आप कहाँ रहते हैं- मकान में या घर में?
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|   Jan 14, 2017
आप कहाँ रहते हैं- मकान में या घर में?

मकान और घर, क्या अंतर है दोनों में। एक मकान घर तब बनता है जब उसमें एक प्यार भरा परिवार बसता है। वो प्यार के रंग रिश्तों पर ही, मकान की दीवारों पर भी चढ़ते हैं।सामन्ज्सय, निस्वार्थ प्रेम, सम्मान जब एक साथ मिल जाते हैं तो ये रंग और भी गहरे होने लगते हैं। साथ में सुख-दुख बाँटना, हँसी-ठिठोली का मज़ा, बच्चों की किलकारियाँ, बढ़ें-बुज़ुर्गों का स्नेह और उनकी छत्र-छाया... जहां ये सबकुछ मिल जाता है तो एक मकान घर बन जाता है।

पर आज की भागदौड़ भरी जिदंगी इंसान को इस सुख भरी दुनिया से दूर खींच रही है। पहले हर मकान एक घर हुआ करता था परंतु आज हर घर मकान बनता जा रहा है।क्या वजह है जो आज हमारा समाज इतना बदल रहा है।

इस बदलाव की वजह कोई एक नहीं। एकल परिवारों का बढ़ती संख्या, रफ़्तार पकड़ती ज़िंदगी, आधुनिकता की ओर तेज़ी से बढ़ते क़दम, मीडिया और सोशल मीडिया का दिन पर दिन बढ़ता ज़ोर... ऐसे बहुत से कारण हैं जो आज हमारे घरों को खाए जा रहें हैं। इन सबका असर आपसी रिश्तों पर पड़ रहा है। एक छत के नीचे रहते हैं परंतु एक-दूसरे से बात करने का, समझने का वक़्त नहीं हैं। एक-दूसरे की मौजूदगी का अहसास भी नहीं है। धीरे-धीरे रिश्तों की नींव कब दरक जाती है पता ही नहीं चलता।

ऐसा नहीं है कि अब वो जीता जाता घर कहीं नहीं हैं। अभी भी उस ख़ुशहाल ज़िंदगी से लवरेज कई परिवार अपने आस-पास दिखते हैं। उनको देखकर अनायास ही ख़ुद का मन ऐसे घर की चाह करता है। पर घर तो बनाने से बनता है न। ख़ुद कोशिश करनी पड़ती है। दूर खिसकते रिश्तों को थामना पड़ता है... अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाना पड़ता है।वक़्त, प्रेम और सम्मान रिश्तें में मिठास भर देता है। ये सब खुले दिल से अपने क़रीबियों को बाँटकर ही हम एक बार फिर उस सुदंर दुनिया का आनंद ले सकते हैं।

तो आप कहाँ रहते हैं बताइएगा ज़रूर?

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