हिन्दी मेरी शान नाकी शर्म। 
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|   Jan 05, 2017
हिन्दी मेरी शान नाकी शर्म। 

जब हम हिन्दी भाषा का उपयोग बोलने या लिखने में उपयोग करते हैं तो एक शर्म सी क्यूँ महसूस होती है। अगर मैं अंग्रेज़ी या फिर किसी और विदेशी भाषा का उपयोग करु तो शायद बहूत फक्र महसूस करु। ऐसा क्यों। क्या राष्ट्रीय भाषा को लेकर हमें शर्म सार होना चाहिए। हमें इस नयी पीढ़ी को राष्ट्रीय भाषा हिन्दी का प्रयोग तथा इसकी विशेषता के बारे में जानकारी देते हुए सतर्क करना होगा। ज़रा सोचिए हमारी आज की युवा पीढ़ी जब विदेश जाती है और वहाँ पर हिन्दी भाषा में कुछ भी नहीं पढ़ पातीं हैं और विदेशी भाषा में फर्राटे से वार्तालाप करते हुए फक्र महसूस करती हैं। कितनी शर्म की बात है। इसमें दोष आज की पीढ़ी का नहीं है। दोष है उन विद्यालयों का जहां पर विदेशी भाषा को अनिवार्य शिक्षा का स्तर दिया जा रहा है। क्या मुझे अपनी मां को मां कहते हुए शर्म आती है नहीं तो फिर मात्र भाषा के प्रति लोगों का ऐसा बर्ताव क्यों। क्या हम आज भी गुलाम ही रहना चाहते है। मुझे तो लगता है आज के जमाने के माता-पिता पश्चिमी विदेशी तौर तरीकों से चूंघिया गये हैं। कोई तो प्रयास हो जिनसे उनके आखों पर पट्टी को उतार फेंका जाय। मेरी बेटी आठ साल की है। जब स्कूल में हिन्दी या फिर फ्रेंच चुनने के लिए कहा गया तब वह बहुत खुश होकर मुझे बोलने लगी कि मैं फ्रेंच लेना चाहती हु। जब मैंने उसे वजह पूछी तो कहने लगी कि वह मज़ाक का पात्र बन जायेगी अगर हिन्दी लेगी तो। मुझे आज के बच्चों की इस सोच पर बहुत गुस्सा आया। मेने मेरी आठ साल की बच्ची को हिन्दी का प्रयोग समझाया। मेने उसे हिन्दी भाषा का उपयोग समझाया। मेने उसे हिन्दी भाषा का दर्जा बताया। आज वह बहुत फर्क से हिन्दी भाषा को सीख रही हैं। बहुत खुश हैं। मेने एक सच्चे नागरिक का कर्तव्य निभाया है। उम्मीद करती हूं कि आप भी इस राष्ट्रीय भाषा को अपनी खोई हुई पहचान दिलाने में मदद करेंगे। 

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