रमा के समान थी, आज  उसकी परछाई से भी लोग नफरत करने लगे हैं,  क्यों?  क्या इसलिए कि अब वह उनके हाथ की कठपुतली नहीं रही क्या वह अभी तक इस खानदान को चिराग नही दे पाई इसलिये? खैर  मैंने अपने हालातों से समझौता कर लिया और इसे ही अपनी नियति मानकर  अपने हालातों के साथ  स्वयम को खुश करने की  कोशिश करने लगी, इसी तरह जिंदगी बीतने लगी

 और मैं इन्ही हालातों में खुश रहने की कोशिश करने लगी एक दिन मेरे ससुर को अचानक पेट में दर्द था और मैं घर में अकेली थी सास बगल के घर में पूजा में गई हुई थी मैं घबरा गयी,  कि अब क्या होगा ! मैं कैसे इन्हें अस्पताल लेकर जाऊंगी और मैं अकेली इन्हें  कैसे संभाल पाऊँगी ,सालों से घर से बाहर अकेली नही गयी थी ,मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था  कि तभी  मैंने  अपनी सहेली के पास फोन लगाया  उसे बुलाया  और किसी तरह  ससुर जी को रिक्शे पर बैठा कर अस्पताल ले गई भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उस दिन ससुर जी को बचाने में मैं कामयाब हो गई  और  किसी तरह  उनकी  जिंदगी बच गई,फिर अपने पति को फोन कर तुरंत बुलाया।वो अस्पताल आये और,ये सब देखकर खुश हुए तभी मुझे न देखकर सिस्टर से पूछा कि वीना कहाँ है ,जो इन्हें लेकर आई थी ,वो मेरी पत्नी है! सिस्टर - ओह्ह वो आपकी वाइफ हैं,उन्होंने ही तो आपके फादर को किडनी दी है हमे इमिडीएटली ऑपरेट करना पड़ा और किडनी ट्रांसप्लान्ट करनी पड़ी ,इसके लिए आपकी पत्नी ने बहुत फ़ोर्स किया ,सो हमें करना पड़ा ...क्योंकि आपके फादर की लाइफ खतरे में थी.....वो वार्ड नं 13 में शिफ्ट हैं,आप वहां जाकर उनसे मिल सकते हैं!'

ये सुनकर मेरे पति सास ननद और सभी लोग जो वहां थे  ..उनकी आंखों में आंसू आ गए,पछतावे या अपनत्व के ...ये तो मुझे नही समझ आया पर जब वो सब मुझे मिले तो अपने पन से मिले और मेरी सास ने पहली बार जब मेरे सिर पर हाथ रखा , तो वही दिन याद आ गया ... जब उन्होंने कहा था, 'तू तो इस घर की लक्ष्मी है'.....!

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