अपने बच्चे को साइबर बुलिंग से बचाएं
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|   Aug 05, 2017
अपने बच्चे को साइबर बुलिंग से बचाएं

शायद कहने की जरूरत नहीं कि इंटरनेट ने हमारे जीवन में आमूल.चूल बदलाव ला दिए हैं.हमारे कामकाज के तौर तरीके से लेकर दोस्तों और परिवार के लोगों से व्यवहार करने तक में। वास्तव में कभी कभी हमें यह सोचकर हैरत होती है कि इंटरनेट के बिना हम कैसे जी पाएंगे। जहां तक आज के बच्चों का सवाल है उनके लिए इंटरनेट के बिना दुनिया का कोई अर्थ ही नहीं है। सरल भाषा में कहें तो आज के बच्चे डिजिटल नागरिक हैं।अधिकांश पेरेंट्स अपने बच्चों के डिजिटल जीवन को लेकर अधिक जानकारी नहीं रखते हैं।असली दुनिया की तरह इंटरनेट की दुनिया में भी बच्चे कई तरह के खतरों के प्रति असुरक्षित होते हैं।

नार्टन ऑनलाइन फैमिली रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि 79 फीसदी बच्चे किसी तरह की नकारात्मक ऑनलाइन स्थिति का सामना करते हैं और 60 फीसदीए साइबरक्राइम के किसी न किसी रूप में शिकार होते हैं.माता-पिता की सोच से कहीं ज्यादा। इसी तरह का सामान्य अनुभव साइबरबुलिंग का है। जो बच्चों पर काफी गहरा असर डाल सकता है। साइबरबुलिंग एक क्रूर असामाजिक व्यवहार है जो बच्चों, किशोरों;कभी.कभी वयस्कों द्वारा भी किसी डिजिटल माध्यम से किया जाता है। कभी स्कूल या खेल के मैदान तक सीमित रहने वाले ऐसे अनुभव अब ऑनलाइन होने पर कई गुना अधिक भयावह बन जाते हैं क्योंकि यह खतरनाक रूप अख्तियार कर सकता है। गलत अफवाहों का फैलना, धमकी भरे संदेशों का प्रसार और अपमानजनक तस्वीरें पोस्ट किए जाना आदि इसमें शामिल हैं। साइबर बुलिंग करने वाला टेक्स्ट मैसेज, ईमेल, इंस्टेंट मैसेज,सोशलनेटवर्किंग मैसेज भेजता है या ब्लॉग वेबपेज पर या ऑनलाइन गेमप्लेटफार्म पर ऐसी सामग्री पोस्ट करता है जो दूसरों को परेशान अपमानित करने या डराने धमकाने के लिए होती है। तकनीक का लाभ उठाकर वे ऐसे संदेश और सामग्री व्यापक रूप से प्रसारित करते हैं साइबरबुलिंग के कारण अक्सर उसी तरह के होते हैं जो आमतौर से स्कूल परिसरों में की जाने वाली धौंस धमकी के होते हैंः शक्ति का प्रदर्शन करना बदला लेने की इच्छाए या कल्पित नुकसानों की भरपाई। कोई पीड़ित जब अपना बचाव करने के लिये ऑनलाइन गलत संदेश विषयवस्तु का प्रसार करता है तो उसे भी साइबरबुलिंग के रूप में देखा जा सकता है।साइबरबुलिंग प्रायः गुमनाम रहकर की जाती है और इसे बार बार दोहराया जाता है।

यह किसी एक व्यक्ति या ऑनलाइन ग्रुप का काम हो सकता है। दुर्भाग्य से अन्य नकारात्मक ऑनलाइन अनुभवों की तरह साइबरबुलिंग का वभी बच्चों पर विपरीत भावनात्मक असर पड़ता है। ये भावनाएं बच्चों कीसंवेदी उम्र के अनुकूल नहीं होतीं। लगभग 32 फीसदी बच्चे अपने पेरेंट्स को संकोचवश अपने नकारात्मक ऑनलाइन अनुभवों के बारे में नहीं बता पाते और 30 फीसदी बच्चे यह सोचकर चिंतित होते हैं कि यह जानकर उनके पेरेंट्स  क्रोधित हो सकते हैं। साइबरक्राइम व्यक्ति को अपसेट करता है और क्रोध का अहसास कराता है। यह कहना है उन अधिकांश लोगों का जिन्होंने ऑनलाइन या ऑफलाइनक्राइम का अनुभव किया ;90 फीसदी ने इसे अपसेट करने वाला पाया। 73फीसदी सहमत है कि साइबर क्राइम के अनुभव ने उन्हें क्रोधित किया। इस संदर्भ में बच्चों के लिए इंटरनेट का अनुभव सुरक्षित बनाने के लिए उनके पेरेंट्स  की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। हालांकि पेरेंट्स यह तब तक नहीं कर सकते जब तक उन्हें पता न हो कि उनके बच्चे इस अपराध के शिकार हुए हैं।

