संतान के घर माँ-बाप के लिए स्थान नही! आखिर क्यूँ???
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|   Jun 26, 2017
संतान के घर माँ-बाप के लिए स्थान नही! आखिर क्यूँ???

आज शाम को अपने बेटे को लेकर बालकनी में बैठी थी। वो खेल रहा था मैं उसे देख रही थी। उसकी शरारत में खोयी थी कि अचानक मेरी नजर सड़क के उस पार गयी। मेरी नजर उस इंसान को ढूढ़ने लगी जो उस खाली जगह पर बैठा अपने काम में मस्त रहता था। फिर अचानक याद आया कि जिसे मैं ढूंढ रही हूँ वो अब इस दुनिया में नही है। मै बात कर रही हूँ एक ऐसे व्यक्ति कि जो अपने बेटों की पहचान बनाने के बाद खुद कही खो गये।        

इकहरा शरीर, सावला रंग, अधपके से बाल, शरीर पर मैला सा कुर्ता और धोती पहने, एक काले रंग का छाता लगाये जो कई जगह से सिला हुआ था और एक फटी सी चटाई पर अपना सामान लिये बैठे रहते थे। उनका नाम "बाबूलाल" था और वो एक 'मोची' थे। मैने उन्हें बचपन से देखा है और उन्हें मै बाबूलाल बाबा जी बोलती थी। वो बहुत शांत स्वभाव के थे और हमेशा मुस्कुराते रहते थे। जब भी मेरा स्कूल बैग, जूते-चप्पल, छाता या जो भी सिलवाने की चीज होती थी, मै झट उनके पास जाती और वो मुझे सिल कर दे देते। जब उन्हे उसके पैसे देती तो बोला करते "अरे बिटियां रहने दो, आप तो हमारी बिटियां हो आपसे पैसे नही लूँगा"। मै भी जिद कर के बैठ जाती "नही बाबा जी पैसे लेलो"। पर फिर भी नही लेते थे मुझसे पैसे, बाद में मेरे पापा उन्हें पैसे जरूर देते थे। वो ऐसे ही थे अकसर वो लोगो का जूता-चप्पल सिलते पर पैसे नही मांगते थे, जो उन्हें पैसे दे देता था वो ले लेते थे। वो बहुत ही हँसमुख स्वभाव के थे।       वो एक झोपड़पट्टी में अपनी पत्नि और दो छोटे-छोटे बेटो के साथ एक गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे थे। ऐसे में दो जून की रोटी और बच्चों की पढ़ाई, उनकी परवरिश इन सब का बंदोबस्त करना उनके लिए बहुत मुश्किल था पर नमुमकिन नही। उन्होंने अपनी गरीबी को अपनी कमजोरी नही बनने दिया, उसे अपनी ताकत बना कर अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी और उन्हें वो बनाया जो उनके बच्चे बड़े हो कर बनना चाहते थे।उनके दोनों बेटे विजय और अजय पढ़ने में अच्छे थे। पहले तो दोनों एक सामान्य स्कूल में पढ़ते थे फिर जैसे-जैसे उनकी कक्षाऐ बढ़ती गयी और उनकी पढ़ाई में रूचि देख उनके पिता बाबूलाल बाबा जी ने पैसे जमा कर और प्रयास कर उनका दाखिला अच्छे स्कूल में करवाया। दोनों बेटे पढ़ाई में अच्छे थे और बड़े होकर बड़ा बेटा डॉक्टर एवं छोटा बेटा इंजीनियर बनना चाहता था। अपने बच्चों के सपने को साकार करने में उनके पिता बाबूलाल बाबा जी ने भी कसर नही छोड़ी। पायी-पायी जोड़ कर उनकी स्कूल की फीस भरते और उनकी पढ़ाई की सभी चीजें उन्हें उपलब्ध करवाते। बच्चों को स्कॉलशिप भी मिल जाती जिससे उन्हें सहायता मिल जाती थी। दोनों बेटों ने हाई-स्कूल, इण्टर-मीडियट की परीक्षा बहुत ही अच्छे अंको से पास की। इण्टर करने के बाद बड़े बेटे ने MBBS में और छोटे बेटे ने B.Tec में दाखिला लिया। दोनों ने मेहनत की और एक डॉक्टर दूसरे ने इंजीनियर बन के दिखाया। 

       जिस दिन दोनों को अपनी-अपनी डिग्री मिली और अपने पिता के सामने आये तो उस गरीब पिता के चेहरे पर एक अलग सी चमक थी, ऐसा लग रहा था आज वो गरीब पिता अपने बेटों के औहदे से दुनियां का सबसे अमीर व्यक्ति बन गया है। बाबूलाल बाबा जी तो उस समय खुशी से फूले नही समा रहे थे, आखिर ये बात ही ऐसी थी। आज उनके बेटों ने अपनी पिता के संघर्ष का एक छोटा सा मोल दिया था। अब बाबूलाल बाबा जी के गरीबी के दिन को दूर जाने का समय आ गया था। पर अभी भी बाबूलाल बाबा जी ने अपना काम नही छोड़ा था। कुछ समय बीता दोनों बेटों की शादी भी की और दोनों अपनी पत्नि के साथ अलग-अलग शहर में रहने लगे। दोनों ने अपने माता-पिता से कहाँ-"बस कुछ दिन मुझे और दीजिये बहुत जल्द आपको अपने पास बुला लेंगे, हमारा अपना घर होगा, हम सब लोग साथ रहेंगे और आपको ये मोची का काम भी नही करना पड़ेगा"।

इसी उम्मीद से एक पिता अपने बेटों के बुलावें का इंतजार कर रहा था.................

