Do as I say...Don't do as I do..
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|   Jul 28, 2017
Do as I say...Don't do as I do..

शीर्षक पढ़ा न आपने ....प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कभी न कभी सभी अभिभावक अपने बच्चों को यही संदेश देते हैं। 

एक कहानी तो सुनी होगी आपने बचपन में कि एक बार एक महिला अपने बेटे की बहुत ज़्यादा मात्रा में गुड़ खाने की आदत से परेशान थी। बहुत समझाने पर भी उसका बेटा ये आदत नही छोड़ रहा था। महिला अपने बेटे को  बापू (महात्मा गांधी) के पास लेकर गयी ये सोच कर कि यदि बापू समझाये तो शायद मेर बेटा ये आदत छोड़ दे। उसने बापू को अपनी समस्या बताई और बेटे को समझाने को कहा। बापू ने उस महिला को एक हफ्ते बाद दोबारा आने को कहा। महिला को लगा कि बापू ने एक हफ्ते बाद बुलाया है तो ज़रूर इनके पास कोई कारगर तरीका होगा जिस से मेरा बेटा तुरंत ये आदत छोड़ देगा। जब एक हफ्ते बाद वो महिला पुनः बापू के पास आई तो बापू ने उसके बेटे से कहा "बेटा ये गुड़ खाने की आदत तुम छोड़ दो।" महिला को सुनकर आश्चर्य हुआ। उसने बापू से कहा कि इतनी सी बात तो आप एक हफ्ते पहले भी कह सकते थे , इसके लिए एक हफ्ते प्रतीक्षा करने की क्या आवश्यकता थी?  इस पर बापू ने बड़ा सुंदर उत्तर दिया कि बेटा एक हफ्ते पहले तक मैं स्वयं भी बहुत गुड़ खाता था तो भला तुम्हारे बेटे को कैसे कहता ये आदत छोड़ने के लिए। पिछले एक हफ्ते से मैने भी गुड़ खाना छोड़ दिया है ताकि तुम्हारे बेटे को समझा सकूँ। महिला को बात समझ में आ गयी। वो बापू को धन्यवाद कहकर अपने बेटे को लेकर लौट गई।

मैंने ये कहानी आपको इसलिए बताई क्योंकि कुछ ऐसी ही परस्थितियों से सभी अभिभावक दो चार होते ही रहते हैं। वे अपने बच्चों को अक्सर वो काम करने को मना करते हैं जो कि वे स्वयं ही करते रहते हैं। कई बार माता -पिता बच्चे की किसी बात या भाव-भंगिमा देखकर बड़े आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि ये बात तो हमने अपने बच्चे से नही कही या नही सिखाई फिर न जाने कैसे सीख गया। 

दरअसल बच्चे माता-पिता को अपना आदर्श मानते हैं, उनके पहले शिक्षक तो माता-पिता ही होते हैं। वे अपने माता-पिता की कही अनकही सब बातों को बड़ी गौर से देखते हैं और उसी का अनुसरण करते हैं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बच्चे अपने बड़ो की ही नकल करते हैं।इसलिए बच्चों के समक्ष जितना हो सके अपने व्यवहार को संयमित और संतुलित रखना आवश्यक है।उनके सामने उनसे या किसी और से वैसा ही आचरण करे जैसा आप चाहते हैं कि आपका बच्चा करे। कुछ सुझाव देना चाहूंगी आशा है आपके काम आएंगे :

  • बच्चों के सामने किसी भी प्रकार की अभद्र भाषा या गाली का प्रयोग न करें।
  • जब बच्चे आस पास हो तो घर में शांतिपूर्ण एवं खुशनुमा माहौल बनाये रखें।
  • माता -पिता भूलकर भी बच्चों के सामने किसी भी प्रकार की बहस या लड़ाई झगड़े करने से बचें।
  • बच्चों की उपस्थिति में किसी अन्य व्यक्ति की बुराई या निंदा न करें।
  • ज़ोर से चिल्लाना, अपशब्दों का प्रयोग करना, झूठ बोलना आदि बच्चों के नाज़ुक दिल पर बहुत बुरा असर छोड़ते हैं, उनके सामने ऐसा करना अनुचित है।
  • कोई भी अच्छी आदत यदि बच्चे को सीखाना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत खुद से करें। इसी प्रकार कोई बुरी आदत बच्चे में है तो देखें कि कही घर के किसी अन्य सदस्य को तो ऐसी कोई आदत नही है, यदि है तो पहले उस व्यक्ति को वो आदत छोड़ने को कहें।
  • बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से सिखाएं जैसे कि यदि आप चाहते हैं कि वे सुबह उठकर सबको गुडमॉर्निंग कहें तो पहले घर अन्य सदस्य एक दूसरे को गुडमार्निंग कहना शुरू करें, बच्चे अपने आप इस बात का अनुसरण करने लगेंगे। 
  • मेरा तजुर्बा यही कहता है कि बच्चे जितना हमारे कहने से नही सीखते हैं उस से ज़्यादा हमारे व्यवहार को देखकर सीखते हैं। वे जैसा देखते है वैसा ही सीखते हैं।

    ये तो थे परवरिश से जुड़े मेरे अनुभव। आप अपने अनुभव व राय भी ज़रूर शेयर करें।

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