यह चिंता का विषय है क्योंकि आधे भारतीय पेरेंट्स सोचते हैं कि उनके बच्चों को नकारात्मक अनुभव मिले होंगे। पेरेंट्स उस पहली पीढ़ी के माता-पिता हैं जिन्हें अपने बच्चों को न केवल वास्तविक दुनिया में बल्कि तेजी से विस्तृत होती आभासी दुनिया में भी सुरक्षित रखने के सभी उपाय करने होंगे। साथ ही बच्चों में इंटरनेट का उपभोग बढ़ने के साथ अब माता-पिता भी इस से दूर नहीं रह सकते।उन्हें भी बच्चों को इंटरनेट के खतरों से बचाने के लिए शुरूआती स्तर से ही बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखनी होगी। अभिभावकों को आज उनके बच्चों को शिक्षित करने और सशक्त बनाने की जरूरत है तथा उन्हें उनके बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार को लेकर अधिकसतर्क और जागरूक भी रहना होगा।समग्र रूप में विश्व भर के लगभग 62 फीसदी बच्चों ने प्रतिक्रिया दी कि ऑनलाइन होने के समय उन्होंने कोई नकारात्मक अनुभव प्राप्त किया।10 में लगभग 4 ;39 फीसदी के लिए हालांकि ऐसा ऑनलाइन नकारात्मक अनुभव अधिक गंभीर रहा जैसे कि अजनबियों से कोई अनुचित तस्वीर प्राप्त करना,धमकाया जाना या साइबरक्राइम का शिकार हो जाना।जहां साइबरबुलिंग एक खतरा है जिसे लेकर भारतीय पेरेंट्स  चिंतितहैं.4 में 1 को चिंता है कि उनके बच्चे को ऑनलाइन धमकाया जा सकताहै।

  • बेहतर संवाद कायम रखेंः पेरेंट्स  अपनेे बच्चे की गतिविधियों पर नज़र रखेंः आपके बच्चे द्वारा इंटरनेट गतिविधियों व सेलफोन इस्तेमाल पर निगाह रखें। देखी गई साइटों पर चर्चा करें और जरूरी हो तो कॉल लॉग भी ब्राउज करें। यदि बच्चे को ऐसा करना दखलंदाजी लगे तो अपने बच्चे की भलाई के लिए वास्तविक सरोकारों पर जोर दें।
  • साइबरबुलिंग के संकेतों को पहचानेंः अनेक लक्षण हैं जिन्हें लेकर सचेत रहें। जैसे किः फ्रस्टेशन या डिप्रेशनए खासतौर से सेलफोन या कम्प्यूटर उपयोग करने के बाद ऐसा बर्ताव करना, दोस्तों या रोजमर्रा की सामान्य मनोरंजक गतिविधियों से कट जाना या स्कूल में बच्चे के शैक्षणिक प्रदर्शन में किसी प्रकार की गिरावट दिखाई देना या अरूचि होना आदि।
      • ऑनलाइन पैरेंटिंग वास्तविक जीवन में पैरेंटिंग से कोई अलग नहीं है। पेरेंट्स केवल नियम नहीं बनाने हैं बल्कि उन्हें यह समझना होगा कि उनके बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं और उन्हें बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर पूरी निगाह रखनी होगी। आज की दुनिया में पेरेंट्स  द्वारा बच्चों को इंटरनेट संबंधी ऐटिकेट की जानकारी देना, सामाजिक कौशल सिखाने के समान ही महत्त्वपूर्ण है। जहां अच्छी बात यह है कि ऑनलाइन किसी भी अप्रिय स्थिति से रूबरू होने पर भारतीय बच्चे सबसे पहले अपने पेरेंट्स  को बताते हैं। वहीं अभिभावकों को इसके बदले में अपने बच्चों को शिक्षित और सशक्त बनाने की आवश्यकता है तथा उनके ऑनलाइन व्यवहार को लेकर अधिक सतर्क रहने की भी जरूरत है।

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