एक बेटी के बाद दूसरी भी बेटी
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|   Feb 13, 2017
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एक बेटी के बाद दूसरी भी बेटी

यह कहानी मेरी माँ की है - करीब ३० साल पहले। उस समय हमारा परिवार नार्थ इंडिया के एक छोटे से शहर में रहता था।  मै करीब चार सालकी थी और हम सब मेरे छोटे भाई या बहन के पैदा होने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।  हम एक संयुक्त परिवार में रहते थे। मेरे दोनों ताऊजीको लड़के हो चुके थे।  पापा के पाँच भाई थे और वह अपने भाईयों में अब तक सबसे तेज़ और सफल थे। उन्होंने अपनी मेडिकल की पठाई पूरीकर प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की थी।

घरवाले उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे जब एक बेटा इस परिवार को पूरा करेगा। बुआ, दादी, चाची, पड़ोसी  "पहली बेटी हो गईलेकिन इस बार तोह  बेटा ही होगा", हमेशा ऐसा ही बोलते थे। लेकिन मेरी माँ को दूसरी भी बेटी जन्म हुई। 

हमारे देश में बेटा पैदा हो  तो बेजोर उत्सव मनाया जाता है और बेटी, वह भी दूसरी, हो तोह मानो  मातम छा गया हो।  दादी ने हॉस्पिटल में हीविलाप करना शुरू कर दिया "ये भगवान ने किस ग़लती की सजा दी है, मैंने क्या पाप  किया  है की मुझे  पोते का चेहरा देखना नसीब नहीं हुआ।  चलो कोई बात नहीं, दूसरा नहीं तो तीसरा तोह लड़का  ही होगा " । परिवार भी तो पूरा होना चाहिए, एक आवाज़ में सारे लोग यही बोल रहेथे।       

     

इन सब के बीच, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की मेरी माँ इस चीज़ को किस दृष्टि से देख रही थी। यह लाज़मी है की उन्हें भी एक बेटे का इंतज़ारथा। आखिर हम एक पुरुष प्रधान देश में रहते है।  लेकिन जब उन्हें हॉस्पिटल के रिकवरी रूम में पता चला की उन्हें फिर से बेटी जन्म हुई है तबउन्होंने अपनेआप को संभाला। अपनी भावनाओ को काबू में किया। अपने मन से पूछा की क्या बेटी को पढाये, लिखाये, बेटोँ  की तरह तो, अच्छा पालन पोषण दे, क्या वो बेटोँ  से कम रहेंगी? शायद पापा और उन्होंने यह पहले ही बात चीत में निर्णय ले लिया था की, बेटा हो या बेटी, हम दोऔर हमारे दो ही रहेंगे।  डॉक्टर जो थे।  पति की सोच अगर प्रगतिशील हो तो पत्नी किसी भी हालत का सामना कर सकती है।

माँ ने कमर कस ली, क्योंकि उन्हें पता था, लोगों को जवाब तो उन्हें ही देना है।  पापा के सामने तो कोई कुछ भी नहीं कहेगा, लेकिन उनके पीठपीछे उन्हें लोगो के ताने सुनने पड़ेंगे। याद रहे हम ३० साल पहले की बात कर रहे हैं। उन्हें पता था की उन्हें परिवार से इस बच्चे को पालने में बहुतज्यादा सहयोग नहीं मिलेगा।  पहली बेटी में तो तेल मालिश से नैप्पी धोने तक में घरवालों का सहयोग था। पहली संतान थी न वह।  लेकिन इसबार तो मालिश, खिलाना, सुलाना, नहलाना सब खुद ही करना पड़ेगा। माँ ने सब काम अपने हाथ में ले लिए। घर में ख़ास कर सफाई का पूराख्याल रखा ताकि बच्चे कम  बीमार पड़ें।  कुछ चीज़ें कभी साथ नही छोड़ती, जैसे डेटोल! उस समय पर मेरी माँ ने हमारी और हमारे आस पास केमाहोल को साफ और कीटाणु मुक्त रखने के लिए डेटोल पर भरोसा किया।

धीरे धीरे सोच बदली, दादी की, दादा की, कुछ लोगो की नहीं भी बदली, यहाँ तक की कुछ साल पहले तक भी।  जब मुझे बेटी हुई तोह एकरिश्तेदार ने यह कहने में बिलकुल संकोच नहीं किया " भगवान ने डॉक्टर साहब को लक्ष्मी पर और लक्ष्मी दे दी " । यह तब जब वोही "दूसरीलड़की" आज पूरे परिवार में एकलौती डॉक्टर है।  ऐसे मौके पर मैं यही सोचतो हूँ, की भगवान ने मुझे दो कान दिए है, एक सुनने के लिए और एकबातोँ  को बाहर निकलने के लिए। 

चाहे गोवेर्मेंट लड़कियों को बराबर हक़ दे या नहीं, अगर हमने अपने मन में ठान ली  है की हम बराबर है, की हम इक्कीसवी सदी में पहुच चुके हैऔर पति की सोच प्रगतिशील हो,  तो हम बेटियाँ को बराबरी से खड़े होने से कोई नहीं रोक पाएगा । 

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