MeriRatMeriSadak क्या हास्य के नाम पर कुछ भी मान्य है? 
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|   Aug 12, 2017
MeriRatMeriSadak क्या हास्य के नाम पर कुछ भी मान्य है? 

मैं खुद एक लेखिका हूँ और रचनात्मकता को महत्व देती हूँ।पर रचनात्मकता के नाम पर दो-तीन चीजें खटकती हैं...

MenRealVictim...जैसे वीडियो, पत्नियों या औरतों का मजाक उड़ाने वाले मैसेज और पोस्ट ये सब हमारे छोटे शहरी समाज ही नहीं गाँव-देहात को भी पथभ्रष्ट कर रहे हैं। आप ही बताइए, कितने प्रतिशत छोटे शहर या गाँव की लड़कियाँ लिव इन में रहती होंगी? कितनी प्रतिशत लड़कियाँ चीट करती होंगी?

और कितने प्रतिशत लड़कियाँ शराब पी कर रोड पर गालियाँ बोलती होंगी?

मानती हूँ आजकल बहुत सि महिलाएं भी पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करने की होड़ में कुछ ऐसा व्यवहार करती हैं जो उनपर शोभनीय नहीं होता है । पर अभी भी भारतवर्ष में जीवन मूल्य बाँकी है।

जिस तरह 70-80 के समय से, वीमेन डिग्निटी के नाम पर समाज के सभी लड़कों के बारे में एक सर्व धारणा बना दी गई थी कि लड़के विश्वास योग्य नहीं होते और उसके दुष्प्रभाव हम देख ही रहे हैं जिसके कारण कई सभ्य पुरुषों को भी अपमान सहन करना पड़ता है । वैसे ही आज लड़कियों के मामले में ऐसा मत हो गया है।

मेरे खुद के परिचित कुछ लोग हैं जो ख़ास कर के सभी महिलाओं को स्टीरियोटाइप मान के चलते हैं। उनके हिसाब से लड़कियाँ कम दिमाग की होती हैं, गुस्सैल होती हैं, धोखेबाज होती हैं और पैसों के लिए कुछ भी कर सकती हैं, किसी को भी छोड़ सकती हैं जो कम से कम सत्तर प्रतिशत महिलाओं के लिए गलत वक्तव्य है। पुरुषों के प्रति ख़ास विचारधारा प्रवाहित करने के बावजूद भी महिलाएँ उनपे विश्वास करती भी आई हैं और करती रहेंगी।

मगर पुरुष समाज में महिलाओं पर विश्वास की हमेशा कमी रही है और इसके लिए अपने-अपने धर्म की धर्म पुस्तकें ही पढ़ लें काफी होंगी ज्यादा तर्क देना आवश्यक नहीं।  नतीजा यही हुआ है कि सही -गलत कैसी भी घटना हो उसपर लोगों कि प्रतिक्रियाएँ पढ़ें तब पता चलता है कि कितने सुन्दर- सुन्दर नामों से महिलाओं का सम्मान किया जा रहा है।

यहाँ रात में कोई महिला निकली तो उसे उसकी मजबूरी या आवश्यकता की वजह चरित्रहीनता माना जाने लगा है। सब जानते हैं रात को बारह बजे कोई लड़की अगर किसी काम से ही निकली हो या घूमने ही तब भी किसी को उसका अपमान करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

जब किसी परिचित से ये सुनना पड़ता है कि औरतें तो ऎसी ही होती हैं तो अच्छा नहीं लगता। औरतें गाड़ी नहीं चला सकतीं या औरतें खर्चीली होती हैं इत्यादि इत्यादि कई बातें हैं जो महत्त्व नहीं रखतीं फिर भी लोग बोलते हैं।

एक पिता , भाई या मित्र जब बच्चे को ऐसा कहता है तो जाने- अनजाने बच्चे का कोमल मन स्त्री जाति के प्रति विश्वास से ज्यादा अविश्वास से भर जाता है। कई महिलाएं भी ऐसा ही करती हैं। हम सब जानते हैं कि इसी विचारधारा ने आनेवाली पीढ़ी के लिए एक विभत्स मानसिकता को गढ़ दिया है। 

हम सब कभी ना कभी किसी पिता को ये बोलते सुनते हैं तुम्हारी माँ कुछ नहीं समझती। परिणाम ये होता कि बेटे भी आगे चल कर ऐसा ही मानते हैं।

चाहे कुछ भी कर लें जब तक लड़कों के मन में स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना ना हो कितने भी कानून बना लीजिए ये छेड़छाड़, रेप होते रहेंगे। अब कुछ लोग आकर लिखेंगे की मैडम आप "फेमिनिस्ट" हो।

जी हाँ साहब। मैं फेमिनिस्ट हूँ क्योंकि भारत माता है पिता नहीं। मैं बस अपनी संस्कृति की सुरक्षा चाहती हूँ। मैं अनपढ़ नहीं जो ये ना समझ सकूँ कि दोनों ही समान हैं स्त्री भी पुरुष भी और गलती करने पर दोनों को ही सजा मिलनी चाहिए।

मैं बस ये निवेदन कर रही हूँ कि जरूरी नहीं आपका ब्रेकअप हो जाए तो वो लड़की या समाज की हर लड़की ....... है

आपकी पत्नी बदमाश हो तो समाज में सबकी पत्नी बदमाश है या किसी की पत्नी या बहु अच्छी नहीं है तो आपकी भी नहीं होगी। ऐसा ही पुरुषों के लिए भी सत्य है।

सिर्फ इस धारणा के कारण कितने घर टूटने के कगार पर पहुँच जाते हैं।  पर बुरी छवि से पुरुष समाज का जितना नुकसान हुआ है उससे कहीं ज्यादा महिलाओं का हो रहा है। (खास करके रेप और छेड़छाड़ के सन्दर्भ में)और ये तो आप जानते ही हैं कि मातृत्व का सम्मान होना आवश्यक है अन्यथा समाज अनियमित हो जाएगा।

अगर किसी का प्रपोजल मान लो तब भी आप..... हो । ना मानो तो भी आप.... हो। खाली जगह में प्रयोग होने वाले सम्मानजनक नाम आपको विदित ही होंगे।

कला जगत को ये समझना पडेगा कि हम अपने समाज में माँ या स्त्री की कैसी छवि प्रस्तुत कर रहे हैं?

मनोरंजन और हास्य के नाम पर निरर्थक समान बेच कर कुछ फ़ायदा जरूर होगा पर निकट भविष्य में ये बहुत हानिकारक साबित होगा।

भारतवर्ष में जहाँ एक स्त्री के अपमान पर महाभारत छिड़ गई थी क्या वहाँ महिलाओँ की छवि इस तरह से धूमिल करना सही होगा?

ये मेरा विचार है और पता है जब-जब मैं लिखुंगी तब-तब लोग फेमिनिस्ट बोल कर टाल देंगे।  जरूरी नहीं आप सहमत हों ।पर अगर सहमत ना हों तो स्क्रोल डाउन करें। कमेंट और विचार भी दें किन्तु व्यर्थ विवाद ना करें।

अगर फेसबुक के बाहर भी न्यूज देखते होंगे तो मेरे पोस्ट का आशय समझ में आ जाएगा।

अगर सहमत हों तो कमेंट और लाईक के द्वारा अवश्य व्यक्त कर सकते हैं।

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