खत्म हाेती परियाें की कहानियां
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|   Jun 25, 2017
खत्म हाेती परियाें की कहानियां

समय के साथ बहुत सारी चीजें बदल रही हैं तो कुछ नई चीजें भी आ रही हैं। जैसे-तकनीकि का विकास हो रहा है ठीक वैसे ही रचनात्मकता पर असर पड़ रहा है। रचनात्मकता भी खत्म हो रही है। रचनात्मकता का असर हमारे जीवन पर भी पड़ता है। आजकल बच्चे घरों में अकसर टी.वी या कंप्यूटर से चिपके रहते हैं। वह कार्टून के चरित्र पात्र के नाम जानते हैं कभी उनसे कहानी सुनाने को कहा जाए तो वह कार्टून कथा ही सुनाते हैं वह अपने मन से कहानी नहीं बुन पाते। कहानी कहना उनको नहीं आता। पहले परियों की कहानी सुनाते थे तो बच्चे कहानी का विस्तार करते थे, वह नए पात्रों को भी जोड़ते थे। अभी भी बहुत सारी पत्रिकाओं में कहानी लिखो प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इस तरह की प्रतियोगितों के पीछे मकसद ही यही होता है कि बच्चों के भीतर रचनात्मकता का विकास किया जा सके।

कहानी लेखन जैसी प्रक्रियाएं स्वयं को अभिव्यक्त करने का तो मौका देते ही है साथ ही दूसरों का मन समझने में भी मदद करते हैं। इससे व्यक्ति संवेदनशील बनता हैं।परियों की दुनिया उनको स्वप्निल दुनिया की ओर ले जाती है जो सच लगते हुए भी सच नहीं होती। बच्चों के सपनों में भी परियां आती है। परिया हमेशा ही सच और न्याय के साथ खड़ी दिखती हैं। खासकर ऐसे पात्र जिसे भावनात्मक सुरक्षाकी जरूरत होती है। हर परी पहली परी से भिन्न होती है। इसलिए उसकी कहानी अलग होती है। कोई परी राजा के न्याय की कहानी सुनाती है तो कोईपरी बाग वाले माली की। परियों पर केंद्रित सिर्फ कहानियां ही नहींहैं, कविताएं भी हैं। कही परी रानी है तो कहीं शहजादी। बच्चों के लिए परियों से ज्यादा कोई सुंदर नहीं है। प्रसिद्ध बालसाहित्यकार प्रकाश मनु का कहना है कि परिकथा को मैं उसी तरह से जरूरी मानता हूं जैसे बच्चों में बचपन। बच्चों में कल्पनाशक्ति, सही तरह से मानसिक और बौद्धिक विकास परिकथा के बिना संभव नहीं है।

परिकथाओं को लेकर भी विश्लेषक दो खेमों में बंटे रहते है कुछ लोगो का कहना है कि परिकथाओं को सुनकर बच्चे यथार्थ से कट रहे हैं ,भूतप्रेत की कहानियां उनके भीतर अनजाना डर पैदा कर रही हैं। इसीलिए मशहूर दिल्लीप्रेस जो चंपक, सरस सलिल जैसी बच्चों की पत्रिकाएं छापते हैं परीकथाएं नहीं छापते। उनका मानना है कि बच्चों को आधुनिक सचाई से जुड़ी कहानियां सुनानी चाहिए। पर यह एकतरफा सच है।आधुनिक दुनिया से बच्चे रोज रुबरू हो रहे हैं। उनके सामने सब कुछ घट रहा है जिसमेंअच्छे का प्रतिशत कम और खराब का प्रतिशत ज्यादा हैै।अगर हम सिर्फ ज्ञान की बातें करें तो यह उनके लिए आलू के बोरे की तरह से ही होगा जिसमें आल भरा है और इसकी सब्जी बनती है।परी ऐसा नहीं करती, वह उड़ती है और उडऩा सिखाती है। परी सपने दिखाती है। बच्चों में उडऩे की प्रवृत्ति परी से ही आती है परियों की कहानियां ही उनको चांद पर ले जाती हैं,चांद तारे दिखाती है। उडऩे में एक सुख है, कल्पना का सुख है। परियों ने कई वैज्ञानिक परिकल्पनाओं को जन्म दिया है। परिकल्पना सिर्फ फैंटेसी नहीं है वह आज की कहानी से भी जोड़ी जा सकती है। परी कोई भी हो सकती है वह पड़ौस की पिंकी भी हो सकती है और कोई आंटी भी। परी को हर समस्या का समाधान पता हो सकता है लेकिन परी कामचोर बच्चों को पसंद नहीं करती।'  

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