संतान की नज़रों से ममता के पाँच पड़ाव...
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|   Jan 25, 2017
संतान की नज़रों से ममता के पाँच पड़ाव...

यूँ तो हर माँ और उसके बच्चे का रिश्ता इस संसार का सबसे प्यारा रिश्ता होता है लेकिन हर रिश्ते की तरह इस इसे भी समय की मार और परीक्षा से गुज़रना पड़ता है। हम हमेशा सोचते हैं कि एक बच्चे के लिए उसकी माँ ही सबकुछ होती है, माँ के बिना बच्चे का कोई अस्तित्व नहीं है... लेकिन समय के पहिए के साथ ये रिश्ता भी अपने कई रंग बदलता है।

संतान की नज़रों से देखे तो उसकी माँ के मातृत्व जीवन के पाँच पड़ाव होते हैं।

( नोट- इस लेख को आप स्वंय एक संतान के अनुभव से पढ़ें)

1. मेरी माँ ही मेरा जीवन है- मैं बहुत छोटी हूँ और मेरी माँ के सिवा मुझे कुछ नहीं सूझता... मेरी मां भी हर मां की तरह दिन-रात बस मेरे में ही लगी रहती है। मेरे कारण मां को कभी ख़ुद के लिए समय मिल ही नहीं पाता है लेकिन माँ बिना कोई शिकायत किए हमेशा मुझे ही अपना सारा समय देती है। खाना खिलाने के लिए मैं माँ को न जाने कितनी कसरत करा देती हूँ। मेरे हर एक निवाले पर माँ की संतुष्टि का अद्भुत अहसास मैं हमेशा याद रखूँगी। हर रात माँ का खुद जागकर, मुझे सुलाने की जद्दोजहद करना.., मेरे इंजेक्शन पर मुझसे ज़्यादा खुद का रोना.... सारा दिन मेरे ही आगे पीछे दौड़ना... सब याद रहेगा है मुझे। माँ के बिना मैं कुछ भी नही हूँ। मेरी माँ ही तो मेरा जीवन है।

2. मेरी माँ मुझे क्यों नही समझती- मैं अब कुछ बड़ी हो चुकी हूँ पर माँ है कि अभी भी वैसी ही है। माँ के मैं अभी भी वही छोटी सी बच्ची ही लगती हूँ। ये मत करो... ऐसे मत करो... ये खाओ वो मत खाओ... कभी तुम अभी बहुत छोटी हो... तो कभी अब तुम बड़ी हो गई हो...थक चुकी हूँ रोज़-रोज़ वही सुन-सुनकर। मेरी माँ मुझे क्यों नही समझती।

3. मेरी माँ ही मेरी जीवन की खलनायिका है- काफ़ी बड़ी हो गई हूँ मैं अब...टीनएजर हूँ... माँ के कंधे तक मेरा कंधा भी पहुँच गया है पर अब हमारा रिश्ता बुरे से बदतर होता जा रहा है। माँ का स्वभाव दिन पर दिन बदलता जा रहा है। मेरे हर लम्हे की उनको ख़बर चाहिए... मैं कहाँ जा रही हूँ, किसके साथ जा रही हूँ , क्या कर रही हूँ और क्या नही। सब उन्हें जानना है। यही नही वो मेरी जासूसी भी करने लगी है। उन्हें लगता है कि मुझे कुछ समझ नही है... पर मैं सब समझती हूँ। मेरे दोस्तों की भी तो माँ है, वो तो ऐसा नही करती। मेरी माँ ही मेरे जीवन की खलनायिका है।

4. मेरी माँ ही मेरी दोस्त है- पता नही कैसे लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। जबसे पढ़ाई के बाद काम कर रही हूँ लगता है जैसे माँ का स्वभाव एकदम बदल गया है। अब माँ पहले की तरह मुझे रोकती टोकती नही है। मुझे समझने लगी है। अब जैसे मैं भी माँ को समझने लगी हूँ। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो माँ में अब मुझे कोई कमी नही दिखती। अगर माँ ने तब मुझे न संभाला होता तो मैं कभी अपने पैरों पर नही खड़ी हो पाती। मेरा हाल भी मेरी उन बिगड़ी सहेलियों की तरह होता। मुझमें और मां में अब एक साँझा है। अब मुझे किसी की ज़रूरत नही। माँ ही मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।

5. मेरी माँ ही मेरा अक्स है- आज जब मैं ख़ुद एक माँ बन गई हूं , मुझे अहसास होता है कि मेरी माँ, मेरा ख़ुद का ही अक्स है। माँ को अब मैं और भी ज़्यादा समझ पा रही हूँ और हर बीतते दिन के साथ अपनी माँ के लिए मेरे मन में सम्मान और प्यार बढ़ रहा है। अब मुझे समझ आया कि माँ कभी नही बदली थी, वो तो हमेशा से वैसी ही थी। अगर कोई बदल रहा था तो वो थी मैं।

ममता के उन पाँच पड़ावों से मैं भी गुज़रूँगी। प्यार और नफ़रत की आँधियों में मेरी संतान भी डगमगाएगी। पर मुझे भी अपनी माँ का अक्स बन उन परिस्थितियों से अपने बच्चे को बाहर लाना होगा। तभी तो माँ की तरह मैं भी एक सफल माँ बन पाऊँगी।

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