खुशियाँ
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|   Jun 27, 2017
खुशियाँ

खुशियाँ..... जी हाँ दोस्तों, खुशिया जिसकी तलाश में हम इधर उधर ना जाने कहा कहा फिरते है, पर ये इतनी आसानी से हाथ नहीं आती| आज अनायास ही मेरे मन में एक ख्याल आया (एक औरत होने के नाते), हम में से कितनी औरते है जो खुद को पहले तवज्जो देती हैं या दुसरो के बराबर ही सही, ये भी छोड़िये दुसरो के बाद ही सही पर तवज्जो देती है खुद को| शायद ही हमे ये याद हो की हमे भी उतनी ही तवज्जो चाहिए जितनी हमारे आसपास (घर के) लोगो को | लेकिन झांसी की रानी बनाने के चक्कर में हम भूल जाते है की हम एक नार्मल औरत है (पर झांसी की रानी से काम कतई नहीं)|

आप को बता दूँ मुझे सब्जी में करेला पसंद हैं... पर घर में किसी को नहीं... तो फलस्वरूप घर में करेला नहीं बनता ..... क्योकि भाई ! बनाना तो मुझे ही है... शादी से पहले चावल हफ्ते में एक बार ही खाती थी... पर यहाँ तो चावल की बारिश कर दो .. तो, वो भी कम, ये सब तो बाहरी पसंद है....|

खैर, जिन चीज़ो से हम समझौता कर सकते है वो तो ठीक ... पर जिनसे हम नहीं कर सकते उनका क्या.....? कुछ दिनों पहले में ऑफिस से घर जा रही थी, दूर रास्ते में मेने एक कपल को देखा .. हम्म लगा क्या जोड़ी है.. सही कहा है जोड़ी ऊपर से बनती है ... मिया बीवी और एक प्यारी सी बेटी... पर जैसे जैसे पास गई लगा दोनों में कुछ अनबन हो रही है.. थोड़ा और पास गई तो पता चला .... पति किसी बात पर बीवी से लड़ रहा है.... आसपास के लोग देख रहे है दोनों को और श्रीमती जी का मूड-ऑफ .... बस रोने ही वाली थी .... खैर मैं घर की तरफ रवाना हो गई और सोचती रही.... संस्कार पढ़ने लिखने या पहनावे से नहीं आते......| और ऐसा किसी एक के साथ नहीं हर दूसरे घर में होता है.... |

पढ़ी लिखी या अनपढ़ कोई मायने नहीं ... बीवी है तो लताडो उसे... घर पर, रस्ते पर, अकेले में या लोगो के सामने.. औरत का सम्मान स्वाभिमान सब कुचल कर उसको ये अहसास कराओ की तुम्हारी क्या हस्ती है, सर्वोपरि तो केवल हम है....| इस तरह के लोग ये भी नहीं समझ सकते की, अगर यही हमसफ़र अगर साथ न हो तो ये खुद कुछ नहीं .. | पर इनकी यही चाल है ... पहले औरत के हर पहलू को कुचल डालो.. फिर अहसान दिखाओ के हम ने तुम्हे कुबूल किया .. तुम तो किसी लायक नहीं थी.....|

"पढ़ी लिखी बीवी वो भी बिना जुबान के साथ, और वो कमा भी अच्छा लेती हो तो क्या बात | साथ ही मेरे माँ बाप को अपनों से अपना माने, और अपने माँ बाप की गालिया सुन कर गए भी नहीं | हंसु तो हॅसे.. अपनी कोई इच्छा न रखती हो.. घर के काम में आती निपुण | और बाहर मॉडल से कम न लगे| बताईये सब कुछ एक ही में चाहिए इन्हे |"

हम (औरते) भी कही न कही या समाज के या परिवार के या यूँ कहे बच्चो की खातिर ये मान बैठती है की सच में हमारे सर्वेसर्वा तो हमारे श्रीमान जी है..., और अगर ये न हो तो हम एक कदम न उठा सके ...| उनकी ख़ुशी को अपनी ख़ुशी बनाते बनाते अपनी सच्ची ख़ुशी.. स्वाभिमान सम्मान आत्म सम्मान.. सब कुछ उनके पेरो में दे देती है ... पर जनाब वो है की खुश ही नहीं होते कभी.. | दुसरो की खुशी में ख़ुशी ढूंढने से अच्छा है... चुरा कर ही सही अपनी ख़ुशी की हसीं हसिये... कुछ सुकून आएगा...|अपनी खुशियों को भी मौका दीजिये जीने का ताकि आप फिर से जी सके.... हँस सके, मुस्कुरा सके, क्योकि आप खुद खुश नहीं होंगी तो परिवार भी खुश नहीं होगा |

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