सफर...बेटी से माँ बनने का
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|   Jul 25, 2017
सफर...बेटी से माँ बनने का

सुबह के सात बज रहे थे। रमा अपनी तीन साल की बेटी को जगाने के लिए कमरे में आई। “भूवि जल्दी उठो बेटा नही तो स्कूल के लिए लेट हो जाओगी”, कहती हुई रमा किचन में अपनी बेटी का लंच बॉक्स तैयार करने में लग गयी।बेटी को स्कूल के रेडी किया और उसके जाने के बाद पतिदेव को लंच बॉक्स देकर आफिस के लिए विदा किया और घर के दूसरे कामो में लग गयी।

रमा अब एक गृहिणी है और दो बच्चों की माँ। सुबह जल्दी उठकर सबके लिए नाश्ता, चाय, दोपहर का खाना बनाना। फिर बेटी को स्कूल के लिए तैयार करना और पति को आफिस के लिए रेडी होने में मदद करना। सासु मां की सेवा, अपने दो माह के बेटे की देख-रेख और घर के अन्य काम समेटते समेटते कब सुबह से शाम हो जाती पता ही नही चलता। कुछ समय पहले तक रमा की ज़िंदगी कुछ और ही थी ...मतलब शादी से पहले। 

रमा…संयुक्त परिवार में रहने वाली रमा एक मस्तमौला, बेफिक्र,जीवन से भरी हुई लड़की थी।कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करती थी। मां तो उसे अपनी बेटी नही बेटा ही मानती थी, वैसे भी रमा के परिवार में बेटे या बेटी में कोई फर्क नही किया जाता था।काम के अलावा रमा को अपने दोस्तों के साथ घूमना-फिरना, मूवी देखने और गोलगप्पे खाने का बड़ा शौक था।

रमा के घर वाले उसके लिए लड़का देख रहे थे और सुयोग्य वर मिलते ही उसकी शादी पक्की हो गयी। देखते ही देखते शादी का दिन भी आ गया और रमा शादी के बाद अपने ससुराल एक दूसरे शहर में रहने चली गई।

नया शहर, नए लोग, नया परिवार…रमा की सासु मां कुछ तीखे स्वभाव की थीं पर पति बहुत ही सुलझे और समझदार व्यक्ति थे इसलिए रमा को ज़्यादा समय नही लगा ख़ुद को नए महौल में ढ़ालने में। 

रमा ने जॉब करना नही छोड़ा था, हाँ ये अलग बात है कि अब मायके जैसा आराम न था। सुबह जल्दी उठ कर नहा के सबके लिए नाश्ता और दोपहर का खाना बनाने के बाद आफिस के लिए निकलती। शाम को वापिस आ कर फिर घर के कामों में लग जाती।हालांकि रमा ने कभी इस बात की शिकायत नही की क्योंकि सासु मां के हिसाब से बाहर जा कर काम करना रमा की मर्ज़ी है लेकिन घर के काम तो करने ही होंगे। ख़ैर, इसी तरह समय बीतता गया और दो साल बाद रमा की एक प्यारी सी बेटी हुई। बेटी के आते ही जैसे घर में रौनक सी आ गयी और रमा के जीवन में भी। अब रमा पे बेटी के पालन पोषण की भी ज़िम्मेदारी थी सो रमा ने ये निर्णय लिया कि अपनी बच्ची की परवरिश के लिए वो अपनी जॉब छोड़ देगी ताकि बेटी का अच्छी तरह ध्यान रख सके…उसे हर लम्हा बडा होते देख सके। उसके इस निर्णय में उसके पति व सास ने भी उसका साथ दिया। रमा को लगा कि कुछ समय बाद जब बेटी थोड़ी बड़ी हो जाएगी तो फिर से कहीं नौकरी करने लगूंगी।

बेटी जब एक साल की हुई तो रमा को दोबारा जॉब का आफर आया लेकिन जॉइन न कर सकी। क्योंकि इतनी छोटी बच्ची की ज़िम्मेदारी सासु मां अकेले नही उठा सकती थीं और बच्ची को किसी आया या डे केअर के भरोसे छोड़ना रमा को मंजूर नही था।

 देखते ही देखते शादी को पांच वर्ष हो गए और रमा को एक प्यारा सा बेटा हुआ। अब रमा पर उसकी देखभाल की भी ज़िम्मेदारी थी। बस फिर तो रमा की ज़िंदगी घर और बच्चों तक ही सिमट के रह गयी। एक पत्नी, बहू और मां का दायित्व निभाने में ख़ुद कहीं खो सी गयी है रमा। अपनी तरफ तो देखने की भी फुरसत नही है।ख़ुद से मुलाकात करने का....उस पुरानी वाली रमा से मिलने का समय ही कहाँ है अब। वो रमा जिसकी अपनी एक पहचान थी, आज़ाद, बेफिक्र रमा…वो कहीं खो गयी थी अब। कभी कभी तो अप���ी कोई पहचान न होना बहुत खलता भी था…आइडेंटिटी क्राइसिस होने लगता। पर बच्चों को अकेला छोड़ बाहर जाकर काम करने को उसका दिल नही मानता था। रमा अक्सर इसी उधेड़बुन में रहती। आज भी वो यही सोच रही थी….अपने पुराने दिनों को याद कर रही थी...कि अचानक छोटा बेटा नींद से जाग गया। उसके उठने की आवाज़ सुन रमा बैडरूम की और दौड़ पड़ी। कुछ ही देर में  बेटी भी स्कूल से आ गयी। दोनों बच्चे अपनी माँ से लिपट गए। उनके मुस्कुराते चेहरे देख रमा सब कुछ भूल गयी। उसे ये लगा कि वो अब सिर्फ किसी की बेटी ही नही बल्कि एक माँ भी है और एक औरत के लिए भला माँ बनने से बड़ी और क्या पहचान हो सकती है। रमा को अब अपनी पहचान मिल गयी थी।

बहनों, ये कहानी हमारे समाज की कई उन महिलाओं की है जो कि बेटी से माँ बनने के सफर में बिना शिकायत बहुत कुछ त्याग देती हैं। शायद इसलिए माँ को ईश्वर का दूसरा रूप कहा गया है। ऐसी हर माँ को मेरा नमन है। 

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