काश कोई लड़कों से भी कहे.... दामाद नहीं बेटा बनो
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|   Mar 17, 2017
काश कोई लड़कों से भी कहे.... दामाद नहीं बेटा बनो

हमारे समाज में लड़कियों से तो हमेशा कहा जाता है कि ससुराल में बहु बन के नही बेटी बन के रहना। सास ससुर को माँ बाप जैसे प्यार देना , देवर को भाई और ननद को बेहेन मानना। उससे ये आशा की जाती है कि वो अपने परिवार से पहले अपने पति के परिवार के बारे में सोचे।

लड़कों से तो कोई कुछ भी नहीं कहता। क्यों? उनका कोई फ़र्ज़ नही बनता अपनी पत्नी के परिवार की तरफ। क्यों नहीं उनसे कहा जाता की अपनी पत्नी के माँ बाप को अपने माँ बाप जैसा सम्मान देना। अगर तुम्हारी पत्नी का कर्त्तव्य है कि वो तुम्हारे परिवार का ख्याल रखे तो तुम्हारा भी कर्त्तव्य है कि तुम उसके परिवार का ख्याल रखो।

हमारे यहाँ शादियों में जो दामाद, फूफाजी, जीजाजी, वो सारे पुरुष जो ससुराल की किसी शादी में आते हैं, वो शादी का हिस्सा बनने की जगह, कमियां निकालते हैं। यहाँ तक की ये कहावत ही हो गई है कि "की जब तक शादी में कोई फूफा नाराज़ न हो, तो शादी कैसी" । अगर ये सभी पुरुष अपने दमाद होने का घमंड छोड़ कर, काम में हाथ बटाने लगे तो कितना अच्छा हो।  

बहु से अपेक्षा की जाती है कि वो अपने मायके कम से कम जाये। और दामाद को तो अलग से न्योता दिया जाये हमेशा। पर कभी बिना बुलाये भी जाकर देखो, हक़ से एक बेटे की तरह, लड़की और उसके माँ बाप के चेहरे ख़ुशी देखते रह जाओगे।  जितना प्यार और अपनापन एक पति अपनी पत्नी के परिवार को देगा, पत्नी उससे कई ज्यादा उसके परिवार को देगी।

समय तो बहुत तेजी से बदल रहा पर कुछ रिवाज़ और नियम, अभी भी वैसे ही हैं जैसे पहले हुआ करते थे। उन्हें बदलने की बहुत जरुरत है। जैसे लड़की को हमेशा से कहा जा रहा है कि बहु नहीं बेटी बनो, अब समय आ गया है कि हम लड़कों से भी कहे " दामाद नहीं बेटे बनो" ।

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