ये ख्वाहिश सुपरमॉम बनने की!
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|   May 05, 2017
ये ख्वाहिश सुपरमॉम बनने की!

मुंबई शहर में सुबहें बड़ी खाली होती हैं। सड़कें खाली, रास्ते खाली, पार्क खाली, बसें खाली, लोकल ट्रेन खाली। और फिर अचानक पूरा शहर बेचैन हो जाता है। जॉगिंग शूज़पहनकर निकले इतनी सुबह निकले इतने सारे लोग बेचैनी कम करने के लिए बाहर निकले हैं या अपना वज़न कम करने के लिए? ये शहर बेचैन लोगों का शहर है। सब बैचैनहैं। मुझे एक और बीमारी हो गई है आजकल। जिस औरत को काम पर जाते देखती हूं, उसके पीछे छूट गए घर के बारे में सोचती हूं। कब लौटती होगी वो? उसके बच्चे होंगे क्या?बच्चों का होमवर्क कौन कराता होगा? सुबह कितने बजे उठकर खाना बनाया होगा? पार्क में बच्चों के साथ चलती मांओं को देखती रहती हूं। बच्चे को बड़ा करने के अलावा कोईऔर मकसद होगा क्या इनकी ज़िन्दगी का?मैं पार्क के कोने में बेंच पर बैठने लगती हूं तो देखती हूं एक बुज़ुर्ग महिला अपने से भी कहीं ज़्यादा उम्रदराज़ शख़्स को धीरे-धीरे हाथ पकड़कर टहला रही हैं। जाने कौन किसकोटहला रहे है, लेकिन इन दोनों को देखकर मैं बहुत बेचैन हो जाती हूं। इनका खाना कौन बनाता होगा? कैसे रहते होंगे इतने बड़े शहर में दोनों? दो लाचार लोग क्या साथ दे पातेहोंगे एक-दूसरे का? इनका परिवार नहीं है? बच्चे होंगे या नहीं?

 

इसी अकेलेपन और लाचारी से बचने के लिए तो हिंदुस्तान में लोग परिवार बनाते हैं, बच्चे पैदा करते हैं। बच्चे - बुढ़ापे का सहारा। बेटा - बुढ़ापे की लाठी। फिर भी अकेले रह जातेहैं लोग। बुढ़ापा किसी पर दया नहीं दिखाता। बीमारी किसी को नहीं बख़्शती। बेचारगी और अकेलापन अकाट्य सत्य है। अवश्यंभावी। मां के लिए भी, और पिता के लिए भी।फिर हम किस तलाश में हैं? ज़िन्दगी का हासिल क्या हो? अगर यही लाचारी आख़िरी सच है तो फिर इतनी भागमभाग क्यों?फोन पर गूगल खुल गया है और मैं वर्किंग मदर्स गूगल करती हूं। मेरे भीतर की सारी लड़ाई ही यही है। माँ होने और एक प्रोफेशनल होने के बीच की। दोनों होने की कोशिश कईकुर्बानियाँ मांगती है। जब इतना ही मुश्किल है सबकुछ तो हार क्यों नहीं मान जाते हम? आसानियों की राह चुन लेना हमारी भी ज़िन्दगी आसान कर देगा, और हमारे बच्चों कीभी। शाम को उन्हें सुलाने के बाद देर रात तक लैपटॉप पर आँखें फोड़ने से हमें निजात मिलेगा, और सुबह तक जलती बत्ती में सोने की मजबूरी से बच्चों को। उन्हें स्कूल से लौटतेहुए ये डर नहीं सताएगा कि बस स्टॉप पर उन्हें लेने के लिए कोई होगा या नहीं। मुझे इस तनाव से छुट्टी मिल जाएगी कि बच्चे जिस दिन घर पर हों उस दिन मीटिंग के लिए कैसेजाऊंगी मैं?मैं क्यों उलझ रही हूं इतना? क्यों ज़रूरी है काम करना? जवाब ढूंढने के लिए मैं फोन पर फिर से सक्सेसफुल मदर्स टाईप करती हूं। फिर पावर वूमैन।मुझे आजकल उन तमाम औरतों की कहानियाँ आकर्षित करती हैं जो अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी किस्मतों से अलग-अलग तरीके से संघर्ष कर रही हैं। अपने सपनों कापीछा करते हुए कड़ी आलोचनाओं और समाज के पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए कैसे बनाई जाती होंगी राहें? माँ तो वो है न जो दूसरों के ख़्वाबों को पालती-पोसती हो - मेरीमाँ की तरह - ताकि उनके पति-बच्चे-परिवार अपनी ज़िन्दगियाँ, अपने ख़्वाब जी सकें।अपनी मां की तरह हमने दूसरों का ख़्वाब जीने...

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