काश ! मैं तुम्हारा भी ख्याल रख पाती माँ ।
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|   Mar 03, 2017
काश ! मैं तुम्हारा भी ख्याल रख पाती माँ ।

राधिका आज बहुत थक गयी थी। शरीर गिरा गिरा लग रहा था। लेटते ही नींद आ गयी। जब सुबह आँख खुली तो माँ चाय का प्याला लिए खड़ी थी। बेटा अब तबियत कैसी है। अब बहुत बेहतर है माँ चाय का प्याला लेते हुए राधिका ने जवाब दिया। सुबह सुबह माँ के हाथ की अदरक वाली चाय पीकर राधिका को बहुत आराम मिला।      नहा धोकर पूजा करके राधिका आयी तभी माँ की आवाज़ आयी - नाश्ता कर लो राधिका। माँ ने उसकी पसंद के आलू के परांठे बनाये थे।आपके साथ ही करुँगी माँ राधिका ने बोला। बेटा मैं गर्म गर्म खिला रही हूँ तुम खा लो। माँ के ज़ोर देने पर राधिका ने खा लिया। राधिका को ऐसा लगा मनो उसने बहुत दिनों बाद नाश्ता सुकून से नाश्ता किया हो।

       माँ के साथ बातें करते करते काम निबटाया और फिर दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया। शाम की चाय से लेकर रात के खाने तक दोनों ने साथ काम करके खाना खाया। माँ ने अधिकाँश काम खुद ही किया पर राधिका उनके साथ बातें करती करती काम भी करवा रही थी। दोनों को पता ही नही चला कब काम हो गया। रात को सोने गयी तो माँ राधिका के लिए एक गिलास दूध गर्म करके ले आयी। आँखें बंद कर दोनों लेट गए। थोड़ी देर बाद ही घड़ी के अलार्म से राधिका की आँख खुल गयी।

            अरे ये क्या । सुबह के 7 बज गये और माँ की जगह सामने अविनाश अखबार उठा कर ले रहा है। बैठते ही बोल - राधिका चाय पिला दो और ब्रेकफास्ट और लंच जल्दी लगा देना आज ऑफिस जल्दी पहुंचना है।

       राधिका की नींद खुल गयी थी और उसे आभास हो गया था कि वह ससुराल में है। सभी को चाय पिलाकर अपना चाय का प्याला रसोई में ही रख लिया और नाश्ते खाने की तैयारी करते करते चाय पी। फिर सबको नाश्ता करवाकर , अविनाश को ऑफिस के लिए लंच देकर, गजर के सब काम निबटा कर राधिका ने भी अपने लिए नाश्ता परोसा। नाश्ता करते करते ही मन में सुबह देखा स्वप्न याद आ रहा था। फिर दिन का लंच कराकर थोड़ी देर लेटी। आज नींद भी नही आ रही थी। 5 बजते ही उठी और चाय बनाकर सबको दी और खाने की तैयारी में लग गयी। अविनाश घर आये तो उनको चाय नाश्ता करवाकर सबने डिनर किया । फिर सबको दूध गर्म करके दिया और रात जब लेटी तो ये ही विचार आ रहा था कि यहाँ बिना रुके बिना थके सब काम कर लेती हूँ , सबका खयाल रखती हूं लेकिन अपनी माँ का ख्याल क्यों नही रख पाती। जल्दी ही एक दो दिन की छुट्टी ले राधिका अपनी माँ के पास पहुंची।

        राधिका सोचकर आयी थी कि इस बार माँ को ज़रा उठने नही देगी। उसने माँ के जागने से पहले ही उठकर माँ की पसंद का नाश्ता बनाया और अदरक वाली चाय लेकर माँ पापा के पास पहुँच कर उन्हें उठाया। उन्हें दवा दी । और उनको नाश्ता कराया। माँ कुछ बोल ही नही पा रहीं थी । बस राधिका को देखे जा रही थी कि उनकी नन्ही परी अब बहुत बड़ी हो गयी है।

          खाना भी राधिका ने खुद बनाया सब माँ पापा की पसंद का। और दोनों को साथ खिलाया। गर्म गर्म रोटी। फिर सबको मंदिर लेकर गयी उन्हें दर्शन कराये। रात का डिनर तीनो ने बाहर किया। और घर आ गए। माँ के पैरों में दर्द होने लगा था राधिका ने तेल की मालिश की और सबके लिए दूध गर्म कर दिया। माँ की आँखे नम्म थी। 

       अगली सुबह अविनाश लेने आ गए। माँ दामाद की खातिरदारी में लग गयी। ये बनाऊं वो बनाऊं। वक़्त गुज़ारता गया और हम चलने को तैयार हुए। माँ पापा के गले लगी तो हम तीनों की ही आँखें भर आईं। माँ पापा ने बस इतना ही कहा कि बहुत अच्छा लगा कि तुम समय निकाल कर आयीं। और मैं बस इतना ही कह पायी की माँ पापा अपना ख्याल रखियेगा। 

      

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