जूठे हैं भजन...
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|   Jun 16, 2017
जूठे हैं भजन...

बचपन से ही हमें ईश वन्दना करना सिखाया जाता है कि कैसे हाथ,मुँह और पैर धोकर ,साफ वस्त्र पहनकर ,शान्त मन एवं श्रद्धा से पूजा करनी चाहिये।मैं न तो कोई प्रकाण्ड पंडित हूँ और न ही पूजा के तौर- तरीकों के बारे में बताना चाहती हूँ।

मेरा मानना है कि इन सभी बातों में शान्त मन एवं श्रद्धा सबसे ज्यादा ज़रूरी है।सन्त रैदास ने कहा भी है  "मन चंगा तो कठौती में गंगा"।

बाकी सबकी अपनी - अपनी सोच है,मेरी पङोस वाली आण्टी तो शाम की पूजा के समय अपनी बहू से ये भी सुनिश्चित करती हैं कि उसने अपने सभी वस्त्र ,सभी मतलब सभी वस्त्र ,बदले हैं। उनके लिए हाथ मुँह धोना काफी नहीं है, हँसी आती है उनकी सोच पर...और तो और जब घर में कोई विशेष पूजन हो तब तो सभी सदस्यों को नये कपङे ही पहनने होंगे।यह अलग बात है कि यह नियम अधिक सख्ती से महिलाओं पर ही लागू है।

वैसे तो सभी अपनी सोच ,समझ, हैसियत और मान्यता के अनुसार भगवान का नाम लेते हैं।पर  एक बात मुझे कचोटती है , जब हम घर में कीर्तन ,जागरण ,भजन करते हैं तो अक्सर  फिल्मी गीतों की धुन का इस्तेमाल  करते हैं।उदाहरण के तौर पर मैंने "काँटा लगा", "चोली के पीछे क्या है" ,"तू चीज बङी है मस्त-मस्त" और "बेबी डाॅल मैं सोने दी " जैसे गीतों की धुन पर भी धार्मिक संगीत बजते सुना है।

इन "कथित" भजनों को सुनकर कोफ्त होती है कि ऐसे "आइटम भजन" क्यों चाहिये हमें...क्या किसी को एक बार भी असल गीत याद नहीं आता...और साथ ही वो गीत के भाव...मुझे तो याद आता है और जब मैं बच्ची थी तब तो अल्हङपने में असल वाला फिल्मी गीत ही गाने लगती...क्योंकि भजन के बोल तो आते नहीं थे । 

आखिर क्यों हम ऐसा संगीत इस्तेमाल करते हैं... हम जूठे मुँह भगवान की पूजा नहीं करते हैं, तो ये संगीत की जूठन क्यों... यदि आपको मेरा ब्लाॅग अच्छा लगा हो तो कृपया शेयर करें...

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