        कुछ समय बीता, कुछ समय से साल। पर ये क्या? बाबूलाल बाबा जी अभी भी वही अपनी दुकान लगाते है, अभी भी वही वेश-भूषा, वही रहन-सहन। पर अब बाबूलाल बाबा जी पहले जैसे हँसमुख नही थे। उनके चेहरे पर एक उदासी थी, चेहरे पर तकलीफ की झुर्रिया दिखती थी, शरीर भी पहले से और कमजोर दिखता था और हँसना तो वो भूल गए थे। उन्हें ऐसा देख एक दिन मेरे पिता जी से रहा नही गया और उन्होंने बाबूलाल बाबा जी से आखिर उनकी परेशानी का कारण पूछ ही लिया। बाबूलाल बाबा जी ने बताया- 'साहेब'! "मैंने जिन्हें अपने बुढ़ापे की लठी समझा था, जिनका अपना पेट काट पेट भरा था, जिनकी पढ़ाई में कोई कमी नही छोड़ी थी, उनकी हर मांग को पूरा किया था, उन्हें पाल-पोश कर बड़ा किया, एक को डॉक्टर और एक को इंजीनियर बनाया, आज वो बड़े आदमी बन गये है। मुझ गरीब माँ-बाप की उनके घर में जगह नही है। मेरे उन बुढ़ापे के सहारो ने हम पति-पत्नि को अपने साथ रखने से मना कर दिया। मेरे बुढ़ापे की लाठी टूट गयी"। बाबूलाल बाबा जी उस समय बेबश हो फुट-फुट के रो रहे थे। आज वो बाबूलाल बाबा जी जिसने अपने पिता होने के कर्तव्य को पूरी निष्टा से निभाया था, अपने बेटों को बड़ा आदमी बनाया पर आज वो खुद गरीब रह गया। पैसे, खाने, कपड़े, घर से गरीब ही नही वो तो अपनी औलाद के ऐसे काम से सबसे ज्यादा गरीब हो गया। क्या बीती उस पिता पर जिसने अपने बच्चों से बस ये उम्मीद रखी थी कि वो उनके बुढ़ापे का सहारा बने बस....

        इसबार जब मै घर आयी तो वो जगह खाली देखी जहाँ बाबूलाल बाबा जी अपनी दुकान लगाते थे, पापा से पूछा तो पता चला उनके बेटों ने उनके साथ क्या किया। बाबूलाल जी ये सदमा बर्दाश्त नही कर पाये और बहुत बीमार हो गये। उनको ये बात अन्दर ही अन्दर खा गयी और अब वो पति-पत्नि अब इस दुनियां में नही रहे। बहुत दुःख हुआ ये जान कर उनके त्याग का उन्हें ये शिला मिला।

        हर माँ-बाप अपने बच्चे की परवरिश के लिये, उनकी पढ़ाई के लिये, उनकी हर जिद के लिये, उनके हर सपने के लिए क्या कुछ नही करते। पर अगर बच्चे लायक निकल गए तो माँ-बाप को ही भगवान मान कर उनकी सेवा कर घर को ही स्वर्ग बना लेते है और अगर कही नालायक निकल गए तो माँ का दूध पिया ये तक भूल जाते है, जिस बाप की उंगली पकड़ चलना सीखा उनका समय आने पर हाथ झिटक बेसहारा कर देते है, न ही वो बुढ़ापे की लाठी बनते है और जिस बाप के कंधे पर बैठ कर बचपन में सैर करते थे उसी माँ-बाप के मरने पर अपने कंधे तक नही देते। बहुत दुःख होता है जब ऐसी घटना सामने आती है।

       आज के बदलते समय में समाज में एकल परिवार की संख्या बढ़ती जा रही है। सभी अपने-अपने कामो में व्यस्त है ज्यादा तर लोगो के पास वक्त नही है कि वो अपने माता-पिता के साथ, अपने परिवार के साथ थोड़ा समय बिता लें। पर क्या इस दौड़-भाग भरी जिंदगी में व्यस्त रहने का ये मतलब है कि अपने माता-पिता की दी परवरिश को, उनके संघर्ष को, उनके त्याग को, उनके प्यार को या जो कुछ भी जन्म देने से लेकर बड़ा करने तक हमारे लिये किया वो हम भूल जाये??? नही न? जिस समय माँ-बाप की जो जिम्मेदारी थी वो उन्होंने अच्छे से निभायी। समाज में एक पहचान दिया। अगर माँ-बाप न होते तो क्या आज हम होते? वैसे ही हर सन्तान का समय आता है अपनी जिम्मेदारी निभाने का अपने माँ-बाप के प्रति, तो फिर क्यूँ कोई अपनी जिम्मेदारी से भागने लगता है। आज अगर हर बेटा ये बात अच्छे से समझ ले तो कलयुग में भी श्रवण कुमार होंगे। आज अगर हमने अपने माँ-बाप के साथ गलत किया तो कल को हम भी अपने बच्चों से क्या उम्मीद रख सकते है। बस एक निवेदन है कोई भी अपने माँ-बाप के साथ ऐसा न करें, उनके चरणों में ही स्वर्ग है।

#बच्चों के बदलतें व्यवहार।

#समाज।

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